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ऐसे करें गरीबों की मदद…! ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

Posted on: 20 Jun 2018 17:56 by Lokandra sharma
ऐसे करें गरीबों की मदद…! ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

देश में कहीं भी चले जाओ हर धार्मिक स्थल पर आपको भीख मांगते हुए गरीब लोग दिख जाएंगे। ये वास्तव में वे लोग होते हैं, जो काम की तलाश में गांव से शहर में आते हैं। काम न मिलने के कारण पहले मजबूरी में और फिर बाद में आदतन भिखारी बन जाते हैं। सड़कों के फुटपाथ पर या खाली प्लाटों पर झोपड़ी बनाकर या खुले में रहने के आदी ये अत्यंत गरीब लोग चाहें तो काम कर सकते हैं, लेकिन इनको कोई काम दिलाने की दिशा में काम नहीं करता। सरकार भिक्षावृत्ति पर रोक लगाने के लिए हजारों करोड़ रुपए आजादी से लेकर अब तक खर्च कर चुकी है। लेकिन नतीजा नहीं निकल पाया। हर चौराहे पर भी मजबूत हट्टे-कट्टे और काम करके पेट भर सकने वाले लोग दिखते है, लेकिन यह मांगने की आदत इतनी खराब होती है की एक बार मुफ्त का पैसा मिलने पर फिर ये मेहनत करके कुछ कमाना नहीं चाहते।

क्या ऐसे लोगों को हम यह नहीं कह सकते कि वह कोई काम करें। ज्यादा नहीं तो मजदूर चौक पर जाकर खड़े हो जाएं वहां पर रोज नहीं तो महीने में बीस दिन मजदूरी मिल जाएगी। अब तो गांव में रहने वाले ऐसे गरीब लोगों को मजदूर नाम दे दिया है। सरकार ऐसे मजदूरों को हर महीने अनाज मुफ्त में देती है। यदि हम चाहे तो देश में भिखारियों की संख्या लगातार कम हो सकती है। उसका एक प्रैक्टिकल उदाहरण यह है कि मैंने अपने मित्र से कहा कि उनकी फैक्ट्री में कितने लोगों की आवश्यकता होती है,तो वे बोले हम दैनिक वेतन पर मजदूरों को काम देते हैं।

यदि आपको कोई ऐसा व्यक्ति लगता है, जो काम करके पैसे कमा कर मेहनत की रोटी खाना चाहता है तो आप मेरे यहां जरूर भेज दें। क्या इस तरह का काम सब लोग नहीं कर सकते। कई घरों में अभी हालत ये है कि काम करने वाली महिलाएं नहीं मिल पाती। जो गरीब लोग सड़कों पर भीख मांगते हैं वह अपनी पत्नी और बच्चों को घर के काम के लिए भी लगा सकते हैं। मेरे कई मित्रों ने ऐसे लोगों को पकड़ा है और उन्हें घर में काम पर लगाया है।

कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं भिखारियों को भीख मांगने से रोका गया और फिर उनको कार साफ करने जैसे काम पर लगाया गया। इंदौर में मेरे मित्र अपना स्वीट्स के संचालक प्रकाश राठौर ने अपनी दुकानों पर बोलने में असमर्थ लोगों को काम पर रखा है। ऐसे हजारों काम है जो अनपढ़ और अनुभवहीन लोग कर सकते हैं। दिन में आठ-दस घंटे नहीं तो पांच-छः घंटे तो काम कर ही सकते हैं। यदि इस तरह से हमने भीख मांगने वाले लोगों को काम पर लगा दिया, तो निश्चित रुप से एक सार्थक काम होगा। जब भी कोई व्यक्ति इस तरह का ऐसा ही मिले तो उसको कहीं नहीं कहीं एक बार काम करने का मौका जरूर दिया जाना चाहिए।

जिस तरह से आज कल चौराहों पर तेज धूप और बारिश के साथ ही कड़ाके की ठंड में भी कई गरीब लोग छोटे-छोटे सामान बेचते हुए दिखाई देते हैं। उनसे सामान जरूर खरीदना चाहिए क्योंकि यदि हम उनसे सामान खरीदते हैं, तो उनका एक दिन का पेट भरने का इंतजाम हो जाता है। वैसे भीख मांगने वालों का भी एक गिरोह है। कई लोग इनको संचालित करते हैं। जितना पैसा इनके पास आता है, वह सब इकट्ठा करते हैं और वह पैसा पूरा भिखारी को न देते हुए कुछ रुपए उन्हें देते हैं। यदि इन भिखारियों को हमने काम पर लगाया तो वह नशाखोरी से भी बच सकते हैं।

इस तरह के प्रयास करने के लिए सरकार और समाज कि नहीं मेरी नजर में व्यक्तियों की जरूरत है यदि एक परिवार का एक व्यक्ति भिखारी को भीख मांगने से रोककर काम दिला देता है तो यह सच्ची मानव सेवा कहलाएगी। देखने में आता है कि भिखारियों को कई बार खासतौर से कार वाले बड़े हिकारत की दृष्टि से देखते हैं और उनको पैसे फेंक कर देते हैं। यह देख कर आंखें नम हो जाती है लेकिन समाज का ताना बाना अब ऐसा होता जा रहा है कि लोगों की मानसिकता तेजी के साथ बदलती जा रही है। हम ऐसे लोगों के लिए एक दिन घंटे दो घंटे का समय निकालकर कोई सार्थक काम कर सकते हैं।

यह काम बिना प्रचार-प्रसार के भी हो सकता है। वैसे जिन चौराहों पर यह भिखारी भीख मांगते हैं वहां के आसपास के दुकानदार भी इनको अपने यहाँ किसी न किसी काम के लिए लगा सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो हम इनकी नई पीढ़ी जो छोटे-छोटे बच्चे गोद में लेकर घूमते हैं उनका भी भविष्य बना सकते हैं। वही बच्चे सरकारी स्कूल में भी पढ़ने लगेंगे तो कुछ उन्हें सीखने को मिल जाएगा। जिसके आधार पर वह और उनकी आने वाली पीढ़ी भी भीख नहीं मांगेगी। इस तरह के प्रयास हम सब शुरू करें। अपने स्तर पर यदि ऐसा हमने किया तो आप समझ लीजिए कि हमारा मानव जीवन सफल हो गया।

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