नगरीय निकाय चुनाव के परिणाम को लेकर सशंकित भाजपा

नगरीय निकाय चुनावों में सफलता को लेकर प्रदेश भाजपा के पास शुभ संकेत सामने नही आ रहे है। सत्ता ओर संगठन के पास 6 जुलाई को हुए पहले चरण के मतदान के बाद परिणाम को लेकर जो फीडबैक पहुंच रहा।

नितिनमोहन शर्मा

नगरीय निकाय चुनावों में सफलता को लेकर प्रदेश भाजपा के पास शुभ संकेत सामने नही आ रहे है। सत्ता ओर संगठन के पास 6 जुलाई को हुए पहले चरण के मतदान के बाद परिणाम को लेकर जो फीडबैक पहुंच रहा है, उसने सरकार और संगठन की पेशानी पर परिणाम से पहले पसीना छलका दिया है। सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की “कुर्सी” से जुड़े चुनाव का पूरी तरह से परिणाम आने में अभी पांच-सात दिन का वक्त है लेकिन प्रदेश भाजपा तक पहुंचे फीडबैक ने उन चारों बड़े शहरों में पार्टी की सम्भावनाओ की तस्वीर धुँधली पेश की है जो सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के भविष्य को तय करने वाली है।

इनमें राजधानी भोपाल के साथ साथ जबलपुर ग्वालियर उज्जैन के साथ इंदौर भी शामिल है। इन बड़े शहरों में मुकाबला कड़ा बताया जा रहा है। अहिल्या नगरी को लेकर भी वैसा “इत्मिनान” नही है जैसा हर चुनाव के रहता आया है। हालांकि स्थानीय भाजपा संगठन ने प्रदेश भाजपा को आश्वस्त किया है कि इंदौर से निराशा हाथ नही आएगी। प्रदेश संगठन इंदौर को लेकर आश्वस्त भी है लेकिन आशंकित भी है।

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पार्टी की परेशानी का कारण पंचायत चुनाव भी हम गए है जहां गेर दलीय आधार पर चुनाव होने के बाद भी पार्टी को वैसी सफलता नही मिली जैसी वह उम्मीद कर रही थी। हालांकि नगरीय निकाय चुनावों की तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नही हुई है। अंतिम चरण का मतदान शेष है जहा कल 13 जुलाई को वोटिंग होना है। लिहाजा सत्ता और संगठन में पूरी ताकत शेष बचे नगर निगम चुनाव में झोंक दी है। अपने पक्ष में नतीजों के आने के संकेतों ने कांग्रेस के उत्साह को दूना कर दिया ने ओर वो भी 13 जुलाई के मतदान में कोई कसर नही छोड़ रही है।

प्रदेश की सत्ता और संगठन के गलियारों तक पहुंचे चुनावी फीडबैक ने सरकार के मुखिया शिवराज सिंह की पेशानी पर पसीना ला दिया है। प्रदेश भाजपा तक पहुंचे संकेत के बाद इंदौर अब सत्ता और संगठन की आस का प्रमुख केंद्र हो गया है। प्रदेश के बड़े शहरों से आये फीडबैक के बाद उज्जैन भोपाल जबलपुर सागर ने पार्टी को निराश कर दिया है। कांग्रेस की बांछे “बिल्ली के भाग्य से छीका फूटने” जैसी स्थिति से खिली हुई है।

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राजधानी तक पहुंचे संकेतो के बाद सत्ता और संगठन के गलियारों में मौन पसर गया है। कारण भी साफ है। इंदौर को छोड़कर शेष सभी बड़े शहरों में कांग्रेस के पास नगर निगम की सत्ता आती रही है। प्रत्यक्ष प्रणाली से महापोर चुनाव शुरू होने के बाद से केवल इंदौर में ही 20 साल से पार्टी सत्ता में है। जबकि भोपाल में इस दौरान नगर निगम कांग्रेस भाजपा से झपट चुकी है। एक बार विभा पटेल भी बाजी मार चुकी है। पटेल वर्तमान भी कांग्रेस से मैदान में है और पहले दिन से वे भाजपा की मालती रॉय पर बढ़त बनाये हुए है। सुनील सूद भी यहाँ से कांग्रेस के महापौर रह चुके है।

कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजयसिंह ने जिस तरह भोपाल को नाक का सवाल बनाकर मैदान संभाला है, उसने कांग्रेस की उम्मीदों को उजला कर दिया है। जबलपुर में भाजपा को प्रयोग करना महंगा पड़ता दिख रहा है। ” डॉक्टर साहब ” को घर से बाहर निकालकर चुनाव लड़ाने का फैसला अब सत्ता और संगठन की चिंता का कारण इन रहा है। मुख्यमंत्री की पसंद का मामला होने के कारण यहां शुरूआत तो ठीक हुई लेकिन जैसे जैसे चुनाव आगे बढ़ा

