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यहां डीजीपी की चिट्ठी, वहां मिनेपोलिस में पुलिस की ही ‘छुट्टी’…

अजय बोकिल

दो खबरें लगभग साथ आईं। संदर्भ अलग-अलग थे। लेकिन दोनो में अंतर्संम्बध है। पहली खबर मप्र की है, जहां राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) विवेक जौहरी को पुलिस मुख्याकलय में तैनात 29 आईपीएस अफसरों की ‘काम चोरी’ पर कड़ी चेतावनी देनी पड़ी। दूसरी खबर अमेरिका के उस मिनेपोलिस राज्य की है, जहां की ‘सिटी कौंसिल’ ने पुलिस विभाग को ही भंग करने का फैसला किया है। कौंसिल के मुताबिक जब जनता पर अत्याचार ही करना है तो ऐसी पुलिस न हो तो अच्छा।

कोरोना समय को इतना श्रेय तो दिया ही जाना चाहिए कि इसने प्रदेश में सरकारी विभागों में ‘काम के बोझ से दबे’ और ‘कामचोर’ अफसर व कर्मचारियों के बीच का पर्दा उठा दिया है। डीजीपी जौहरी ने अपने पत्र में कहा कि पुलिस मुख्यालय में तैनात 29 अफसर काम के दौरान आॅफिस से गायब रहते हैं तो कई को ‘लंच’ करने में दो घंटे लग जाते हैं। कुछ तो लंच की ‘डकार’ के बाद दफ्तर लौटना भी जरूरी नहीं समझते। इनमें भी 3 वरिष्ठ अफसर तो दफ्तर आना ही अपनी शान में गुस्ताखी मानते हैं, लेकिन सरकार से वेतन भत्ते और सुविधाएं पूरी ले रहे हैं। इस चिट्ठी का सीधा अर्थ यही है कि जिन आला पुलिस अफसरों पर पूरे प्रदेश में कानून- व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, आम जनता से कानून का पालन करवाने का दायित्व है, वो अपने कर्तव्य को लेकर कितने गंभीर और अपनी सुख सुविधाओं के कायम रहने को लेकर कितने निश्चिंत हैं। यह स्थिति पुलिस हेडक्वार्टर्स की है। इसके विपरीत राज्य के जिलों में पुलिस कर्मी कोरोना से लड़ते- लड़ते अपनी जानें तक गंवा रहे हैं।

उधर संयुक्त राज्य अमेरिका में अश्वेतों पर पुलिस अत्याचार के लिए बदनाम हो चुके शहर मिनेपोलिस की सिटी कौंसिल (नगर परिषद) ने फैसला लिया है कि पुलिस को भंग कर दिया जाए। परिषद के सदस्यों ने कहा कि ऐसे पुलिस विभाग को पोसने की बजाए वो सामुदायिक सुरक्षा के उपाय अपनाने को ज्यादा तरजीह देंगे। ध्यान रहे कि मिनेपोलिस के ही एक पुलिस अफसर डेरेक शाॅविन ने 25 मई को एक अश्वेत जाॅर्ज फ्लायड की गला दबाकर हत्या कर दी थी। उसके बाद से न सिर्फ पूरा अमेरिका जल रहा है बल्कि यह आग अब यूरोप और इंग्लैंड तक फैल गई है।

दुनिया भर के अश्वेत इस नस्लभेदी अत्याचार के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं। कई जगह बड़ी संख्या में गोरे भी उनके समर्थन में हैं तो अमेरिका में रह रहे अनेक भारतीयों ने भी अश्वेतों के आंदोलन का समर्थन किया है। इस आंदोलन के आगे पुलिस भी असहाय दिखती है। यह बात अलग है कि इस अंतरराष्ट्रीय बन चुके मुद्दे पर भारत सरकार इसे ‘अमेरिका का आंतरिक मामला’ मान कर (या ट्रंपजी के नाराज होने के डर से?) चुप है, जबकि अमेरिका हमारे हर आंतरिक मामले में नाक घुसेड़ने से बाज नहीं आता। मिनेपोलिस सिटी कौंसिल की अध्यक्ष लीसा बेंडर ने कहा कि हम पुलिस प्रशासन को भंग करने और शहर में सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक नया तंत्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो हमारे समुदाय को सुरक्षित रख सके।‘ हालांकि इस फैसले पर शीर्ष स्तर कुछ मतभेद भी हैं, लेकिन हर कोई पुलिस ज्यादती के खिलाफ है।

वैसे अमेरिका का पुलिस ढांचा हमारे यहां से बिल्कुल अलग है। भारतीय पुलिस मूलत: गुलाम भारतीयों पर ‘राज’ करने के मकसद से गठित की गई थी। लेकिन अमेरिकी पुलिस कानून व्यवस्था कायम रखने और लोगों की हर संभव मदद करने के उद्देश्य से बनाई गई है। हालांकि नस्लभेद के मामलों में उसका भी रिकाॅर्ड अच्छा नहीं है। जहां भारत में पुलिस केन्द्र और राज्य सरकार दोनो के अधीन है और पूरे देश में पुलिस तंत्र लगभग एक समान है। लेकिन अमेरिका में ‘राष्ट्रीय पुलिस’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। वहां पुलिस राज्यों और स्थानीय संस्थाअों के अधीन काम करती है। हर राज्य, शहर और अमेरिकी संघीय सरकार के अलग-अलग नियम-कानून हैं। बताया जाता है कि पूरे अमेरिका में करीब 5 लाख पुलिस अधिकारी हैं तथा 40 हजार स्वतंत्र पुलिस बल हैं। वहां का समूचा पुलिस तंत्र हमारे यहां की पुलिस की तुलना में काफी जटिल और ‍बहुआयामी है। वहां शहर की पुलिस रिपोर्ट लिखती है, लेकिन अपराध की तफ्तीीश का जिम्मा उन विवेचकों (डिटेक्टिव) का रहता है, जो नगरीय निकायों के कर्मचारी होते हैं।

