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एक लहर जो लाइफ बदल दे

Posted on: 15 May 2018 16:42 by Lokandra sharma
एक लहर जो लाइफ बदल दे

दसवीं बारहवीं के परिणाम आते ही आंखों के सामने अपना कल आ ही जाता है। अरसा गुजर गया कानों में फेल… फेल … फेल के शब्दों को गूंजे। तब हम कॉलेज में एडमिशन की सूची में अपना नाम खोजते थे वह भी नीचे से और नाम है कि मिलने का नाम ही नहीं लेता था। लेता भी कैसे, हमने विषय के नाम पर जो ले रखा था, वह विष से भी भयानक था। उसका नाम ही गणित था जो हमारे हिसाब से देवगण के भी वश की बात नहीं थी। हम तो साधारण मनुष्य थे जिसने ‘कला’ सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए नहीं लिया था क्योंकि कला वालों के साथ तब भेदभाव काले गोरों जैसा किया जाता था। उस छोटे से कस्बे में गोरों की जमात में आने के लिये बस दो ही विषय थे, एक बायोलॉजी और दूसरा गणित।

आप ही सोचिये, एक दुबला पतला बालक, जो छिपकली को देख ऐसे छिप जाये कि छिपकली को ही अपने आप पर शर्म आने लगे , वह भला मेंढक को कैसे छूता ! और क्यों अकारण उनकी जान लेकर उस ज़माने में बड़ी सहजता के साथ चलने वाले क्रूरता के उस आम खेल और अखिलभारतीय मूर्खता में शामिल होता? अब ले देकर वही बची थी, गुर्राती हुई गणित जो हमारी छाती पर ऐसे सवार हुई थी कि वेताल भी विक्रम के ऊपर सवार न हुआ होगा।

हम सवालों और हिसाब किताब के बियाबान में भटकते और गणितिया वेताल हमसे नित नए सवाल पूछता, “बता , A अलाना है और B फलाना तो C का फल क्या होगा …… बता , अल्फ़ा की वैल्यू ऐसी है और बीटा की वैसी तो गामा की कैसी होगी।”

हम मन में चीखते, ‘ तेरी ऐसी की तैसी जैसी होगी ‘ मगर बोल न पाते। गणित के अविष्कारक की बुद्धि को कोसते, ‘जब माईनस माईनस प्लस है तो प्लस प्लस माइनस क्यों नहीं बनाया तूने कमअक्ल?

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मैं क्लास के बाहर घुटनों के बल बैठ गणित के गोरेपन की सज़ा पाता और ख़ुद को कोसता , इससे तो कला का कालापानी ही ठीक होता। उस पल को कोसता कि हाय, क्यों गणित के विषयलोभ में पड़ा ? कला ही ले लेता। इतिहास भूगोल पढ़ लिया होता और वह भी नहीं तो हारमोनियम तबला ही बजा लेता, मगर इस तरह अपनी खोपड़ी पर तबला न बजवाता। वेताल बन गणित गुर्राती, बता ..बता ..बता और इसके पहले कि वह बोलती, बता वरना तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूंगी, मेरी खोपड़ी के टुकड़े हो जाते।

अड़ियल अलजेब्रा, कलमुँही कैलकुलस और टुच्ची ट्रिग्नोमेट्री के षड्यंत्रों ने ग्यारहवीं में मुझे पास भी न होने दिया। जब बाकी संगी साथी अगली क्लास में जाने कमर कस चुके होते, मैं झुकी कमर के साथ सप्लीमेंट्री मैं शामिल होने एलिमेंट्री मैथ्स के साथ सर पीट रहा होता। मैं सवालों के अरण्य में भटक रहा होता, रो रहा होता लेकिन उस अरण्य रुदन को सुनने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं ही था।

ग्यारहवीं जैसे तैसे पास हुई । अब आगे जो सब कर रहे थे , वही करना था मुझे भी । इंजीनियरिंग के लिए pre engineering test यानी PET नाम के महाभूत से लड़ना था । इस महाभूत का भी एक सर नहीं , फ़िजिक्स , कैमिस्ट्री और मैथ्स नाम के तीन तीन सर थे जो मुझे डराते , अट्ठहास करते । तब निगेटिव मार्किंग भी थी आज ही की तरह । मुझे किसी ज्ञानी ने सलाह दी थी कि डरना मत , पॉजिटिव होकर पेपर देना । मैं डरा नहीं और आँख मूँदकर चार विकल्पों में से कभी A तो कभी B , कभी C तो कभी D को इस पॉजिटिव भावना के साथ टिक करता रहा कि जो होगा तो सही ही होगा । मगर क्या कहूँ , आप सुनकर हँसेंगे । कॉपी जाँचने वाला कमबख्त कितना निगेटिव था कि उसने निगेटिव मार्किंग के नाम पर मेरा एक एक अंक काट लिया । यार , जैसे चुड़ैल सात घर छोड़कर वार करती है , दीमक भी सात पुस्तक छोड़कर चाटती होगी । निगोड़ी निगेटिव मार्किंग ने तो मेरे सारे नम्बर चाट लिए और गणित में मुझे तीन सौ में शायद दस बारह नम्बर भी नहीं मिले । यही हाल फिजिक्स का था और कैमिस्ट्री का शायद उससे भी बुरा । इंजीनियरिंग तो गई हाथ से । अब पीसीएम नाम के तीन मुंड गले में लटकाकर आगे बढ़ने बस एक ही विकल्प था और वो था , बीएससी करना ।