भाजपा की “बुजुर्ग ” चुनोती कांग्रेस की “युवा” के टक्कर के आगे पिछड़ती चली गई। हालांकि स्थानीय भाजपा संगठन का कहना है कि हर जीत का अंतर कम हो सकता है लेकिन परिणाम पक्ष में आएगा। आरएसएस पृष्टभूमि के डॉक्टर जितेंद्र जामदार जन अभियान परिषद के जरिये राज्यमंत्री का दर्जा भी प्राप्त है। फिर भी उम्मीदवार होने से पार्टी संगठन आखरी वक्त तक बेमन से काम मे लगा रहा।

“स्मार्ट सिटी” से फायदा कम नुकसान से ज्यादा

भाजपा स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को बड़े शहरों के लिए चुनावी ट्रम्प कार्ड मान रही थी। पार्टी का मानना था कि बड़े शहरों के भविष्य की जरूरतों को पूरा करता ये प्रोजेक्ट मतदाताओं को भी प्रभावित करेगा। लेकिन प्रदेश संगठन तक पहुंच रहे फीडबैक ने इसी प्रोजेक्ट पर सवालिया निशान लगा दिए है। इंदौर उज्जैन सहित सभी शहरों में प्रोजेक्ट के तहत चल रही तोड़फोड़ ने प्रभावित पक्ष को भाजपा से बिदका दिया। जगह जगह खुदाई ओर आधे अधूरे काम जबलपुर ओर इंदौर में भी न केवल दिक्कत बने हुए है बल्कि कांग्रेस की तरफ चुनाव में मुद्दा भी बने। इन्दोर का मध्य क्षेत्र भी इससे पर प्रभावित हुआ है।

“अनुभव” से दूर होना भी नुकसानदेह

उम्र का पैमाना भी भाजपा के लिए परेशानी का कारण बनता दिख रहा है। इस चुनाव में पार्टी पीढ़ी परिवर्तन करने जा रही थी। लेकिन ये परिवर्तन बरसो बरस से पार्टी के लिए काम कर रहे नेताओ कार्यकर्ताओं को रास नही आया। अब जो जानकारी प्रदेश संगठन के दफ्तर तक जा रही है उसमें अनुभव को दरकिनार करने का मुद्दा भी शामिल है।

रतलाम जाते जाते “संगठन” के कदम इंदौर में थमे

प्रदेश भाजपा के सन्गठन महामंत्री हितानंद शर्मा सोमवार को अचानक इंदौर आये। वे पार्टी के महापौर उम्मीदवार पुष्यमित्र भार्गव से भी मिले। नगर अध्यक्ष गौरव रणदिवे शर्मा को लेकर भार्गव के निवास पर पहुंचे। साथ मे पुराने संभागीय सन्गठन मंत्री जयपालसिंह चावड़ा भी थे। पार्टी ने इसे अनोपचारिक प्रवास बताया और मेल मुलाकात को सामान्य। पार्टी का कहना था कि शर्मा रतलाम जा रहे थे जहां 13 जुलाई को मतदान है।

कुछ देर के लिए वे इन्दोर रुक गए थे। सूत्र बताते है कि प्रदेश भाजपा तक पहुंच रहे फीडबैक ने शर्मा को भी फिक्रमंद कर दिया है। इसलिए वे रतलाम जाते जाते कुछ देर इन्दोर में रुके ओर यहां के जमीनी हालातो की जानकारी ली। प्रदेश भाजपा के मुखिया को दीनदयाल भवन ने आश्वस्त कर बिदा किया कि इंदौर में हर हाल में पार्टी ध्वज ही फहराएगा।

उज्जैन: चर्चा में सिर्फ महेश परमार

उज्जैन में पूरे समय कांग्रेस उम्मीदवार महेश परमार ही पूरे समय चर्चा में रहे। उन्होंने बहुत आक्रामक चुनाव लड़ा। ये शहर भी स्मार्ट सिटी के जरिये तोड़फोड़ में जुटा हुआ है। बाबा महाँकाल मन्दिर के आसपास से भी एक बड़ी आबादी का विस्थापन शेष है। ऐसे में बेदखली से सशंकित तबका बिदका हुआ था। हालांकि यहां जिलाधीश आशीष सिंह की अगुवाई में प्रोजेक्ट के ज्यादातर काम आम सहमति से हुए है। इंदौर जैसी जोर जबर्दस्ती यहाँ नही हुई। लिहाजा बीच शहर के बाजारों में यहाँ वैसा नकारात्मक वातावरण नही था जैसा इंदौर में निगम की कार्यप्रणाली ने बना दिया था।