जानें सूतक का दोष कब तक और कितने समय तक रहता है | Learn how long the sutak damage and how long it lasts

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sutak dosh dharmdarshan

सूतक का तात्पर्य है, अक्सर मुझसे प्रश्न पूछा करते हैं इस विषय में मेरे मन में भाव आया अभी श्राद्ध पक्ष है इस विषय में कुछ ऐसा लिखा जाए जो सभी के लिए अनुकूल हो अशोच या अशुद्धि। सूतक से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की अशुद्धियाँ होती है। शरीर सूतक द्रव्य और क्षेत्र से तथा मन राग-द्वेषादी विकारी परिणाम से अशुद्ध होता है ।इस काल में शुभ कार्य करना वर्जित है। क्योंकि एक व्यक्ति कि अशुद्धि से कई व्यक्ति और सम्पूर्ण वातावरण भी प्रभावित हो सकता है।जैसे एक बूंद नींबू के रस से पुरे दूध(milk) को परिवर्तन हो जाता है।

सूतक के निम्न भेद है…
१. आर्तज – मरण सम्बन्धी
२.सौतिक – प्रसूति सम्बन्धी
३. आर्तव – ऋतुकाल सम्बन्धी
४.तत्सन्सर्गज – सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग

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१. आर्तज – मरण सम्बन्धी : घरमे निवास करने वाले प्राणियों (कुटुम्बी ,सेवक और पालतू जानवर )के मरण से हुई अशुद्धि को आर्तज सूतक कहते है।

इसके तीन भेद है।

अ) सामान्य मरण : -आयु पूर्ण करके मरण को प्राप्त होना ।

ब.) अपम्रत्यु अथवा दुर्भाग्य-प्राकृतिक आपदा,बाढ़,अग्नि ,भूकंप ,उल्कापात ,बिजली आदि से ,सर्पदंश ,सिंह ,युद्ध एवं दुर्घटना के कारण मरण को अपम्रत्यु मरण कहते है।

स)आत्मघात मरण:- सती होना,क्रोध केवश कुएँ में गिरना ,नदी-तालाब में डूबकर मरना ,छत से गिरना ,विष खाना ,फांसी लगाना ,आग लगाना,गर्भपात करवाना आत्मघात मरण ही है। इन्ही कारणों से अन्य के प्राणों का हनन करना भी आत्म घात मरण ही है।

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२.सौतिक – प्रसूति सम्बन्धी :-घर में निवास करने वाले प्राणियों कि प्रसूति होने से हुई अशुद्धि को सौतिक सूतक कहते है।

इसके तीन भेद है –

अ) स्राव सम्बन्धी :- गर्भधारण(pregnancy) से तीन-चार माह तक के गर्भ गिरने को स्राव कहते है।
ब.)पात सम्बन्धी : गर्भधारण से पांच -छ: मास तक के गर्भ गिरने को गर्भपात(Abortion) कहते है।
स)प्रसूति सम्बन्धी :- गर्भधारण से सातवे से दशवे मास में माता के उदार से शिशु के बहार आने को प्रसूति या जन्म कहते है।

३. आर्तव – ऋतुकाल सम्बन्धी :सामान्यत: बारह वर्ष से पचास वर्ष तक स्त्रियों में प्रत्येक माह में रक्त स्राव से होने वाली अशुद्धि को आर्तव कहते है।इसे रजो दर्शन ,रजो धर्म ,मासिक धर्म भी कहते है।इस अवस्था में स्त्री को राजस्वला कहलाती है।

इसके दो भेद है

अ) प्रकृत स्राव :- नियमित रूप से नियमित तिथियों में होने वाला रक्तस्राव जो तीन दिन तक होता है ,प्रकृत स्राव कहलाता है।

ब) स्त्रियों को रोगादिक विकार से नियमित काल के पहले रक्त स्राव होना या नियमित काल के बाद रक्त स्राव होना।योवन अवस्था में भी नियमित काल के पहले रक्त स्राव हो सकता है.इस प्रकार अन्य कारणों से असमय होने वाला रक्त स्राव विकृत स्राव कहलाता है।

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४. तत्सन्सर्गज – सूतक से अशुद्ध व्यक्ति का संसर्ग :सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग (स्पर्श ,उठना,बैठना,भोजन करना ,शयन करना आदि )से होने वाली अशुद्धि तत्सन्सर्गज सूतक कहलाती है।

इसके तीन भेद है –

अ) मृत व्यक्ति के स्पर्श से :शमशान भूमि में अर्थी ले जाने से ,साथमे जाने से ,श्मशान भूमि में जाने वाले व्यक्ति के स्पर्श से एवं मरण सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों के संसर्ग से होने वाली अशुद्धि ।

ब) प्रसूता स्त्री और बालक का स्पर्श ,प्रसूता स्त्री द्वारा उपयोग कि गयी वस्तु का स्पर्श प्रसूति सूतक से अशुद्ध व्यक्तियों का संसर्ग करने से होने वाली अशुद्धि।

स)रज स्वला स्त्री का स्पर्श या उसके द्वारा उपयोग की गयी वस्तु को स्पर्श करने से होने वाली अशुद्धि। इस प्रकार इतने कारणों से सूतक अशुद्धि होती है,परन्तु अशुद्धि का काल कितना होगा इसके बारे में विभिन्न शास्त्रों ,आचार्यों ,विद्वानों एवं लोक परंपरा के अनुसार मत-मतान्तर है जो क्षेत्र की परम्परानुसार मानना चाहिए।

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