सतीश जोशी

हमारी संस्कृति, सनातन परंपरा और रिवाज सत्तर साल पहले धर्मनिरपेक्षता के भेंट चढ गये हैं।  इसके लिए कौन दोषी है ? हमारी सनातन परंपरा का खलनायक कौन है? क्या वे जो इसके नाम पर राजनीति करते हैं। कौन करते हैं राजनीति ? जो सनातन परंपरा, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद करते हैं वो या वे जिनको इस झंडाबरदारी से तकलीफ है। आस्थाओं के सवाल खडे करने वाले खलनायक हैं या आस्था को दरकिनार कर मुल्क चलाने की पैरवी करते हैं वे खलनायक हैं।

धर्मनिरपेक्ष या धर्मसापेक्ष की बात करने वाले खलनायक हैं? रोटी, रोजगार, व्यवसाय के सवालों के नाम पर आस्थाओं का अपमान करने वाले भारत के असली नायक हैं या इन सवालों की कीमत पर आस्था की उपेक्षा करने  वाले नायक हैं।  लोकतंत्र में इन सवालों के जरिये आम आदमी के अधिकारों की रक्षा की जा सकती है या लोकतंत्र के लिए इन सवालों को सबसे बडा रोडा समझा जाए? अम्बेडकर के लिखे और विद्वानो के मंथन से जो संविधान हमारे सत्ता संचालन की भूमिका अदा कर रहा है, उसने अपने कागजो में कहीं,  परंपरा, सनातन भारत और सांस्कृतिक आस्थाओं को लेकर क्या कहा है, विधि विशेषज्ञ इस पर प्रकाश डाल सकते हैं या नहीं।

क्या अम्बेडकर ने किसी पंक्ति में यह लिखा या लिखवाया कि सवर्णो के बाप-दादाओ के कथित अत्याचार की सजा आज के सवर्णो को आजादी के कितने साल बाद तक भुगतनी होगी। भारत की बौद्धिक क्षमता का प्रतिशत कब समान रूप से चालीस से नब्बे प्रतिशत एक समान होगा। वोट के सौदागरों को तो बोलने में नानी-दादी याद आएगी, वकीलों की कौम संविधान पढकर विश्लेषण करे कि आज के सवर्णो को और कितने साल सजा भुगतनी है।

सवर्णो के  बाप-दादाओ ने कुए पर पहरे लगा दिए थे, बावड़ी अलग कर दी थी, बस्ती अलग थी, मंदिरों में प्रवेश नहीं था, अब तो वह भेदभाव नाम मात्र का ही है। इसलिए योग्यता का पैमाना कब बदलेगा, यह पूछा जा सकता है या पूछने वाले खलनायक करार दिए जाएंगे। आस्था और योग्यता ये दो ऐसे सवाल हैं जिन पर बोलने वाले किसी की नजर में नायक, किसी की नजर में खलनायक हैं।  आस्था पर बोलने वाले का एक वर्ग, समाज के हर वर्ग में मिल जाएगा, पर उसकी भी राजनीतिक भूख आस्था के साथ पूरा न्याय नहीं कर रही। योग्यता आखिर न्याय की किस दहलीज पर पैरवी करे? है कोई जवाब आज की व्यवस्था के पास !