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सिंधिया ने जिस कारण कांग्रेस छोड़ी, भाजपा में वैसी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं : जयभान सिंह

भोपाल : ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर गलत किया या सही, यह सवाल उनके भाजपा ज्वाइन करने के बाद से ही बहस का मुद्दा है। इसलिए भी क्योंकि कांग्रेस में हर प्रमुख निर्णय में उनसे बात की जाती थी। वे राहुल गांधी के सबसे नजदीक नेताओं में से एक थे। क्या भाजपा में आने के बाद उनका यह दबदबा बरकरार है। भाजपा नेताओं के कुछ बयानों के कारण नए सिरे से ऐसे सवाल उठे हैं। जैसे, सिंधिया को केंद्रीय मंत्री बनाने की मांग उठी तो केंद्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल का जवाब आया, भाजपा में डिमांड पर मंत्री नहीं बनाए जाते। भाजपा के एक दूसरे नेता जयभान सिंह पवैया ने कहा कि सिंधिया ने जिस कारण कांग्रेस छोड़ी, भाजपा में वैसी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं से वे नदारद हैं। भाजपा के बैनर, पोस्टरों में वे नहीं हैं। उनका कोई समर्थक भाजपा का पदाधिकारी नहीं बनाया जा रहा। क्या इसका मतलब यह है कि भाजपा के अंदर सिंधिया को उनकी हैसियत का अहसास कराया जाने लगा है। क्या यह देखकर नहीं लगता कि सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर गलती तो नहीं कर दी।

 यह राजनीतिक सदभाव बिगाड़ने की कोशिश

लॉकडाउन के दौरान जब देश-प्रदेश में हर तरह की जरूरी गतिविधियां ठप हैं, ऐसे में प्रदेश सरकार द्वारा आनन-फानन पूर्व मंत्रियों से बंगले खाली कराने की कार्रवाई सवालों के घेरे में है। अभी मंत्रिमंडल का पूरी तरह गठन भी नहीं हुआ। मंत्री बिना बंगलों के परेशान भी नहीं हैं। ऐसे में पूर्व मंत्रियों के बंगले खाली कराने की कार्रवाई होगी तो सवाल उठना लाजिमी है। इसलिए भी क्योंकि उन पूर्व मंत्रियों को बंगला खाली करने का नोटिस तक नहीं मिला जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जा चुके हैं और अब विधायक तक नहीं हैं। बता दें, कमलनाथ सरकार लगभग सवा साल रही, पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह का बंगला कमलनाथ के सांसद बेटे नकुलनाथ के नाम आवंटित हो गया था फिर भी वह अब तक खाली नहीं हुआ। शिवराज सरकार के कई अन्य मंत्री लंबे समय तक बंगलों में डटे रहे। कुछ अब तक काबिज हैं। इसलिए पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के इस आरोप में दम दिखती है कि पूर्व मंत्रियों से बंगले खाली कराने की हड़बड़ी भाजपा सरकार का राजनीतिक सद्भाव बिगाड़ने की दिशा में प्रमुख कदम है। ऐसा कर भाजपा भविष्य के लिए गलत नजीर पेश कर रही है। हालांकि बाद में सरकार बैकफुट पर आकर गलती सुधारती दिखाई पड़ी।

राहुल, दिग्विजय ने मिलाए ‘सुर पे सुर’