अमेरिका में पचास राज्य हैं। सो, वहां पुलिस की भी कई श्रेणियां और दायित्व हैं। पहली है म्युनिसिपल पुलिस- ये स्थानीय नगरीय निकाय के अधीन काम करती है। दूसरे हैं-शेरिफ और उनके सहायक। ये देश की काउंटीज (जिले के समकक्ष) के गैर नगरीय क्षेत्र में काम करते हैं। जेल भी इसी पुलिस के अधीन होती है। तीसरी है- स्पेशल जुरीडिक्शन (विशेष अधिकार क्षेत्र)। ये एक लोकल पुलिस होती है, जो उन क्षेत्रो में काम करती है, जो न काउंटी में आता है और न ही नगरीय क्षेत्र में, इसमें काॅलेज, फारेस्ट और यूनिवर्सिटी कैम्पस आदि शामिल हैं। चौथी है स्टेट ट्रूपर्स- ये पुलिस बुनियादी तौर पर हाइ वे पर काम करती है। वहां अपराधों को रोकना तथा कानून व्यवस्था लागू करना इसका काम है। पांचवी है संघीय कानून प्रवर्तक ( पुलिस)। इस पुलिस का काम मूलत: अमेरिका के संघीय कानूनो का पालन कराना है। इसमें सर्वाधिक प्रसिद्ध फेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआई) है। इस पुलिस के भी कई प्रकार हैं। कुछ पुलिस सेवाएं तो हमारे लिए अनोखी हैं, मसलन जैसे कि यूएस मिंट पुलिस। इसका काम कीमती धातुओं की रक्षा करना है। इनके अलावा अमेरिकी सरकार और राज्य सरकारों के करेक्शनल ऑफिसर्स भी होते हैं, जिनका काम जेल में कानून प्रवर्तन करना है।

यह सब बताने का मकसद‍ सिर्फ इतना है कि हमारे यहां और वहां की पुलिस में व्यवस्थागत और उन्मुखीकरण के हिसाब से कितना फर्क है। इससे भी महत्वपूर्ण दोनो देशों की पुलिस का चरित्र और मानसिकता है। हमारे यहां कोरोना जैसी आपदा में भी ‍वरिष्ठ पुलिस अफसर चैन की बंसी बजा सकते हैं, जबकि मैदानी अफसर अपना खून- पसीना एक कर रहे हैं। अफसोस की बात तो यह है कि डीजीपी की चिट्ठी का भी इन अफसरों पर कोई सकारात्मक असर हुआ हो, ऐसा नहीं लगता। उधर अमेरिका में एक पुलिस अफसर की ज्यादती के बाद पूरा पुलिस विभाग शर्मिंदगी के दौर से गुजर रहा है, साथ ही मिनेपोिलस की स्थानीय सरकार पुलिस ज्यादती के कलंक को मिटाने के लिए पुलिस ‍िवभाग को ही तिलांजलि देने जा रही है। क्योंकि जो पुलिस जनता की सेवा और सम्मान नहीं कर सकती, उसे बनाए रखने का भी क्या औचित्य है?

इसी सदंर्भ में हमारे यहां कोरोना संकट से जूझ रहे सरकारी विभागों और उनके अधिकारी-कर्मचारियों की बात करें तो मप्र में कुल 68 विभागों में से करीब 1 दर्जन विभाग ही मैदान में पूरी सक्रियता के साथ कोरोना से रात-दिन जूझ रहे हैं। लेकिन बाकी 60 विभागों का इस लड़ाई में क्या योगदान है (सिवाय लाॅकडाउन एज्वाॅय करने के)? जबकि वेतन-भत्ते सरकार उन्हें भी पूरे देने को बाध्य है। यानी मूल सवाल काम ( आउट पुट) का है और अगर वह शून्य या नकारात्मक है तो उस पर जरूरी कार्रवाई करने का है। मिनेपोलिस की तरह अगर पुलिस को मैदान से हटा लिया जाए तो कानून-व्यवस्था की क्या स्थिति बनेगी, यह गंभीर बहस का विषय है, लेकिन मप्र की तरह शीर्ष स्तर पर पुलिस की आराम तलबी का क्या और कैसे इलाज हो, इस पर भी संजीदगी से सोचना जरूरी है। डीजीपी की चिट्ठी तो इस शर्मनाक सचाई को ही उजागर करती है कि वरिष्ठ पुलिस अफसरों की दिलचस्पी दफ्तर में कुर्सी तोड़ते रहने में भी नहीं है। तो क्या इस देश में सरकारी नौकरी केवल रिटायरमेंट तक वेतन-भत्ते और सुख-सुविधा उठाने का बीमा है? अगर ऐसा है तो आश्चर्य नहीं कि हमारे यहां भी मिनेपोलिस सिटी कौंसिल की तरह कोई फैसला करना पड़े।