अष्टविनायक: लेण्याद्री में विराजमान है गिरीजात्मक विनायक जी

0
93
lenyandri_vinayak

astavinayak, girijatmaj vinayak ji in lenyandri

मायारूपी जगदमाता शिवपत्नी पार्वती जी जिन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप किया और अंत मे जिन्हें श्री गणेश ही पुत्र के रुप में प्राप्त हुए बाद में गिरिजा पार्वती जी के पुत्र श्री गणेश जी लेण्याद्री को अपना निवास बनाया ऐसे श्री गिरिजात्मज विनायक हमारा कोटि कोटि प्रणाम स्वीकार करें।

Image result for लेण्याद्री
via

लेण्याद्री पूने से उत्तर की ओर कुकड़ी नदी के तट पर बसा हुआ है। गणेश पुराण में इस स्थान को जीर्णपुर अथवा लेखन पर्वत के नाम से भी संबोधित किया गया है। यहाँ पहुँचने के लिए पुणे से बसे आसानी से मिल जाती है।  यह पुणे से 94 किलोमीटर दूर है जुन्नर पहुंचकर भी लेण्याद्री आया जा सकता है। मंदिर के देवस्थान ट्रस्ट ने यात्रीयों के निवास हेतु एक गेस्ट हाउस का निर्माण किया है, जिसमे 200 रूपये देकर यात्रीगण रत्रि विश्राम कर सकते है।  महाराष्ट्र के अष्टविनायक मंदिरों मे लेण्याद्री ही एक ऐसा स्थान है जो लेखनादी पर्वत के बिच स्थित है और यही पर बौद्ध गुफ़ाए भी बनी हुई है जिनसे इस स्थान के अति प्राचीन होने की जानकारी मिलती है।  पर्वत पर स्थित बौद्धकालीन मे गुफाओं आठवीं गुफा में गिरिजात्मज विनायक जी विराजमान दिखाई देते है। यहाँ की गुफ़ाओं को गणेश गुफा के नाम से भी जाना जाता है। गिरिपाद से मंदिर की गुफा के द्वार तक पहुँचने के लिए 307 सीढ़ियाँ चढ़ना होती है। यही पर पहाड़ों के बिच बना पानी स्त्रोत भी दिखाई देता है।

Related image
via

लेण्याद्री में स्थित गणेश जी का यह मंदिर दक्षिणमुखी है और इसकी सबसे बड़ी विशेषत यह है की समूचा मंदिर एक ही बड़े पत्थर पर खुदा हुआ है। 53 फुट लम्बे और 51 फुट चौड़े इस विशाल सभामंडप में एक भी खम्बा नही है। इस भव्य सभामंड़प मे ध्यानधारना करने के लिए आठ कोठरिया बनी है और इन सबके बिच श्री गणेश जी अपने सौम्य रुप में प्रतिष्ठित है। यहाँ के बारे मे एक अतिप्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि देवी पार्वतीजी ने गजानन को पुत्र स्वरुप मे प्राप्त करने के लिए लेण्याद्री पर्वत की गुफा में कई वर्षों तक कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से गजानन प्रसन्न हुए और उन्होंने देवी से कहा की मई आपकी इच्छा नुसार आपका पुत्र बनूंगा। देवी पार्वती ने गजानन से मिले आशीर्वाद से प्रसन्न होकर भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी के दिन अपने शरीर के मैल से गणेशजी की पार्थिव मूर्ति बनाई इसके पश्चात उन्होंने मूर्ति की पूजा आरंभ कर दी तभी श्री गणेश ने मूर्ति में प्रवेश किया और बटुकरूप में पारवती के सामने प्रकट हो गये ।

Related image
via

गणेश का स्वरुप बेहद निराला होकर उनके छः हाथ और तिन आँखे दिखाई दे रही थी। जब नामकरण का महान प्रसंग सामने आया तो देवताओंने उनका नाम रखा गणेश ।गणेश उसे कहा जाता है जो सत्व, रज और तम तीनो गुणों को अपने अधीन रखता है। गणेश जी बाद मे लेन्याद्री मे ही रहने लगे और यहा पर बालगणेश ने अनेक दैत्यों को संहार किया। वे बादमे गिरिजा के आत्मज यानि पुत्र बन गये और गिरिजात्मज कहलाने लगे।

Related image
via

लेन्याद्री का प्राकृतिक सौंदर्य दर्शनीय है। यहा के पर्वत पर चढाते समय आसपास का भव्य नजारा दिखाई देता है। मंदिर के भीतर छोटेसे गर्भगृह मे गणेशजी विराजमान है और उनकी मूर्ति उत्तराभिमुख है। ऐसा कह जाता है कि जिस गुफा मे देवी पार्वती ने तपस्या की थी वही पर बाद मे उनकी मूर्ति प्रतिष्टित की गई। लेन्याद्री के मंदिर मे पंचामृत से गणेश जी की पूजा होती है। भाद्रपद और माघ माह में मुख्य चतुर्थी यहा के मुख्य उत्सव है जिनमे हजारों लोग शामिल होकर गणेशजी की कृपा का प्रसाद प्राप्त करते है। लेन्याद्री की गुफाओंको भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा प्राचीन महत्व की घोषित किया है। गुफओंको किसी भी प्रकार की क्षति न पहुंचे इसके लिए यहाँ बिजली की भी व्यवस्था नहीं की गई है लेकिन यहाँ देवालय की रचना ऐसी है की सूर्योदय से सूर्यास्त तक गणेश जी की मूर्ति पर प्रकाश फैला रहता है। लेन्याद्री मे 17 बौद्ध गुफाए भी है। यहाँ आने वाले यात्रिगणश्री गणेश जी की आराधना के साथ बौद्ध गुफाओं के दर्शन भी कर लेते है। महाराष्ट्र के समस्त अष्ट विनायकों मे यह स्थान पर्यटन की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here