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बुजुर्गों को सताने वाली सूची से भोपाल जितनी जल्दी बाहर निकले,उतना अच्छा, अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 15 Jun 2018 10:15 by krishnpal rathore
बुजुर्गों को सताने वाली सूची से भोपाल जितनी जल्दी बाहर निकले,उतना अच्छा, अजय बोकिल की कलम से….

स्वच्छता के मामले में देश में नंबर दो रहने पर गर्व करने वाले भोपाल (और प्रकारांतर से मध्यप्रदेश के लिए भी) यह शर्म का विषय है कि उसका नाम देश में बुजुर्गों के साथ सर्वाधिक दुर्व्यवहार वाले पांच शहरों की सूची में तीसरा है। हमसे नीचे केवल अमृतसर और नई दिल्ली है। यह खुलासा हैल्पएज इंडिया की वर्ष 2017 की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के 23 शहरों में हुए सर्वे में यह बात सामने आई कि बुजुर्गों के साथ सबसे ज्यादा दुर्व्यवहार मेंगलोर (47 फीसदी), अहमदाबाद (46 फीसदी) और उसके बाद भोपाल (39 फीसदी) अमृतसर (35 फीसदी) और दिल्ली (33 फीसदी) में होता है। अगर भोपाल की ही बात करें तो सर्वे में शामिल 53 फीसदी वरिष्ठ नागरिकों का मानना है कि समाज उनके साथ भेदभाव करता है। 44 प्रतिशत बुजुर्गों का अनुभव है कि सार्वजनिक स्थानों पर उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ। यह सर्वे रिपोर्ट सांसद आलोक संजर और डीजीपी आर. के. शुक्ला ने जारी की।इस सर्वे का उद्देश्य यह पता लगाना था कि बुजुर्गों से दुर्व्यवहार किस हद तक, कितना ज्यादा, किस रूप में और कितनी बार होता है ? इसके पीछे क्या कारण हैं? यह बात भी सामने आई कि बुजुर्गों में से एक चौथाई आबादी व्यक्तिगत उत्पीड़न का शिकार होती है और उनका उत्पीड़न करने वाले ज्यादातर उनके अपने बेटे और बहुएं ही होती हैं। हैल्पएज इंडिया के सीईओ मैथ्यू चेरियन का कहना है कि ‘दुर्भाग्य से बुजुर्गों का उत्पीड़न घर से शुरू होता है और इसे अंजाम वे लोग देते हैं जिन पर वह सबसे ज्यादा विश्वास करते हैं। लेकिन इस तरह दुर्व्यवहार के शिकार 82 फीसदी बुजुर्ग परिवार की खातिर इसकी शिकायत नहीं करते । सर्वे में मध्यप्रदेश के उज्जैन सहित 20 राज्यों के एक-एक शहर को शामिल किया गया था। सर्वे के तहत 4617 बुजुर्गों से साक्षात्कार किया गया। रिपोर्ट के अनुसार 61 फीसदी बुजुर्ग कहते हैं कि ये लोग बड़ों की धीमी गति से अधीर हो जाते हैं।बुजूर्ग के साथ बदसलूकी के लिए इमेज परिणाम

