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सरकारी नौकरी में किराए के मकान में रहना बड़ा मुश्किल होता है

सरकारी नौकरी में स्थानांतरण होने पर सबसे पहली फ़िक्र जो होती है , वो ये है कि मकान का क्या होगा। सरकारी मकान में रहने की आदत इस क़दर अजीब है कि आप किराये के मकान में रह नहीं सकते, पर मजबूरी में कभी कभी ऐसा भी करना पड़ता है।

रविवारीय गपशप
लेखक – आनंद शर्मा

सरकारी नौकरी में स्थानांतरण होने पर सबसे पहली फ़िक्र जो होती है , वो ये है कि मकान का क्या होगा । सरकारी मकान में रहने की आदत इस क़दर अजीब है कि आप किराये के मकान में रह नहीं सकते , पर मजबूरी में कभी कभी ऐसा भी करना पड़ता है । यूँ तो मेरी क़िस्मत सरकारी मकान मिलने के बारे हमेशा अच्छी रही है पर कुछ शहरों में मैं किराए के मकान में रह चुका था । सबसे पहला मौक़ा आया ग्वालियर में जहाँ मेरी पदस्थापना बतौर सी. ई. ओ. ग्वालियर विकास प्राधिकरण के पद पर हुई ।

मेरे पूर्वाधिकारी का ग्वालियर में अपना मकान था और प्राधिकरण के अधिकारी होने से मकान आबँटन में प्राथमिकता ना होने से कुछ दिन मुझे गोविंदपुरी में एक निजी आवास में किराए से रहना पड़ा । सिंचाई विभाग के किसी इंजीनियर साहब के इस मकान में उनका मासिक सुपरवीजन होता कि उनका मकान वैसा ही दुरुस्त है या नहीं । तमाम पाबन्दियों के अलावा मकान का एक कमरा भी उन्होंने कुछ सामान रख कर बंद किया हुआ था । कुछ ही दिन में हम और हमारी क़िस्मत इस सशर्त रहवास से ऊब गये और मुझे रेसकोर्स रोड पर एक आवास आबंटित हो गया जिसमें मैं ग्वालियर पदस्थापना बने रहने तक रहा आया ।

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इंदौर ट्रान्सफर होने के बाद मेरे सहकर्मियों ने मुझे डराया कि यहाँ आसानी से सरकारी मकान नहीं मिला करते | कुछ उदाहरण भी दिये की फ़लाँ साहब इतने बरस किराए के मकान में रहे और फ़लाँ जो ए डी एम थे वे तो रेस्ट हाउस में रहते रहते ही अपना कार्यकाल पूरा कर गए । कहानियाँ ग़लत नहीं थीं क्योंकि वाकई मुझे शरुआती महीने किराये के मकान में बिताने पड़े ये और बात है कि माँ विहार कालोनी में बिताये उन दिनों के रिश्ते आज भी जीवन्त हैं | बहरहाल क़िस्मत ने ज़ोर मारा और कुछ महीने बाद ही एक सरकारी मकान का आबंटन का संयोग हो गया |

ये मकान मेडिकल कालेज के समीप मुख्य मार्ग पर था और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सेठी जी के नाम पर आबंटित था जिसमें उनके परिवार जन रह रहे थे । मकान की लोकेशन बढ़िया थी मैं बड़ा ख़ुश हुआ पर जैसे ही मकान में आधिपत्य लेने का समय आया पता चला कि उसमें रहने वालों को कुछ और महीने रहने की अनुमति मिल गयी है । मैंने अपनी खीज गौतम सिंह पर निकाली जो उन दिनों कमिश्नर इंदौर के उपायुक्त थे । गौतम ने मामले को गम्भीरता से लिया और कुछ दिनों बाद ही मुझे बताया कि एक अपर कलेक्टर साहब का तबादला शाजापुर हो गया है सो आप को यदि पसंद हो तो वो मकान आप ले सकते हो , मैंने तुरंत हाँ कर दिया , भला रेडियो कालोनी में स्थित मकान कौन न लेना चाहेगा?

खैर मकान मिलने के पत्र पाने के बाद मैंने सोचा कि एक दिन जा के मकान की दशा देखी जाये और उसके वर्तमान अधिपति से मुलाक़ात भी कर पूछ लिया जाये कि कब तक रिक्ति की संभावना है | रविवार के दिन दोपहर के बाद मैं फोन करने के बाद उनसे मिलने मकान पे जा पहुंचा | वे बाहर ही सपत्नीक टहल रहे थे | मैंने प्रारम्भिक अभिवादन के बाद अपना परिचय दिया और बात शुरू करने की गरज़ से भूमिका बनाते हुए कहा कि सर जब मैं सीहोर में एस डी एम और प्रशासक नगर पालिका था तब नगर पालिका में आपके साथ धार जिले में आपके अधीनस्थ काम करने वाले भगत जी मेरे भी अधीनस्थ नगर पालिका में थे और आपकी बड़ी तारीफ़ किया करते थे |

वे बेचारे कुछ कहें उससे पहले ही आदरणीय भाभी जी ( साहब की धर्मपत्नी जी ) ने छूटते ही कहा इनकी तारीफ़ ?? मैंने तो आज तक किसी को इनकी तारीफ़ करते नहीं सुना | वे बेचारे बुरी तरह झेंप गए | खैर इस प्रसंग के बाद मैंने बाकी की मालूमात हासिल कर जल्द खिसक लेना ही ठीक समझा | आज भी जब उस घटना को याद करता हूँ तो लगता है , बीबियों के सामने ये उम्मीद करना कि आप हीरो रहोगे बड़ा कठिन है वे अक्सर आपको धरातल पर ही रखती हैं |

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