नितिनमोहन शर्मा

सरकारी ला कॉलेज में चल रही हिंदुत्व विरोधी पाठशाला मूददे ने तूल पकड़ लिया है। एबीवीपी का कहना है कि जिन पुस्तकों पर विवाद हुआ, उनका इस्तेमाल देश के खिलाफ ‘ भीम-मीम’ थ्योरी स्थापित करने के लिए किया जा रहा था। हिन्दू धर्म और समाज के विरुद्ध जहर उगलती ये पुस्तकें सिर्फ अनुसूचित जाति और जनजाति के स्टूडेंट्स को ही मुफ्त दी जाती थी। इस पुस्तक में लिखा गया है कि ब्राह्मण दलितों और शूद्रों को गुलाम बनाना चाहते है।

यही नही, कॉलेज का जम्मू कश्मीर कनेक्शन भी सामने आया। कालेज में नियम से परे जाकर कश्मीरियो को फैकल्टी भी बनाया गया। अथिति प्रोफेसर्स के मामले में भी वर्ग विशेष को तरजीह दी गई जबकि मालवा निमाड़ अंचल के कई गरीब परिवारों के स्टूडेंट्स भी पात्रता रखते थे। इसके बाद कॉलेज के प्राचार्य इमानुल रहमान की भूमिका संदिग्ध हो गई है। उनका इस्तीफा प्रकरण भी संदेह के दायरे में आ गया है। उन्होंने विभाग के प्रिंसिपल सेकेट्री को इस्तीफा न देते हुए आयुक्त को दिया जो नियम विरुद्ध है।

सबसे चौकाने वाली जानकारी ये सामने आई है कि विवादित पुस्तक डॉ सुधा सिलावट के ला कॉलेज के प्राचार्य रहते खरीदी गई। डॉ सिलावट…कुछ दिन पहले तक अतिरिक्त संचालक उच्च शिक्षा रहे और वर्तमान में होलकर कॉलेज के प्रभारी सुरेश सिलावट ‘ पप्पू ‘ की पत्नी और मंत्री तुलसी सिलावट की बहू है। फ़िलहाल वे राउ शासकीय कॉलेज में पदस्थ है। अब सुरेश सिलावट ही जांच करेंगे कि दोषी कौन?

उधर ख़ुलासा फर्स्ट के खुलासे के बाद उच्च शिक्षा विभाग से जुड़े दर्जनों जिम्मेदारों ने फ़ोन कर के बताया कि विभाग में एक रैकेट दो ढाई दशक से सक्रिय है जो प्रोफेसर्स ओर अन्य कर्मचारियों के ट्रांसफर ओर पोस्टिंग के साथ ब्लैकमेलिंग का काम कर रहा है। इन सबका मास्टर माइंड ही ताजा मामले के पीछे है। सरकार को इस पूरे मामले की गम्भीरता से जांच कराने चाहिए ताकि मुख्य मास्टरमाइंड गिरफ्तार हो।

आरएसएस की स्टूडेंट विंग एबीवीपी ने पूरे मामले ने मैदान।पकड़ लिया है। परिषद अगर इस मसले को पकड़ती नही तो शहर का यर कॉलेज में ‘ जेएनयू ‘ जैसी गतिविधियां सामने ही नही आती। परिषद ने इस मसले पर मातृसंस्था आरएसएस से उम्मीद की है कि अब उच्च शिक्षा विभाग में पसरी उस मानसिकता का सफाया होना ही चाहिए जो 20 साल से हिंदुत्व विरोधी पाठशाला की जिम्मेदार है।

सत्ता की सरपरस्ती, प्रोफेसर्स प्रताड़ित

उच्च शिक्षा विभाग में सत्ता की सरपरस्ती में एक ऐसा गिरोह न केवल पनपा बल्कि स्थापित हो गया जिसके कारण पूरा उच्च शिक्षा विभाग जैसा महकमा एक तरह से गुंडा तत्वों के हवाले हो गया। ख़ुलासा के खुलासे के बाद जो जानकारियां सामने आई, वो उच्च शिक्षा के पेशे के लिहाज से बेहद डरावनी ओर शर्मनाक भी है। ट्रांसफर ओर पोस्टिंग माफिया से लेकर ब्लैकमेलिंग जैसे काम भी सत्ता की पनाह में होने लगे। प्रोफेसर्स की जानकारियां निकलना ओर फिर आरटीआई के जरिये ब्लैकमेलिंग का काम इस कदर विभाग के हावी है कि कई प्राचार्य ओर प्रोफेसर्स बीमार तक हो गए। कई ने वक्त से पहले वीआरएस ले लिया।

इसी लॉ कॉलेज की पूर्व प्राचार्य को तो इतना प्रताड़ित किया गया कि वे अपना मानसिक संतुलन खोते खोते बच तो गई लेकिन असाध्य रोग का शिकार हो गई। प्राचार्य की गलती बस ये थी कि उन्होंने इस रैकेट से जुड़े किसी शुक्ला के बेटे की नियम विरुद्ध नियुक्ति को मंजूरी नही दी। उसके बाद उनका ट्रांसफर से लेकर उन्हें डराने धमकाने से लेकर अश्लील गलियों के फ़ोन तक किये। प्राचार्य ने पुलिस की शरण भी ली लेकिन सत्ता की सरपरस्ती ने पुलिस के हाथ बांध दिए। खुलासा के पास ये सब दस्तावेज है जो बताते है कि किस तरह उच्च शिक्षा विभाग में एक रैकेट संचालित है और किस तरह इस विभाग पर कब्जा जमाए हुए है।

मंत्री भी नाराज, रघुवंशी दमदार

इस रैकेट की पूरी जानकारी उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव तक पहुंच गई है। वे भी इस पूरे प्रकरण पर नाराज है और सख़्त जांच की बात।कह रहे है। असली काम भाजपा के वरिष्ठ नेता बाबूसिंह रघुवंशी ने किया था। उन्होंने वो छात्रवृत्ति घोटाला पकड़ा था जिसमे करोड़ो रूपये छात्रों को देने की बजाय हड़प लिया गया था। तब सुरेश सिलावट का तबादला भिंड कर दिया गया था। रघुवंशी के पास आज भी इस घोटाले के सबूत सहित दस्तावेज है। लेकिन सत्ता की भूख ने भाजपा को विचारधारा से भी परे कर दिया। सरकारी लॉ कॉलेज का ताजा मामला इसका उदाहरण है।