देशमध्य प्रदेश

दो महीने में इंदौर में खर्च कर दिए सौ करोड़

राजेश राठौर

इंदौर : कोई माने या न माने, लेकिन ये बात सही है कि लगभग सौ करोड़ रुपए कोरोना वायरस के कारण इंदौर जिले में दो महीने में खर्च हो गए। अब दानदाता भी थकने लगे हैं। नगर निगम के अलावा इंदौर विकास प्राधिकरण ने भी अब टेंडर बुलाना शुरू कर दिए। 15 अप्रैल तक मोटे तौर पर 12 करोड़ रुपए का सहयोग दानदाताओं ने जिला प्रशासन को किया। इसके अलावा लगभग 25 करोड़ रुपए का राशन सामान नगर निगम पूरे शहर में बंटवा चुका है, जिनकी संख्या लगभग आठ लाख से ऊपर चली गई है। फिर भी 25 हजार पैकेट रोज बंट रहे हैं।

इसके अलावा मरीजों और डॉक्टरों के खाने के लिए इंदौर विकास प्राधिकरण ने अलग से भोजन बनाना शुरू किया था, जो कोविड और क्वारंटाइन सेंटर में भेजा जा रहा है। प्राधिकरण ने भी डेढ़ करोड़ रुपए दानदाताओं से ले लिए। इसके अलावा जब पैसा कम पडऩे लगा तो 24 लाख रुपए का ठेका भोजन बनाने का दिया, वो भी खत्म हो गया, तो बीस-बीस लाख रुपए के दो टेंडर और निकाले। 4 हजार 600 पैकेट प्राधिकरण रोज बनवा रहा है। कई बार हजार लोगों तक के लिए खाना बनवाना पड़ा। प्राधिकरण को पारले और नफीस ने एक-एक लाख बिस्किट पैकेट दिए। इसके अलावा पेप्सी ने पचास हजार पैकेट दिए। आईडीए कंस्ट्रक्शन कंपनी के अरुण जैन ने पांच सौ किलो मिठाई भी प्राधिकरण को दी।

वहीं होटल और मैरिज गार्डन का किराया जोड़ें तो भी करोड़ों रुपए हो जाएगा। सामाजिक संगठनों ने अब तक पचास करोड़ रुपए से ज्यादा का भोजन बंटवा दिया है। सरकारी गेहूं और चावल ही दस करोड़ रुपए से ज्यादा का बंट गया। पीपीई किट, मास्क, ग्लब्ज और अन्य सामान भी लोगों ने प्रशासन को दिया। साठ लाख रुपए की तो मशीन ही मेडिकल कॉलेज को मिली। पुलिसवाले, नगर निगम कर्मचारी और आशा कार्यकर्ताओं को भी सामाजिक संगठनों ने खाने-पीने की व्यवस्था कराई। आयुष विभाग ने अब तक दो करोड़ रुपए से ज्यादा का काढ़ा बांट दिया। मोटे तौर पर सब मिलाकर सत्तर फीसदी खर्च समाजसेवी संगठनों ने उठाया।

तीस फीसदी खर्च ही प्रशासन ने किया। इसके अलावा सरकारी और किराये पर ली गई कारों के डीजल पर ही पांच करोड़ रुपए खर्च हो गए। निजी अस्पतालों को भी एक करोड़ रुपए से ज्यादा की चपत लगी है। जो गरीब मरीज विशेष, सुयश, अरिहंत जैसे अस्पतालों में बिना पैसा दिए इलाज कराकर चल दिए। अप्रैल में माहौल बहुत ज्यादा खराब था, तो प्रशासन ने कह दिया कि अभी जाने दो बाद में देखेंगे। उसके अलावा भी कई खर्च ऐसे हैं, जो लोगों ने अपने स्तर पर कर दिए। प्रशासन ने मोटे तौर पर जो आकलन किया है उसी के हिसाब से ही लगभग सौ करोड़ रुपए का खर्चा बताया गया है। अभी भी सामाजिक संगठन मदद का सिलसिला बनाए हुए हैं।

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