बिजासन मंदिर: वैष्णव देवी की तरह यहाँ भी है स्वयंभू पिंडियाँ

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bijasan mata

History of Bijasan Mata Temple of Indore

इंदौर के बिजासन मंदिर में वैष्णव देवी की मूर्तियों के समान यहाँ भी माँ की पाषाण पिंडियाँ हैं। मंदिर के पुजारियों का मानना है कि ये पिंडियाँ बिजासन मंदिरहैं। ये मूर्तियाँ यहाँ कब से प्रतिष्ठित हैं, इस बारे में ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है। पुजारियों का कहना है कि सैकड़ों सालों से ये पिंडियाँ यहीं प्रतिष्ठित हैं। जिनकी यहाँ के निवासी पूजा-अर्चना करते थे। पहले पहल यह टेकरी होलकर राजघराने की शिकारगाह हुआ करती थी।

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मंदिर का निर्माण इंदौर के महाराजा शिवाजीराव होलकर ने 1760 में कराया था।एक बार शिकार खेलते हुए राजघराने के सदस्यों की निगाह इस मंदिर पर गई। तब 1920 में यहाँ पक्का मंदिर निर्मित कराया गया। तब से लेकर आज तक इस मंदिर में भक्तों का ताँता लगा रहता है। यहाँ आने वाले भक्तों का कहना है कि यहाँ माँगी मुराद अवश्य पूरी होती है।

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बिजासन माता मंदिर का इतिहास एक हजार साल पुराना है। यहां देवी के नौ स्वरूप विद्यमान हैं। किसी जमाने में आसपास काले हिरणों का जंगल होने और तंत्र-मंत्र, सिद्धि के लिए इस मंदिर की खास पहचान रही है। पूर्व में माता चबूतरे पर विराजित थीं। मंदिर का निर्माण इंदौर के महाराजा शिवाजीराव होलकर ने 1760 में कराया था।

बिजासन माता मंदिर की यह विशेषता है की इसे सौभाग्य और पुत्रदायिनी माना जाता है। इसके चलते विवाह के बाद यहां प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर से नवयुगल माता के दर्शन और पूजन के लिए आते हैं। बताया जाता है कि आल्हा-उदल ने भी मांडू के राजा को हराने के लिए माता से मन्नात मांगी थी।

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साधारण मिट्टी, पत्थर के चबूतरे पर विराजमान माता के नौ स्वरूपों के लिए तत्कालीन होलकर शासक ने यहां मराठा शैली वास्तुकला में मंदिर का निर्माण कराया था। बाद में कई विकास कार्य हुए।

चैत्र और शारदीय नवरात्र में मंदिर में मेला लगता है। एक अनुमान के मुताबिक नवरात्र के दौरान यहां देशभर से लगभग 3 लाख से ज्यादा श्रद्धालु दर्शन और पूजन के लिए आते हैं और त्यौहार में मंदिर से जुड़े कई आयोजन किए जाते है।

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इंदौर रेलवे स्टेशन से यहां पहुंचने में करीब 27 मिनट का समय लगता है। शहर के पश्चिम क्षेत्र में स्थित मंदिर रेलवे स्टेशन से 9.8 किलोमीटर की दूरी पर है।

कालरात्रि की उपासना करने से ब्रह्मांड की सारी सिद्धियों के दरवाजे खुलने लगते हैं और तमाम असुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं इसलिए दानव, दैत्य, राक्षस और भूत- प्रेत उनके स्मरण से ही भाग जाते हैं।

सप्तम कालरात्रि
एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी
तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा।

 

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