सितारों की एक जंग झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर भी

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babul supriyo

सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों में अनेक सीटों पर विभिन्न क्षेत्रों के सितारे लोकसभा में जाने के लिए एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं। इनमें फिल्मी सितारों की संख्या भी खासी है। ऐसी ही एक मुकाबला पश्चिम बंगाल एवं झारखंड की सीमा पर भी चल रहा है। सीट है आसनसोल। इस औद्योगिक नगरी से फिलवक्त ख्यात पार्श्व गायक बाबुल सुप्रियो लोकसभा सदस्य होने के साथ केंद्र सरकार में मंत्री भी है। सुप्रियो उन दो भाजपा नेताओं में से एक हैं जो पिछले लोकसभा के चुनाव में पश्चिम बंगाल से चुनकर गए थे। किसी जमाने में हिंदी फिल्मों में धूम मचाने वाली बांग्ला बाला मुनमुन सेन को इस बार ममता दीदी ने तृण मूल कांग्रेस से चुनाव मैदान में उतारा है। वे सांसद तो अभी भी हैं, लेकिन वे बाकुड़ा सीट से जीतकर लोकसभा में पहुंची थी।

इस बार आसनसोल सीट जीतने और मुकाबला रोचक बनाने के मकसद से उनकी सीट बदली गई है। इससे निश्चित तौर पर मुकाबला रोचक हो चला है। जितनी परेशानी बाबुल सुप्रियो के लिए हुई है, उससे कहीं ज्यादा परेशानी मुनमुन सेन के लिए भी हो रही है। वे इस इलाके के लिए एकदम नई हैं तो बाबुल पांच साल यहां से निर्वाचित रहने के चलते अपना व्यक्तिगत जनाधार भी बना चुके हैं। इसके अलावा भाजपा ने यहां मोदी लहर पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। उसका असर भी चुनाव पर पड़ेगा ही। कितना पड़ता है इसकी गवाही चुनाव के नतीजे ही दे पाएंगे।

दूसरी ओर टीएमसी सुप्रीमो ममता दीदी का आक्रामक चुनाव अभियान पूरे राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ले आया है। उनके लिए तो यह चुनाव करो या मरो की स्थिति है। इसी कारण मुकाबला भी रोचक बन पड़ा है। दरअसल, यहां चुनाव के पात्र भले ही फिल्मी हों, लेकिन चुनाव मुकाबला दांव-पेंच पूरी तरह से राजनीतिक है। टीएमसी के साथ ही बीजेपी की भी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि तमाम कोशिशों के बाद भी दोनों अपने पक्ष में कोई लहर पैदा नहीं कर पाए हैं। मतदाताओं की चुप्पी ने दोनों प्रत्याशियों ही नहीं दोनों दलों के रणनीतिकारों में भी बड़ी बेचैनी है। वोट पाने के लिए अभिनेत्री मुनमुन सेन ने पोस्टरों पर अपनी मां सुप्रिया सेन के फोटो चस्पा किए हैं तो मैदान में अपनी अभिनेत्री पुत्री राइमा को भी उतारा है। उधर, बीजेपी खेमे के उत्साह को बढ़ाने के लिए इसी लोकसभा क्षेत्र के दायरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो बार सभाएं लेने आ चुके हैं। हाल ही में रामनवमी के जुलूस पर पथराव के बाद पैदा हुआ सांप्रदायिक चुनाव आज तक फिजां में महसूस किया जा रहा है। इसके चलते चुनावी गणित किसके पक्ष में बनेंगे-बिगड़ेंगे इसका फैसला भी चुनाव के नतीजे ही करेंगे।

इन राजनीतिक जोड़ियों के बारे में क्या कहें?

जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं और धरती पर साकार होती हैं। यह जुमला परंपरागत वैवाहिक जोड़ियों पर ही लागू होता है। राजनीतिक या फिल्मी जोड़ियों के बारे में ऐसा कहना बेमानी ही होगा। ये जोड़ियां तो किसी न किसी मकसद से बनती हैं औऱ कब टूट जाए कहना मुश्किल है। कोई इस दल से उस दल में तो कोई एक-दूसरे के सामने ही चुनाव लड़ रहा है। राजस्थान के लोकसभा चुनाव में ऐसी अनेक जोड़ियां हैं, जो तुकबंदी की तरह गिनाई जा रही हैं। इस बार राज्य में दो मुख्यमंत्री पुत्र लोकसभा में जाने को स्ंघर्षरत है। झालावाड़ सीट से कुछ दिन पहले तक मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंतसिंह मैदान में हैं। ये मां-बेटे झालावाड़ राजपरिवार से ही हैं। वे यहीं से चार बार सांसद रह चुके हैं।

उधर मौजूदा मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत के पुत्र वैभव जोधपुर सीट से पहली-पहली बार मैदान में उतरे हैं। वे जोधपुर के ही निवासी हैं। दो राजघरानों के मौजूदा वंशज भी चुनाव मैदान में हैं। जयपुर राजघराने की दीया कुमारी मेवाड़ के प्रसिद्ध तीर्थ कांकरोली यानी राजसमंद से चुनाव मैदान में है। उन्होंने कमल ध्वज थाम रखा है। वहीं केंद्र में मंत्री तक रहे और भंवर जितेंद्रसिंह अलवर से चुनाव लड़ रहे हैं। राज्य की राजनीति में आए दो साधुओं में से एक बाबा बालकनाथ से उनका मुकाबला होगा। बाबा मूलतः रोहतक के मस्तनाथ मठ से आते हैं औऱ वे अलवर से ही सांसद रहे चांदनाथ के शिष्य हैं। ऐसा ही एक मजेदार चुनावी मुकाबला भुजिया व रसगुल्लों के लिए ख्यात बीकानेर लोकसभा सीट से भी हो रहा है। यहां भाजपा ने दो बार चुनाव लड़ चुके अर्जुनराम मेघवाल को तीसरी बार टिकट दिया है।

वहीं कांग्रेस ने भारतीय पुलिस सेवा के अफसर रहे उनके मौसेरे भाई मदन गोपाल मेघवाल को मैदान में उतारा है। वे पहली बार ही राजनीति के मैदान में उतरे हैं। जयपुर ग्रामीण सीट पर पूर्व ओलिंपियन व सैन्य अधिकारी, मोद मंत्रिमंडल के सदस्य राज्यवर्धन सिंह राठौर और राष्ट्रमंडल खेलों की पदक विजेता कृष्णा पुनिया का मुकाबला पहले ही काफी सुर्खियां बटोर चुका है। ये दोनों क्रमशः भाजपा और कांग्रेस से चुनाव मैदान में हैं। राजनीति पर बात हो औऱ दलबदलुओं का जिक्र न आए, तो कथा पूरी होती नहीं। लिहाजा राजस्थान में इस बार दो दलबदलु भी चुनावी मुकाबले में हैं। भाजपा से सांसद रहे मानवेंद्र सिंह कांग्रेस में पहुंच चुके हैं। पार्टी ने उन्हें बाड़मेर से टिकट थमाया है। इसी तरह भाजपा से कांग्रेस में पहुंचे प्रमोद शर्मा झालावाड़ सीट पर दुष्यंतसिंह को चुनावी चुनौती दे रहे हैं।

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