कांग्रेस के अवसरवादियों एवं बागियों को लेकर पार्टी के दो बड़े नेताओं अजय सिंह ‘राहुल’ एवं दिग्विजय सिंह ने ‘ सुर पे सुर ‘ मिलाया है। जरिया बनाया फेसबुक अर्थात सोशल मीडिया को। चौधरी राकेश सिंह को लेकर राहुल तब से आहत हैं जब उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा शुरू होने से पहले अचानक पाला बदला था और कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। जब भी चौधरी को कांग्रेस में वापस लेने की मांग उठती है, वे विरोध में खड़े हो जाते हैं। दिग्विजय के दिल में चोट 22 बागी विधायकों के कारण कमलनाथ सरकार के गिरने से लगी है। दिग्विजय को भरोसा था कि इतनी तादाद में पार्टी छोड़कर विधायक सरकार नहीं गिराएंगे लेकिन उनकी उम्मीद टूट गई। इसलिए राहुल, चौधरी जैसे नेताओं को पार्टी से बाहर रखकर अवसरवादियों को सबक सिखाना चाहते हैं। इसे लेकर उन्होंने अपनी फेसबुक वाल में लंबी-चौड़ी टिप्पणी लिखी। दिग्विजय बागी विधायकों की भूमिका को लोकतंत्र के लिए खतरा मानते हैं। उन्होंने भी अपनी फेसबुक वाल में लिखा कि कांग्रेस को खत्म करने के कई अवसर मिलेंगे, बाद में अपनी हसरत पूरी कर लेना लेकिन अभी बागियों को हराकर सबक सिखाएं और लोकतंत्र की रक्षा करें।
0 बागियों के लिए सबक बने गुड्डू-चौधरी….
– अवसरवादी नेताओं व बागियों के लिए पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू एवं पूर्व मंत्री चौधरी राकेश सिंह किसी सबक से कम नहीं। सबक भी दो तरह का। एक, भाजपा ने इनसे किए वादे पूरे नहीं किए और न ही इनके कद के अनुसार सम्मान दिया। दूसरा, दोनों कांग्रेस में घर वापसी के लिए बेताब हैं लेकिन विरोध के चलते यह आसान नहीं रहा। गुड्डू ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस को अलविदा कह कर भाजपा ज्वाइन की थी जबकि चौधरी ने शिवराज सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा से ठीक पहले कांग्रेस छोड़ दी थी। भाजपा में जाने के बाद दोनों की स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दोनों कांग्रेस का दरवाजा खटखटा रहे हैं। खास बात यह है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में कांग्रेस को दोनों नेताओं की जरूरत है फिर भी भरोसे के संकट के कारण विरोध हो रहा है। गुड्डू की भाजपा में उपेक्षा हुई और सम्मान नहीं मिला, इस पर मुहर पार्टी के बड़े नेता कैलाश विजयवर्गीय ने ही लगा दी। चौधरी को राज्यसभा भेजने का वादा किया गया था, निभाया नहीं गया, इसलिए वे आहत हैं। बगावत करने वालों के लिए इन दोनों नेताओं के उदाहरण पर्याप्त हैं।
‘तारीख पर तारीख’ आखिर कब तक

सनी देओल की एक फिल्म ‘दामिनी’ का फेमस डायलॉग था, ‘तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख’ आखिर कब तक। यह डायलॉग उन्होंने कोर्ट के सामने एक मामले की सुनवाई के संदर्भ में न्याय व्यवस्था पर व्यंग करते हुए बोला था। इसका इस्तेमाल अब शिवराज सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर होने लगा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को लॉकडाउन की आड़ में मंत्रिमंडल विस्तार की तारीख बार-बार बढ़ाना पड़ रही है। जबकि विस्तार करना ही होता तो जिस तरह पांच मंत्रियों ने शपथ ली थी उसी तरह शेष मंत्रिमंडल की भी शपथ हो जाती। पर संकट दूसरा है। मंत्रिमंडल के लिए मंत्रियों का चयन मुख्यमंत्री एवं संगठन के लिए गले में फांस बनकर अटक गया है। दावेदार मंत्री बनने के लिए दबाव बनाए हैं और मौजूदा राजनीतिक हालात में सभी को मंत्री बनाया नहीं जा सकता। लगातार बैठकों के बावजूद सहमति नहीं बन पा रही। इसकी वजह से ‘तारीख पर तारीख’ का डायलॉग चर्चा में है। यह तारीख कब आती है, इसका प्रदेश और दावेदार इंतजार कर रहे हैं।