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जरूरत तो यात्रियों से ज्यादा रेलवे को अपनी ‘चंपी’ कराने की है…

Posted on: 17 Jun 2019 09:05 by Pawan Yadav
जरूरत तो यात्रियों से ज्यादा रेलवे को अपनी ‘चंपी’ कराने की है…

अजय बोकिल
महान शायर साहिर लुधियानवी ने सोचा भी न होगा कि फिल्म ‘प्यासा’ के लिए उनके लिखे मजाकिया गीत ‘ सुन सुन अरे बेटा सुन, इस चंपी में बड़े-बड़े गुण’ को भारतीय रेलवे 62 साल बाद इतनी गंभीरता से लेगी कि पश्चिम रेलवे चंपी मालिश को नवाचारी स्टार्ट अप मानकर रेलवे में इसे लागू करने का ऐलान कर देगी। यह बाद दूसरी है कि भारी‍ विरोध के बाद एक पखवाड़े में ही चंपी के जरिए माल कमाने की इस योजना पर उस्तरा चल गया।

हो सकता है कुछ चंपी पसंद लोग भारतीय रेलवे के इस नवाचारी स्टार्ट अप की भ्रूण हत्या से निराश हों, लेकिन ज्यादातर लोग इस बात से हैरान है कि रेलवे के मर्ज की यह कैसी दवा रेल अफसरों ने खोजी। खासकर तब कि जब भारतीय रेलवे में बुनियादी यात्री सुविधाअों जैसे बेहतर कोच, स्वच्छता, समय पर परिचालन और भीड़ से निजात की तुरंत आवश्यकता है।

भला हो, भाजपा नेता सुमित्रा महाजन और सांसद शंकर ललवानी का जिन्होंने इस योजना को अव्यावहारिक ( परोक्ष रूप में मूर्खतापूर्ण) बताकर विरोध ‍िकया और पश्चिम रेलवे ने आनन फानन में योजना वापस ले ली। हालांकि इस कदम से खफा चंपी मालिश कंपनी ने रेलवे के खिलाफ कोर्ट में मामला दायर करने की धमकी दी है। रेल मंत्री पीयूष गोयल से इस फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए कंपनी ने कहा है कि इस योजना का टेंडर पास करने के बाद योजना को एकतरफा कार्रवाई करना चंपी कंपनी के पेट पर लात मारने जैसा है।

रेलवे की यह ‘चंपी मालिश योजना’ इंदौर से चलने वाले 39 ट्रेनों में लागू होने वाली थी। नवाचारी स्टार्ट अप को बढ़ावा देने की नीति के तहत एक ‍िनजी कंपनी ‘कैलिप्सो’ को चलती रेल में यात्रियों के चंपी मालिश का ठेका दिया गया। भोली सोच यह थी कि लंबी दूरी के यात्रियों को हाथ पैर और सिर की मालिश करवाकर ट्रेन में ही यात्रा की थकान मिटाने में मदद मिलेगी।

कंपनी संचालक का दावा है कि उन्हे रेलवे ने एक साल का आशय पत्र भी दिया था। उसी के हिसाब से कंपनी ने तैयारियां भी कर ली थीं। प्रस्ताव था कि रेलों में सुबह 6 से रात 10 बजे के बीच यह सुविधा तीन श्रेणियों में होगी, जिसके लिए क्रमश: सौ, दो सौ और तीन सौ रूपए चार्ज किए जाएंगे। अनुमान यह था कि साल भर में करीब 20 हजार यात्री इस सुविधा का लाभ लेंगे, जिससे पश्चिम रेलवे को 90 लाख रू. की अतिरिक्त कमाई होगी। लेकिन कुछ लोगों द्वारा योजना को लेकर ‘गलत फहमियां’ फैलाने की वजह से रेलवे ने अचानक योजना रद्द कर दी।

