वैसे तो जहाने सियासत में, कुछ जीते हैं, कुछ हारे हैं कुछ दल यहां ऐसे भी हैं ,जो जीत के हारा करते हैं

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राजेश बादल
यह तो होना ही था। दोनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली बड़ी परीक्षा थी । कांग्रेस क्या हासिल करेगी,इसमें किसी की अधिक दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए परिणाम बहुत चैंकाने वाले नहीं कहे जा सकते। हरियाणा में मतदाताओं ने सत्ता की चाबी बीजेपी को नहीं सौंपी है। सरकार बनाने के लिए उसे दुष्यंत चैटाला की मेहरबानी पर निर्भर रहना होगा और दुष्यंत साफ कह चुके हैं कि वे राज्य में बदलाव चाहते हैं। इसी तरह महाराष्ट्र में बीजेपी अपनी सहयोगी शिवसेना पर निर्भर रहेगी। बीते वर्षों में शिवसेना ने बहुत खून के घूंट पिए हैं। अब उद्धव ठाकरे के लिए बीजेपी से यह कहने का अवसर है कि वे वही व्यवहार पसंद करेंगे ,जो एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है। असल में दोनों राज्यों में बीजेपी ने अपना प्रचार अभियान एक सुविधाजनक आधार से शुरू किया था।

यह आधार लोकसभा चुनाव की जीत का था। प्रादेशिक इकाइयों व क्षत्रपों की आदत अब राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सहारे वैतरणी पार करने की हो गई है। काफी हद तक इसी का फायदा मिला, लेकिन स्थानीय नेटवर्क और चेहरों के आभामंडल की उपेक्षा जायज नहीं ठहराई जा सकती। बेशक सितारों की अपनी चमक होती है, मगर आप जुगनुओं को दर किनार नहीं कर सकते। यह भी समझने की बात है कि हर बार चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रीय नेतृत्व अपने पिटारे से नए नए मुद्दे नहीं पैदा कर सकता। इसमें संदेह नहीं कि महाराष्ट्र में देवेन्द्र फणडवीस ने पांच साल तक अपनी छवि पर आंच नहीं आने दी है, मगर इस बार शिवसेना अलग अंदाज में नजर आ रही है। भाजपा के साथ रहते हुए भी वह आक्रामक तेवर अपनाएगी। परंपरा तोड़ते हुए ठाकरे परिवार अगर चुनाव मैदान में कूदा है तो इसका मतलब कोई परदे में नहीं छिपा है। जाहिर है अगले पांच बरस दोनों दलों के राजनीतिक रिश्तों के लिए बहुत आसान नहीं होंगे।

हरियाणा में तो स्लेट पर इबारत साफ लिखी थी। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने खुद ही अपनी राह में कांटे बिछाए थे। हरियाणा के मतदाता एकदम अलग ढंग से व्यवहार करते हैं। खट्टर इसे नहीं समझ सके। पूरे पांच साल वे एक दंभी मुख्यमंत्री बने रहे। दूसरी ओर कांग्रेस ने पिछले चुनाव में धोबी घाट की पटखनी खाई थी। उस पराजय के बाद अध्यक्ष समेत समूची पार्टी काफी समय तक सदमें से उबर नहीं सकी। इसका असर तैयारियों पर भी पड़ा। काम चलाऊ अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी ने कम समय में ही मुर्दा पड़ी पार्टी में जान फूंकने का काम किया है। दोनों ही प्रदेशों में कांग्रेस का प्रचार अभियान बिखरा बिखरा और अव्यवस्थित रहा। शिखर नेता आधे अधूरे मन से रैलियों में गए। राज्य सरकारों की विफलताओं का कोई लेखा जोखा तैयार नहीं था।

यदि लोकसभा चुनाव की तरह ही इन चुनावों को पार्टी ने लिया होता तो संभव है कि परिणाम कुछ और होते। यह भी पार्टी के लिए एक सबक है। अनमने ढ़ंग से चुनाव लड़ने के बावजूद उनकी अंकसूची में अच्छे प्राप्तांक हैं, मगर ध्यान रखिए कि यह बीजेपी की हार है ।कांग्रेस की जीत नहीं। उप चुनावों के परिणाम भी बीजेपी को मुस्कुराने का अवसर नहीं दे रहे हैं। 51 में से केवल 15 सीटें जीत कर पार्टी ने अपना जनाधार गिराया है। अगले दो साल में आठ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। बीजेपी को जनाधार बचा कर रखने और कांग्रेस अपने आप को पुनर्जीवित करने की चुनौती के साथ मैदान में उतरेगी।

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