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हमने साइंस कॉलेज में एडमिशन के लिये एड़ियां घिसनी प्रारंभ कीं । रायपुर के साइंस कॉलेज में एक के बाद एक सूची पर सूची निकलतीं और हम नीचे से अपना नाम तलाशते रह जाते । रब जाने , बन्द गली के आख़िरी मकान की तरह एडमिशन बन्द होते होते एकदम आख़िरी में हमें मक़ाम मिला , न जाने किस चमत्कार से हमें भी एडमिशन मिला और हम बीएससी की फर्स्ट ईयर के होनहार विद्यार्थी कहलाये । मगर होनहार बिरवान के होत चीकने पात यहां वैसे चीकने नहीं थे । हमारे लिए पात यहाँ भी उतने ही कँटीले और नुकीले थे और वही हुआ जो होनी को मंजूर था । हम , होनहार होकर होनी के आगे यहां भी हार गए । फ़ेल फ़ेल फ़ेल की गूंज एकदम फ़िल्मी ढंग से हमारे कानों में गूंजने लगी और हम भी फ़िल्मी परम्परा में दोनों हाथों को कानों पर रखे नहीं …नहीं …नहीं …..चीखते सत्य को झुठलाने का यत्न करते घर लौटे । कई ऐसे वैसे विचार मन में आये । कई फैंटेसी दिमाग़ में जन्मीं मगर हम सबको झटक , मुँह को लटकती हालत में ले घर आ गये।

वह दिन था और वह समय …. वह दृश्य जो आज भी मुझे नहीं भूलता । मज़बूत इरादों वाले मेरे आदर्श , मेरे पिता ( श्री Devendra Jain )की आँखों में जीवन में पहली बार आँसू तैरते देखे थे मैंने । उन्हें हताश होते देखा था मैंने पहली बार , वो भी मेरी वज़ह से ! तब एक आवाज़ आई ,जिसने उस सूखती नदिया की धारा ही मोड़ दी , ” छोड़ो , तुमसे न होगा यह मैथ्स वैथ्स , अब बीकॉम ट्राय करो । ” यह आवाज़ थी मेरे चाचाजी (श्री Jainendra Jain )की और तब मैंने वाणिज्य नाम की उस गइया की पूंछ थाम विषय की वैतरणी पार करने की ठान ली ।

समय बीतते बीतते पता न चला कि खसरा खतौनी , एकाउंटेंसी जैसे अबूझ विषय कब मेरे जी को रुचने लगे और मैं पिछली बेंच दर बेंच फलाँगता सबसे आगे की बेंच पर ठाठ से बैठने लगा । मैं दंग रह गया ये देखकर कि सब कुछ कैसे बदल गया था । मैं दंग था कि कल तक कटखनी कैलकुलस मुझे खाने दौड़ती थी और आज उसी की तरह कठिन स्टेटिस्टिक्स के कठिन सवालों से मैं कैसे मज़े लेता खेल रहा था । कैसे टैक्सेशन के उलझे सवाल मैं बड़े विश्वास के साथ सुलझा रहा था और मेरे सहपाठी प्रशंसा भरी निगाहों से मुझे देख रहे थे । मैं दंग था यह देखकर कि कभी अपना नाम सबसे नीचे खोजता था , अब मैं अपनी क्लास या कॉलेज ही नहीं , यूनिवर्सिटी की मेरिट में भी अपना नाम सबसे ऊपर देख पा रहा था । मैं दंग था कि कैसे एक गलत विषय की राह को छोड़ दूसरी राह पकड़ी और भविष्य का एक नया रास्ता ही खुलता चला गया मेरे लिये और वरदी पहन, बहुत आला तो नहीं , फिर भी ठीकठाक नौकरी में आज आपके सामने हूँ और थोड़ा बहुत लिख पढ़ भी रहा हूँ ।

आप सोचते होंगे , यह किस्सा किसलिए ? दोस्तो , यह सही है कि मेरा किस्सा बहुत मामूली सा उदाहरण है और ऐसे किस्से भरे पड़े हैं चारों ओर । यही मैं भी कहना चाहता हूँ कि ऐसे एक नहीं , अनगिन उदाहरण हैं उन बच्चों के लिये जो दसवीं बारहवीं के रिज़ल्ट पर आज अपनी आँखों के आगे अँधेरा और नैराश्य का समन्दर पा रहे होंगे । कितनों के पिता की आंखों में आँसू छलक रहे होंगे और कितनों के कदम कुछ ग़लत का निर्णय ले , उठने को होंगे।

उन बच्चों से है मेरा आव्हान कि तुम्हारे साथ भी यदि ऐसा कुछ घट गया हो, नम्बर घट गये हों या कोई सपना ही टूट गया हो तो बच्चे , बस एक गोली धैर्य की और एक गोली विवेक की तुरंत निगल जाओ , तुम देखोगे , ऊंचाई बढ़ाने या तीस दिन में वज़न घटाने वाली दवाइयों का असर हो न हो , इन दो गोलियों का असर ज़रूर होगा। ज़रूरी नहीं, मैथ्स तुमसे न चले तो दुनिया में और कुछ नहीं चलेगा तुमसे। हर व्यक्ति के भीतर अपार खूबियां हैं और आज जितने अवसर तुम्हारे सामने हैं, उतने पहले कभी नहीं रहे।

तो यदि फेल…फेल…फेल जैसा कुछ तुम्हारे कानों में भी गूंज रहा हो , कुछ ऐसा वैसा मन में पल रहा हो तो ठहर जाओ। दसवीं या बारहवीं में कम नम्बर आ जाना या फ़ेल ही हो जाना बहुत फ़र्क नहीं डालेगा जीवन में। जीवन के विशाल समन्दर में कौन सी लहर कब तुम्हें ऊपर उछाल तुम्हारी लाइफ बदल दे और तुम आसमान को छू लो , पता नहीं। तुम ख़ुद दंग रह जाओगे।

( लेखक मलय जैन पुलिस ऑफिसर है और भोपाल में पदस्थ है )

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