विलुप्त होते अख़बार, महज 3 साल में हो जाएंगे बंद

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पत्रकारिता को जन्म देने वाले अख़बार अब अपने बुढ़ापे में आ गए हैं। उनके वही हाल हो रहे हैं, जो आम तौर पर एक बुजुर्ग के होने चाहिए। मरणासन स्तिथि में पड़े कई अख़बार या तो दम तोड़ चुके हैं या लोकसभा चुनाव का वेंटीलेटर हटते ही दम तोड़ देंगे। एक सर्वे से पता चला है कि आने वाले 3 से 5 साल बाद पत्रकारिता का पारम्परिक तरीका विलुप्त हो जायेगा।

डिजिटल मीडिया और मोबाइल्स एप ने अख़बारों की विज्ञापन रूपी ऑक्सीजन को अपनी और मोड़ लिया है। कई अख़बारों के पास तनख्वाह देने के पैसे नहीं है। दिनभर विज्ञापनों का गल्ला देखने वाले अख़बार मालिकों ने पत्रकारों को निकालना शुरू कर दिया है। एक बड़े अख़बार ने कई एडिशन बंद किये हैं, तो दूसरा अपने सारे ब्यूरो बंद करने जा रहा हैं। देशभर से एक जैसी सूचनाएं मिल रही हैं. जिन भी पत्रकार साथियों से बात हो रही हैं, वो नौकरी ढूंढने की बाते बता रहे हैं। समस्या उन लोगो की ज्यादा हैं जो अपनी बाइलाइन लिखने और देखने में इतने बिज़ी थे, कि खुद को अपडेट ही नहीं किया। वो कलेक्टर और एसपी के फोन उठाने में ही खुश थे।

कुछ को लगा “भिया” कि विज्ञप्ति लगा के काम हो जायेगा. इसलिए नौकरी के लाले ज्यादा पड़ रहे हैं। समय है पत्रकार खुद को उपडेट करें, सम्पादकों के केबिन में बैठ कर अब नौकरी नहीं बच पायेगी। डेली हंट, इंशोरट्स, रोज़बज़, बज़फ़ीड, जैसे एप्स पर नज़र डालें। पश्चिमी देशों की तरह पत्रकारिता के नए आयामों और सुचना तंत्र पर काम करें।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इसे पहले भाप लिया था, तो डिजिटल पर बहुत पहले ही काम शुरू कर दिया था, बाकी आने वाले समय में आपको कभी भी पता चलेगा कि “पहले न्यूज़ के लिए अख़बार निकलते थे, जिसमे एक दिन पहले कि ख़बरें आती थीं” अल्लाह मालिक।

( विहंग सालगट )