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गोवर्धन पड़वा के शुभ मुहूर्त, पूजा का महत्व तथा कथा

Posted on: 08 Nov 2018 09:30 by shilpa
गोवर्धन पड़वा के शुभ मुहूर्त, पूजा का महत्व तथा कथा

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अर्थात दीपावली के अगले दिन अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है। इस साल गोवर्धन पूजा का त्योहार दिवाली के अगले दिन यानि 8 नवंबर को मनाया जाएगा।गोवर्धन वाले दिन गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक रूप बना कर श्रीकृष्ण, इंद्रदेव, वरुणदेव, गायें, ग्वाल-बालों, राजा बलि और अग्निदेव का पूजन किया जाता है

आये देखते है गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्ततिथि – 8 नवंबर 2018, दिन गुरुवार

गोवर्धन पूजा मुहूर्त –
प्रातः 06:42 बजे से 08:51 बजे तक
दोपहर बाद 03:18 बजे से सायं 05:27 बजे तक

प्रतिपदा तिथि
7 नवंबर रात 09:31 बजे से
8 नवंबर रात 09:07 बजे तक

कई जगह इस दिन विष्णु अवतार वामन की राजा महाबलि पर विजय के रूप में भी मनाया जाता है और इसे ‘बलि प्रतिपदा’ व ‘बलि पड़वा’ भी कहा जाता है।

गोवर्धन पूजा का महत्व तथा कथा
प्राचीन समय की बात है, श्रीकृष्ण पशुओं को चराते हुए अपने मित्र ग्वालों के साथ गोवर्धन पर्वत जा पहुंचे थे। वहा उन्होंने देखा कि बहुत से लोग मिलकर एक उत्सव मना रहे थे। जिसकी वजह पूछने पर उन्होंने श्रीकृष्ण को कि मेघ व देवों के स्वामी इंद्रदेव की पूजा होगी जिससे प्रसन्न होकर देव वर्षा करेंगे तो खेतों में अन्न उत्पन्न होगा और ब्रजवासियों का भरण-पोषण होगा।

यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले कि इंद्र से अधिक शक्तिशाली तो गोवर्धन पर्वत है। जिनके कारण यहाँ वर्षा होती है और सबको इंद्र से भी बलशाली गोवर्धन का पूजन करना चाहिए। लोग कृष्ण की बात मानकर श्री गोवर्धन की पूजा करने लगे

जब इंद्रदेव को यह मालूम हुआ तो वे अत्यंत क्रोधित हुए और मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर मूसलाधार बरसात करें। अति वर्षा से भयभीत होकर ग्वाले श्रीकृष्ण के पास गए। श्रीकृष्ण ने सबको गोवर्धन-पर्वत की शरण में जाने की बात कहीं। ग्वाले अपने पशुओं समेत गोवर्धन की शरण में आ गए।

इन्द्रदेव की आज्ञा से निरंतर सात दिन तक बादल बरसते रहें लेकिन श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र की वजह से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं गिरी। इन्द्रदेव का अहंकार को चूर-चूर हो चूका था। यह चमत्कार देख हैरान रह गए इन्द्रदेव को जब ब्रह्माजी ने बताया कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार है तो इंद्रदेव ने श्रीकृष्ण से क्षमायाचना की। जब सातवें दिन गोवर्धन पर्वत को भूमितल पर रखा था। तभी से हर साल गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया जाता है।

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