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अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के उपलक्ष्य में जारी यह रिपोर्ट देश में बुजुर्गों की हालत पर रोशनी डालती है। वर्ष 2011 की जनगणना के हिसाब से देश में बुजुर्गों की संख्या 10 करोड़ से अधिक है। लेकिन जैसे-जैसे सामाजिक मूल्य बदल रहे हैं, समाज जितना व्यक्ति केन्द्रित होता जा रहा है, बुजुर्गों की बदहाली भी उसी अनुपात में बढ़ती जा रही है। ऐसे मामलों में दोषी वो बेटे पाए गए हैं, जिन्हें मां-बाप ने उम्मीदों के महल में यह सोच कर पाला था कि वे उनकी ‘बुढ़ापे की लाठी’ होंगे। अनेक परिवारों में यह परंपरा जारी है, लेकिन कई परिवारों में बेटे-बहू बुजुर्गों के लिए हकीकत में ‘लाठी’ साबित हो रहे हैं। ऐसी लाठी जो बुजुर्गों पर शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण के रूप में बरस रही है। दो-तीन दशकों पहले तक ‘परिवार’ की परिभाषा में बेटे बहू, उनकी संतानें और घर के बुजुर्ग भी हुआ करते थे। लेकिन अब एकल परिवारों की परिभाषा पति-पत्नी और उनके बच्चों तक सिमट गई है। समयाभाव और आर्थिक विवशताअों के कारण लोग अब साठ साल के ऊपर वालों को ‘अनावश्यक बोझ’ के रूप में देखने लगे हैं। जबकि पहले बड़े बुजुर्गों को ‘संस्कारों की पाठशाला’ के रूप में देखा जाता था। वे परिवार की मर्यादाअों के रक्षक भी थे। उनका होना परिवारों में अनुशासन का पर्याय था। लेकिन अब ज्यादातर घरों में उन्हें ‘अवांछित’ श्रेणी में मान लिया गया है। क्योंकि वे ‘आउट डेटेड’ हो चुके हैं। घर में उनकी हैसियत जबरिया मेहमान की है। कई घरों में न तो इन बुजुर्गो को ठीक से खाना दिया जाता है, न पहनने को ठीक-ठाक कपड़ा दिया जाता है। वे कुछ मांगें तो उन्होंने बड़ी बेशर्मी से दुत्कार दिया जाता है। मारपीट की जाती है। भूखा रखा जाता है। उनसे पैसा और प्राॅपर्टी भी छीन ली जाती है। सिर्फ इसलिए कि वो बुजर्ग हैं, फुंका हुआ पटाखा हैं। वे घर की कमाई में कोई योगदान नहीं करते। उल्टे उन पर खर्च ही करना पडता है। 

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दूसरा बड़ा कारण समाज का अपने आप में सिमट जाना है। आजकल जब प्रेम संवाद भी मोबाइल के वाॅ्टस एप मैसेज के जरिए होने लगा है तो बुजुर्गों के लिए कौन और कब समय निकाले ? नई और पुरानी पी‍ढ़ी में संवादहीनता अथवा न्यूनतम संवाद ने भी दोनो पीढि़यों में फर्क को बढ़ाया है। इसे पाटने का बुजुर्गों के पास केवल एक ही रास्ता है कि परिजन उन्हें अपना मानें। उन्हें अपने साथ रखें। लेकिन जीवन की आपाधापी में ऐसा सोचने वालों की संख्या घटती जा रही है। यूं सरकार ने बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार रोकने के लिए कानून बनाए हैं। इस कानून में संशोधन कर वृद्धक प्रताड़ना पर सजा बढ़ाकर 3 से 6 माह करने पर भी विचार चल रहा है। बताया जाता है कि असम सरकार ने बुजुर्गों को प्रताडि़त करने पर परिजनों का वेतन काटने का कानून बनाया है। लेकिन यहां मूल सवाल बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील सोच का है।

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यह पता होते हुए कि हर युवा को कल वृद्ध होना है। हर दिन के बाद रात आनी है। हर सुबह की शाम होनी है। इस अटल सत्य को जानते हुए भी हर नई पीढ़ी अपनी सुबह की अनिवार्य शाम को स्वीकारना नहीं चाहती। युवावस्था की मदहोशी में वे अपने ही जन्म दाताअों और बुजुर्गों के साथ अमानवीय बर्ताव करने में संकोच नहीं करते। कई बार तो यह प्रतिशोध की हद तक होता है। हेल्पएज इंडिया की रिपोर्ट इसी कड़वी सचाई से रूबरू कराती है। हम अपने बुजुर्गों को अपना मानें यह कोई कानून नहीं सिखा सकता। यह संवेदना और कृतज्ञता रिश्तों के बोध और जिम्मेदारी के भाव से ही पैदा हो सकती है। बुजुर्गों को सताने वाली सूची से भोपाल जल्द से जल्द बाहर निकले, उतना ही अच्छा !

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