क्या ‘प्लास्टिकबंदी’ पीएम मोदी का नया मास्टर स्ट्रोक है?

दुनिया के किसी कोने में भी आप जाएं, प्लास्टिक से नहीं बच सकते। माउंट एवरेस्ट से लेकर महासागरों तक और अंटार्कटिका से लेकर अमेजान के जंगलों तक मनुष्य ने जो अपनी बुरी निशानियां छोड़ी हैं, वो सब प्लास्टिक की शक्ल में हैं।

0
34

अजय बोकिल

अगर ये सचमुच हो सका तो प्लास्टिक से परेशान इस देश को राहत मिलेगी। इसलिए भी कि प्लास्टिक कल्चर अब ‘प्लास्टिक टेरर’ में तब्दील हो चुका है और हम खुद ही इसके लिए जिम्मेदार हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन दिनो ग्रेटर नोएडा में हो रही यूएनसीसीडी ( यूनायटेड नेशन्स कन्वेंशन टु काॅम्बेट डेजर्टीफिकेशन ) के सम्मेलन में ऐलान किया कि भारत में बापू के जन्मदिन 2 अक्टूबर से पूरे भारत में सिंगल यूज प्लास्टिक पर पाबंदी लग जाएगी। ताकि इस किस्म के प्लास्टिक से हो रहे प्रदूषण और कचरे से कुछ निजात मिल सके। पर्यावरण को बचाने के लिहाज से यह बहुत जरूरी है। हालांकि इस घोषणा का अर्थ सभी तरह के प्लास्टिक से मुक्ति नहीं है। केवल प्लास्टिक का वो प्रकार है, जिसे केवल एक बार ही इस्तेमाल किया जा सकता है। अर्थात यह सिंगल यूज प्लास्टिक ( एसयूपी) अब मानवता के लिए ही खतरा बन गया है।

मोदी सरकार ने यह फैसला काफी विचार के बाद लिया है, क्योंकि एसयूपी पर रोक की मांग तो काफी पहले से उठती रही है। लेकिन सरकार ने इसे लागू करने का फैसला अब किया है। इसके लिए केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने तमाम राज्यों से लेकर दफ्तरों को चिट्ठी लिखी है। एसयूपी पर प्रतिबंध चरणबद्ध तरीके से लगाया जाएगा। इसके तहत इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा ‍कि एसयूपी आइटम समुद्र, नदी, तालाबों में न फेंके जाएं। एसयूपी से तात्पर्य अमूमन लोग सभी तरह की प्लास्टिक पन्नी ( कैरी बैग) से लेते हैं। लेकिन इसके अंतर्गत प्लास्टिक कटलरी के तहत आने वाली प्लेटें, कप, ग्लास, स्ट्राॅ, चम्मच, थर्मोकोल से बनी कटलरी और सजावट के सामान तथा प्लास्टिक पाउच भी शामिल हैं। रेल मंत्रालय से भी कहा गया है कि वो जल्द ही एसयूपी को रेड सिग्नल दिखाए। इस बात पर भी ध्याएन दिया जाएगा कि एसयूपी का कैसे रीयूज हो सके।

बीती आधी सदी में किसी भी विचार धारा की तुलना में प्लास्टिक का साम्राज्य कई गुना तेजी से फैला है। मनुष्य के जीवन का कोई क्षेत्र शायद ही बचा हो, जिसमें प्लास्टिक ने किसी न किसी रूप में घुसपैठ न कर ली हो। यह घुसपैठ पहले सुविधा के रूप में हुई और बाद में इसने एक तरह से ‘आंतक’ की शक्ल ले ली है। दुनिया के किसी कोने में भी आप जाएं, प्लास्टिक से नहीं बच सकते। माउंट एवरेस्ट से लेकर महासागरों तक और अंटार्कटिका से लेकर अमेजान के जंगलों तक मनुष्य ने जो अपनी बुरी निशानियां छोड़ी हैं, वो सब प्लास्टिक की शक्ल में हैं। यहां तक ‍की चांद तक उससे नहीं बच सका है।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर तरह का प्लास्टिक बुरा और प्रदूषणकारी है। आज दुनिया में कुल प्लास्टिक कचरे का 66 फीसदी पाॅलिथिन बैग्स हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति ‘शुद्ध पानी’ से कहीं भी प्यास बुझाने वाली पानी की बोतलों की है। लेकिन पानी की खाली बोतलें और उनको ठिकाने लगाना अभी भी बहुत मुश्किल है।

अगर भारत की ही बात करें तो देश हर साल 94.6 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा करता है। हमारे यहां प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपयोग करीब 13 किलोग्राम है। हर साल यह खपत बढ़ रही है। दुनिया के सर्वाधिक प्लास्टिक उपयोग करने वाले देशों में भारत का स्थान पांचवा है। बीसवी सदी के उत्तरार्द्ध में मानव सभ्यता में जो अहम बदलाव आया, प्लास्टिक उसका प्रतीक है। याद करें चार दशक पूर्व का समय जब बाजार जाने का मतलब हाथ में कपड़े की थैली लेकर जाना होता था। दुकानदार भी अक्सर कागज की पुडि़या में सामान देता था। तरल पदार्थों के लिए लोग अपने साथ बरनी या डिब्बा लेकर जाते थे।