मतलब यह ‍कि यह योजना वास्तव में रेलवे की कमाई बढ़ाअो प्लान के तहत निकली थी। भारतीय रेलवे का बजट 1 लाख 40 हजार करोड़ का है। लेकिन जैसे जैसे इसका विस्तार होता जा रहा है, यात्री सुविधाअों में सुधार होने के बजाए, उनकी और दुर्गति होती जा रही है। आज तो शताब्दी और राजधानी एक्सप्रेस जैसी वीआईपी ट्रेनों में न्यूनतम सुविधाएं चाक चौबंद होंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। परेशान यात्री असुविधा की शिकायत किससे करें और उन्हें कौन सुनेगा, सुनने पर कोई कार्रवाई होगी ही यह कोई दावे के साथ नहीं कह सकता। सबसे बुरी हालत साफ सफाई और रेल सुरक्षा की है। इसे कैसे और कौन सुधारेगा, समझना मुश्किल है।

आज रेलवे मे संरचनात्मक बदलाव की जरूरत है, लेकिन इसे पेशेवर ढंग से करने की जगह लोक लुभावन सियासत के रेड सिग्नल में उलझ जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि रेलवे में सब खराब ही खराब है। कुछ अच्छी बातें भी हैं, लेकिन आज समाज का एक बड़ा वर्ग पैसे के बदले में बेहतर सुविधा और बेहतर सुविधाअों के बदले ज्यादा पैसा देने को तैयार है। इसके बाद भी बात वैसी न बने तो सिर चकराना जायज है।

सवाल यह है ‍कि चलती रेल में यात्रियों की चंपी का ‘सुविचार’ आया कहां से? हो सकता है कि रेल यात्रा के दौरान होने वाली परेशानियों से अस्थायी निजात दिलाने के लिए रेलवे ने सोचा हो कि क्यों न यात्रियों की चंपी कर इन परेशानियों को भुलवा दिया जाए। कहा जाता है कि बाॅडी मसाज से शरीर में रक्त प्रवाह सुचारू हो जाता है। तनाव से मु्क्ति मिलती है और कुछ देर के लिए ही सही व्यक्ति खुद को ‘जन्नत’ में पाता है। ऐसे में रेलवे के रांडी रोने भी सहजता से भूल जाएगा।

योजना के विरोध का मुख्य कारण यह था कि योजना मुख्य रूप से पुरूष केन्द्रित थी। क्योंकि चलती रेल में ( शौकीन) मर्द यात्री तो मसाज करवा लेते, लेकिन महिलाअोंका क्या? भारतीय महिलाएं अभी इतनी आधुनिक नहीं हुई है कि रेलवे की माली सेहत सुधरवाने के लिए खुले आम बाॅडी मसाज करवाने का शौक पालें। ऐसा करना लाजमी भी है तो रेल को कोच में अलग से लेडिज मसाज कम्पार्टमेंट बनवाने पड़ते। योजना में यह भी साफ नहीं था कि मसाज मर्द मालिशिए ही करेंगे या फिर इसमें स्त्री समानता का सिद्धांत भी लागू होता।

यहां बुनियादी सवाल यह है कि क्या रेलवे के पास अब रेवेन्यू बढ़ाने का कोई और सार्थक उपाय नहीं बचा है, जो वह चंपी मालिश के जरिए धन जुटाने पर विवश है। इसके पक्ष में एक तर्क हो सकता था कि जब पकौड़े तलने और बैंड बजाने जैसे व्यवसाय बेरोजगारी मिटाने के सिफारिशी विकल्प हैं तो मालिश करने वालों ने ऐसी कौन सी नस दबा दी, जिसका विरोध किया जाए। वावजूद इसके चंपी मालिश रेल यात्रियों की प्राथमिकता में न तो कभी था और न रहेगा। क्योंकि चलती या‍‍त्रा में मालिश करवाना आरती के दौरान ही प्रसाद डकारने जैसा है।

यूं भी शरीर की मालिश कराना या न कराना निजी मामला है। उसके लिए दूसरे संसाधन भी हैं। और फिर मालिश शारीरिक थकान मिटा भी दे, लेकिन रेल सफर के दौरान ( अक्सर) होने वाले मानसिक संत्रास के लिए रेलवे क्या अोझाअोंको ठेका देने पर विचार करेगी? गनीमत है कि रेल में चंपी का चैप्टर रेल यात्रियों पर मालिश का ‘एक तगड़ा हाथ’ पड़ने के पहले ही क्लोज हो गया। होना तो यह चाहिए कि रेलवे स्टार्ट अप को बढ़ावा दे, लेकिन अपने दिमाग की चंपी कराकर…!

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