तीन दशक बाद नजर आया कांग्रेस का पुराना तैवर, भाजपा के गढ़ में सीधे चुनौती से सकते में नेता

इंदौर जैसे भाजपा के गढ़ में कांग्रेस ने जिस अंदाज में चुनौती दी इसकी चर्चा आज चारो और है। इसमे कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला ने अपने बूते मुकाबले को इतना जटिल बना दिया कि पूरी भाजपा को सड़क पर उतरना पड़ गया।

इंदौर, प्रदीप जोशी। निगम चुनाव का परिणाम किसके पक्ष में आएंगा यह तो बाद में पता चलेगा मगर छोटे चुनाव में बड़ी सियासत के मायने जरूर लोग तलाश करने में जुट गए है। इंदौर जैसे भाजपा के गढ़ में कांग्रेस ने जिस अंदाज में चुनौती दी इसकी चर्चा आज चारो और है। इसमे कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला ने अपने बूते मुकाबले को इतना जटिल बना दिया कि पूरी भाजपा को सड़क पर उतरना पड़ गया। खुद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भाजपा प्रत्याशी का नामांकन जमा करवाने सहित तीन बार इंदौर आना पड़ा। यहीं नहीं मुख्यमंत्री भाजपाईयों को धमकी भरी हिदायत देने में भी पीछे नहीं रहे। ना सिर्फ सीएम बल्कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा, केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी इंदौर की सड़के नापना पड़ गई। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय तो पूरे चुनाव में सक्रिय रहे।

चर्चा में विजयवर्गीय की फुर्सत
लोग भी अचरज में थे कि महाराष्ट्र सहित तमाम राष्ट्रीय मुद्दों के चलते विजयवर्गीय इतनी फुर्सत में कैसे। बहरहाल यह पार्टी द्वारा दी जाने वाले जिम्मेदारी का मसला हो सकता है, शायद पार्टी ने उन्हें इन मसलों से दूर रखा होगा, खेर जो भी हो इस चुनाव में विजयवर्गीय की मेहनत से इंकार नहीं किया जा सकता। उस मेहनत को जनता ने कितनी तवज्जों दी ये शहर की जनता ने भली प्रकार देखा भी। उनके रोड़ शो या तो उनके पुत्र की विधानसभा क्षेत्र में हुए या फिर उनके गृह क्षेत्र में।

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निराश कार्यकर्ता का मिजाज नहीं पहचान पाए
मेने पहले भी लिखा था कि हैरान है भाजपा के देव दुर्लभ कार्यकर्ता, सच में हैरान ही है क्यों कि ये कार्यकर्ता बूथ से मेहनत करते रहे है। इस चुनाव में ऐसा कुछ नहीं दिखा, जिन कार्यकर्ताओं की जेब में हर एक वोटर्स की लिस्ट हुआ करती थी, जिन्हे यह पता होता था कि बूथ के किन लोगों ने वोट डाल दिया, कौन रह गया अथवा कौन बाहर है, यह सब इस चुनाव में नहीं दिखा। दिखता भी कैसे, कार्यकर्ता तो निराश भाव में है, यह आज की बात नहीं बल्कि सत्ता प्राप्ती यानी सिंधिया गुट को शामिल करने के बाद की है। जिस भाजपा ने सत्ता के लिए कभी कोई समझोते नहीं किए वो हर समझोते पर राजी हो यह कार्यकर्ताओं को रास नहीं आया। यहीं हाल महापौर प्रत्याशी चयन को लेकर भी हुआ। यहीं कारण रहा कि इस चुनाव में कार्यकर्ता अनमने भाव से चुनाव में जुटा रहा। चुनाव परिणाम भले पक्ष में आ जाए मगर इस बात को तो मानना पड़ेगा कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं के मिजाज को पहचान नहीं पाई।

एक अकेला इस शहर में
कांग्रेस में यह तय है कि जिसे टिकट मिले उसे अकेले ही किला लड़ाना होता है। संजय शुक्ला इसमे अपवाद निकले। उन्होंने ना सिर्फ अकेले जंग लड़ी बल्कि 85 वार्डो में भी पार्षद प्रत्याशियों के लिए जोर लगाया। शुरूआत में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ उनके समर्थन में आए, फिर राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा आए। इसके बाद सारा किला अकेले संजय ने ही लड़ाया। संजय के चुनाव मेनेजमेंट कि मिसाल देना होगी कि उनसे निपटने के लिए पूरी भाजपा को सड़क पर उतरना पड़ा। अगर चुनाव परिणाम उनके पक्ष में रहा तो भाजपा के तमाम लीडर को सोचना पड़ेगा कि उनकी हैसियत क्या बची है।