हालांकि इसमें कुछ असुविधा थी, क्योंकि पुडि़या और बरनी आदि को संभल कर रखना और ले जाना होता था। प्लास्टिक ने इस व्यवहारगत असुविधा को बखूबी ट्रेस किया और आज आलम यह है कि लोग बाजार में थैली ले जाना तो दूर दुकानदार के पास प्लास्टिक की थैली अथवा पैकेजिंग मटेरियल न होने पर उसे ही कोसते हैं। जानते हुए कि जो प्लास्टिक तात्कालिक और आकर्षक सुविधा है, वही पूरी धरती के पर्यावरण के लिए ऐसा जहर है, जिसका कोई तोड़ दुनिया नहीं खोज सकी है। आज, खाने-पीने, पहनने- अोढ़ने, सुनने-बतियाने, लेटने-झूलने, सोने-जागने, लिखने-पढ़ने तक हर मामले में प्लास्टिक ने मानो हमे ही गुलाम बना लिया है।

एसयूपी इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि यह नाॅन बायोडीग्रेडबल है। प्लास्टिक की पन्नियां हमारे घरों से निकलकर समुद्र, पहाड़ों, रेगिस्तान और जंगलों तक पर्यावरण को पलीता लगा रही हैं। जितनी गायें वध के कारण नहीं मरतीं, उससे ज्यादा प्लास्टिक की पन्नियां खाकर मर रही हैं। हालांकि उस पर कोई हो हल्ला नहीं होता। प्लास्टिक जल संरचनाअोंके पूरे इकोसिस्टम को बिगाड़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लास्टिक को नष्ट होने में 5 सौ से 1 हजार साल तक लगते हैं। दूसरी तरफ प्लास्टिक के बढ़ते दखल के कारण प्लास्टिक उद्योग फल-फूल रहा है। भारत में प्लास्टिक बनाने वाली करीब 22 हजार इकाइयां हैं, ‍जिनमें 6 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं। यही नहीं हमारा प्लास्टिक निर्यात भी 8 ‍िबलियन डाॅलर का है। जब एसयूपी बंद होगा तो कुछ के रोजगार भी बंद होंगे। लेकिन हमे व्यापक परिप्रेक्ष्य में सोचना होगा।

प्लास्टिक का एक पाॅलिटिकल एंगल भी है। क्योंकि प्लास्टिक ऐसा आयटम है, जिस पर रोक का शायद ही कोई राजनीतिक विरोध हो। उल्टे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से तकरीबन देश का हर राजनीतिक दल सियासी लक्ष्मण रेखाअो लांघकर भी पीएम मोदी की इस प्लास्टिक बंदी मुहिम का स्वागत करेगा। यह दिखाने की कोशिश होगी कि और किसी मामले में हो न हो, देश कम से कम ‘प्लास्टिक टेरर’ को खत्म करने को लेकर एकमत है। अगर ऐसा हो सका तो यह मोदी का ‘मास्टर स्ट्रोक कहलाएगा, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण को लेकर विपक्ष के पाले में शायद ही कोई हो।

बहरहाल बात केवल प्लास्टिक बंदी के सियासी समर्थन तक सीमित नहीं है। प्रश्न यह है कि प्लास्टिक का विकल्प क्या है? हमारी सभ्यता को पुन: 19 सदी में लौटाना मुमकिन है? क्या हम प्लास्टिक से सचमुच मुक्ति पा सकते हैं? इसका विकल्प क्या है? प्लास्टिक को पूरी तरह खारिज करना भी संभव नहीं है। प्लास्टिक के जन्मदाता वैज्ञानिक लियो हैन्ड्रीक बैकलैंड ने 1907 में जब पहली बार बेकेलाइट के रूप में प्लास्टिक तैयार किया था, तब वह मनुष्य की जिंदगी आसान बनाने के उपायों पर सोच रहे थे। लेकिन यही प्लास्टिक अब जीवन की अलग-अलग शिरोअों में घुसकर ऐसा बैठ गया है कि उससे मुक्ति पाना लगभग नामुमकिन है। उम्मीद की जाए कि प्रधानमंत्री की इस पर्यावरण हितैषी प्लास्टिक बंदी को लोग सकारात्मक अर्थ में लेंगे और चाय गुजरे जमाने की तरह कुल्हड़ में पीना पसंद करेंगे साथ ही बोतलबंद पानी की जगह देशी लोटे साथ में रखेंगे। यकीनन प्लास्टिक विहीन भारत बापू को भी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here