बदलते ढंग को दर्शाती है रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’

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बिना किसी नायक के फ़िल्मों की कल्पना करना थोड़ा मुश्किल होता है, ख़ास कर हमारी हिंदी फ़िल्म इण्डस्ट्री में जहाँ अधिकांशतः नायिकाओं की भूमिका उनकी नाज़ुक अदाओं के लिए लिखी जाती हैं या केवल औपचारिक रस्म के लिए, पर अब धीमे धीमे ढंग बदल रहा है रानी मुखर्जी अभिनीत हिचकी उसी नए ढंग की फ़िल्म है जिसमें नायक और नायिका दोनो वही हैफ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह है, नैना एक ऐसी बच्ची है जिसे टौरेट सिंड्रोम नाम की बीमारी है, इसमें बच्चा अनचाहे ही मुँह से अजीब सी आवाज़ें निकलता है

ज़ाहिर है नैना को पढ़ाई में इस अजीब बीमारी के कारण अनेक स्कूलों से निकाल दिया जाता है लेकिन फिर आख़िर में एक कॉन्वेंट स्कूल में उसे अपनी पढ़ाई पूरी करने का मौका मिलता है, और बड़ी होकर (रानी मुखर्जी) स्कूल में बच्चों को पढ़ा कर अपने इस गुरु ऋण को चुकाना चाहती है उसे कुछ मुश्किलों के बाद अपने इस सपने को पूरा करने का मौक़ा मिलता है, लेकिन जो क्लास उसे पढ़ाने को दी जाती है, वो ऐसी क्लास है जिसे हर टीचर छोड़ कर भाग जाता है, और वो क्लास है आर टी ई के बच्चों की क्लास 9 एफ आर टी ई के बच्चों के साथ होने वाले सामान्यतः भेद भाव को भी इसी बहाने बख़ूबी दिखाया गया है कुलीनों के स्कूल में सरकारी नीतियों की मेहरबानियों से आए इन बच्चों को ना तो स्कूल के अन्य साथी अपना दोस्त मानते हैं और ना ही टीचर उन्हें सीखने के क़ाबिल समझते हैं, कुछ इस उपेक्षा और कुछ ख़ुद की कमतरी के डर से ये बच्चे विद्रोही हो जाते हैं और हर आने वाले शिक्षक के साथ ऐसी शरारत करते हैं की वो भाग ही जाए

कुछ ऐसा ही अनुभव नैना को भी होता है, पर इरादे की पक्की नैना हर सम्भव प्रयत्न कर बच्चों का दिल जीत ही लेती है उत्साही नैना स्टूडेंट यूनियन के प्रभारी नीरज कबी से ये शर्त लगा लेती है की इस क्लास के एक से अधिक बच्चे नब्बे फ़ीसदी अंकों से अधिक ला कर स्कूल प्रिफ़ेक्ट बनेंगे जबाब में उसे सुनने मिलता है की ये पास भी हो जाए तो ग़नीमत है सचमुच राह इतनी आसान नहि होती है, एक ऐसी ग़लती जिसके पीछे सभी बच्चे नहीं होते वो उन पर थोप कर उन्हें स्कूल से बाहर निकालने का हुक्म सुना दिया जाता है बमुश्किल नैना के हाथ पाँव जोड़ने पर प्रिन्सिपल इस बात लिए सहमत होते हैं की बच्चों को परीक्षा तो देने देंगे पर वे क्लास में नहीं आ पाएँगे तब नैना की असली परीक्षा आरम्भ होती है

क्या नैना अपने मंसूबों में कामयाब हो पाती है और क्या झोपड-पट्टी के ये बच्चे उसके जुनून में सहभागी होकर स्कूल में अपना रुतबा दिखा पाते हैं इसके लिए आपको फ़िल्म देखनी होगी| फ़िल्म में बड़े दिनों बाद सचिन नज़र आए हैं वो भी जोड़े से, कोई नज़र ना लगाए, दोनों की अदाकारी बढ़िया है, बाक़ी के पात्र हर्ष कुमार, शिवकुमार भी अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं, पर कमाल किया है बच्चों ने, इतने स्वाभाविक अभिनय के इतने बाल कलाकार सिद्धार्थ मल्होत्रा (निर्देशक) ने कैसे ढूँढे होंगे ये खोज का विषय है और अब बात करें रानी मुखर्जी की जो इस फ़िल्म में सब कुछ हैं

सब कुछ यानी 007 जेम्स बाण्ड की फ़िल्मों में वो सब कुछ जो फ़िल्म को चलाने के लिए हीरो कर सकता है रानी ने किया है अभिनय के एक भी सोपान ऐसे नहीं होंगे जो इस फ़िल्म में उसने कुछ नीची पायदान पे गुज़ारे हों, सब के सब आला दर्जे पर ही हैं फ़िल्म की कहानी (यद्दयपि आयातित स्टोरी और फ़िल्म पर है) ग़ज़ब की कसी हुई है कभी कभी आपको लग सकता है की टौरेट सिंड्रोम की आवाज़ें कुछ ज़्यादा निकाली गयी हैं, पर रानी की चुस्त अभिनय यात्रा और कहानी में समायी अनेक दिलचस्प गुत्थियाँ आपको हिलने नहि देतींबच्चों को शिक्षा देने के तरीक़ों को समझाने की और भी फ़िल्मे बनी है, हिचकी उसी की एक कड़ी है और निश्चित ही प्रभावी है मेरे हिसाब से तो देखने का बनता है, बच्चों साथ देखें तो और भी बढ़िया

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