नितिनमोहन शर्मा। बहुत याद आओगे इस शहर को सिंह साहब आप। जब भी ये शहर, सफाई के मूददे पर देश मे वाहवाही बटोरेगा। जब जब माफ़िया सर उठाएंगे ओर लगे हाथ जमीदोंज होंगे। जब सताए मजलूमों के साथ न्याय होगा, जब जब मक्कार अमला पसीना बहाते दिखेगा। तब तब बहुत याद आओगे सिंह साहब आप।

अकड़, घमंड ओर रसूख के साथ जब जब कोई अति करेगा। उसके अंत के लिए आप याद किये जाओगे। किसी जनहित, शहर हित के मसले पर दो टूक राय और तुरंत अमल की बात होगी। शिद्दत से याद आओगे। मसला स्कूली बच्चो की फीस को हो या घर मे कैद बुजुर्गों के साथ होते दुर्व्यवहार का, या फिर किसी के मकान दुकान, खेत खलिहान के कब्जे से मुक्ति का आप ही आप याद आओगे। बेशकीमती सरकारी जमीनों को अतिक्रमण मुक्त करना हो या फिर कालोनी काटने के नाम पर शहर में फलेफ़ूले भूमाफियाओं पर नकेल कसने का, जनता के साथ साथ ‘सरकार’ को भी याद आओगे आप।

माफियाओं में थरथराहट, सामान्यजनों में विश्वास जगाया

किसी महामारी से कैसे न्यूनतम संसाधनों के साथ न केवल झूझना बल्कि उससे पार पा जाने की जब भी बात होगी याद आप ही आओगे। महामारी के दौर में समूचे शहर के सामाजिक संगठनों के जरिये आपात व्यवस्था जुटाकर जरूरतमंदों को भोजन खिलाने से लेकर पीड़ितो के प्राण बचाने की कवायद जब भी होगी आप ही याद आओगे।

हरे धनिये की महज एक डगाल के लिए तरसते शहर में जब घर मे पैकेट बन्द सब्जी आएगी, आपका चेहरा याद आ जायेगा। 100 बिस्तरों वाला अस्थाई अस्पताल झटपट जब भी खड़ा होगा। आपका चेहरा ही सबकी आंखों के सामने होगा। प्राण बचाने के इंजेक्शन हो या प्राण बचाने के नाम से अस्पतालों की लूट पर नकेल, आप ही याद आओगे।

गुटों में बटी भाजपा के भी समन्वयक बने, जनप्रतिनिधियों से बेहतर तालमेल

आपको याद करने की फ़ेहरिस्त तो खासी लंबी है और आपकी कार्यशैली इसमें और इज़ाफ़ा करेगी, इसमें कोई संदेह नही। आख़िर नई ज़िम्मेदारी में एक इंदौर के मेट्रो के सपने को मुक्कमल करने की भी तो आप पर आई है। शिवराज सरकार के मिशन 2023 के तहत इस मेट्रो के ड्रीम प्रोजेक्ट्स की कमान यू ही नही आपके हाथों में दी गई है। शहर का ये सपना भी अब आपके अनथक परिश्रम और विकास दृष्टि से ही पूरा जो होना है। तय है कि इस कार्य मे भी आप कुछ नया कीर्तिमान स्थापित करेंगे। ठीक वैसे ही जैसे इस शहर में बतौर ज़िलाधीश रहते हुए स्थापित हुए।

आप जब आये तब शहर में कोरोना का स्याह अंधेरा पसरा हुआ था। शहर कर्फ़्यू की गिरफ्त में था। सब कुछ भयावह। मंडराता काल और खत्म होती जिंदगियो के बीच आपका आना हुआ। शहर आपके लिए अंजान नही था। एडीएम से लेकर निगमायुक्त तक इस शहर को आप अच्छे से जी चुके थे। शहर की तासीर ओर लोगो के मिजाज से वाकिफ़ थे आप। नेताओ के ‘रेलें-रायते’ भी आपसे अरसे से छुपे नही थे। तभी तो ‘छटे छटाएँ’ नेताओं की जमात भी आपके समक्ष हांथ बांधे ही खड़ी रही। पूरे समय। बगेर चू चा किये।

स्वच्छता अभियान के महानायक, शहर के पालक भी बनकर उभरे

गुटों में बुरी तरह बटी भाजपा के लिए तो आपकी भूमिका किसी ‘संगठन मंत्री’ से कम नही रही। बतौर समन्वयक आपने ताई-भाई-साईं-भौजाई के बीच ऐसा काम किया कि कभी भी ‘सरकार’ ओर ‘ प्रशासन’ में टकराव पैदा नही हुआ। रत्तीभर भी नही। यहां तक कि वो ‘ भगवा वाहिनी’ भी शांत ही रही, जिसके कई नामचीन नेताओ को बतौर एडीएम रहते आपने कॉलर पकड़कर कृष्णपुरा पूल पर पुलिस गाड़ी न केवल बन्द कर दिया बल्कि 17 दिन तक ज़मानत भी नही होने दी। बतौर कलेक्टर इस वाहिनी से आपका वो तालमेल बना की शहर में एक बार भी ला एंड ऑर्डर की स्थिति निर्मित नही हुई।

आपसे तो प्रतिपक्ष भी संतुष्ट रहा। वो भाजपा से भिड़ता रहा, आपसे समझता रहा। चार चार विपक्षी विधायक होने के बावजूद आप कभी उनके निशाने पर नही रहे। एक अफसर ओर जनप्रतिनिधियों के बीच इससे बेहतर तालमेल का दूसरा उदाहरण फिलवक्त तो देखने को नही मिला। अन्यथा शहर का कोई भी कलेक्टर हो, वो सत्तारूढ़ दल नही तो विपक्ष के निशाने पर गाहे बगाहे रहा ही है। ये इंदौर का इतिहास रहा है। पर बाहर गरियाता विपक्ष जब आपसे मुलाकात कमरे से बाहर आता था तो वह रहस्यमयी चुप्पी साध लेता था। मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री के खिलाफ बोलने वाले भी आपके खिलाफ मौन साधे रहे। ढाई तीन साल। ये क्या कम है?

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ये सब आपकी कार्यनीति थी या दंड नीति…ये आप ही जाने निवृत्तमान जिला दंडाधिकारी। लेकिन हमें तो आप बहुत याद आओगे…बतौर निगमायुक्त.. बतौर कलेक्टर… और सबसे बढ़कर बतौर इस शहर के एक पालक के रूप में…!!