नितिनमोहन शर्मा

गाय के नाम पर राजनीति का “ठेका” तो भाजपा के पास है लेकिन उसकी चिंता…चीतों को लेकर है। गाय के नाम पर जनमानस को उद्वेलित करने वाली भाजपा की शिवराज सरकार चीतों पर लाखों खर्च कर रही लेकिन उसके पास गौमाता के लिए 20 रुपये भी नही है। ये एक गाय की एक दिन की खुराक की राशि भी इसी कथित गौभक्त सरकार ने मुकर्रर की है। वह भी तब जब इसी प्रदेश में पशुआहार के नाम पर दूध के दाम आसमान तक पहुंच गए लेकिन सरकार बेफिक्र है कि गाय का पेट “20 रुपल्ली” में भर जाएगा।

लम्पि वायरस से तिल तिल कर दम तोड़ रहे पशुधन की चीत्कार..चीतों के स्वागत सत्कार में दब गई। अनुदान के अभाव में दम तोड़ती गोशालाओं का दर्द भी..”चीता इवेंट” में कही गुम हो गया। एक चीते पर 3 से 13 लाख खर्च करने वाली सरकार के पास गोशालाओं को अनुदान देने के पैसे ही नही। 20 रुपये जैसी नाम मात्र की राशि भी सरकार 22 महीने से दबाकर बैठी हुई है। वह भी तब, जबकि गोशालाओं के प्रतिनिधि नियमित मांग कर रहे है। धरने दे रहे है। ज्ञापन दे रहे है। मुख्यमंत्री से गुहार लगा रहे है।

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थक हारकर अब गोशाला वालो की तरफ से इंदौर से ही प्रदेश के मुखिया को चेतावनी दी गई है की हमारे धैर्य की परीक्षा न ले। अन्यथा जनआंदोलन के लिए तैयार रहे। ये चेतावनी आरएसएस से जुड़े गौसेवा विभाग के बैनर तले जुटे 28 जिलों की गोशालाओं के प्रतिनिधियों की तरफ से आई है। शिवराज सरकार के लिए इससे शर्म का विषय ओर क्या होगा कि गोशालाओं के प्रतिनिधियों ने कमलनाथ को शिवराज सिंह चौहान से ये कहते हुए बेहतरीन बताया कि गोमाता को लेकर नाथ की कथनी करनी में कोई फर्क नही था।

शिवराज की कथनी करनी में अंतर”…इससे अच्छे तो कमलनाथ थे”

गौमाता के नाम से राजनीति का “पेटेंट” कराने वाली भाजपा ओर उसकी शिवराज सरकार की गाय को लेकर नीति और नियत सामने आ गई है। चीतों को लेकर गदगद होने वाले प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान चीतों पर लाखो का खर्च कर रही है। चीतों का इवेंट कर रही सरकार के पास गोमाता के नाम पर महज 20 रुपये है। ये 20 रुपये सरकार ने ही तय किये है। एक गाय की एक दिन की खुराक के हिसाब से। उस पर भी शर्मनाक स्थिति ये है कि ये 20 रुपये भी सरकार 20 महीने से ज्यादा समय से रोककर बैठी है।

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अनुदान के अभाव में गोशालाओं की स्थिति दयनीय जो चली है और गोवंश दम तोड़ रहा है। उस पर लम्पि वायरस गोवंश के लिए कहर ढा रहा है। सरकार लम्पि की रोकथाम के लिए टीके लगाने की बात कह रही है लेकिन गोशालाओं से जुड़े प्रतिनिधि इस टिके को ही खरिज कर रहे है। उनका कहना है कि ये किसी काम के नही है। बस सरकार दिखावा कर रही है। ये टिके न तो प्रमाणित है और न इस बात की पुष्टि है कि इससे महामारी रुकेगी। गाय के नाम पर बात बात में उद्वेलित होने वाली भाजपा के राज में गौमाता ओर गोशालाओं की सुध लेने वाला कोई नही।

गौशालाओं को 5 एकड़ जमीन देने का वादा करने वाली सरकार ने अब तक एक फीट जमीन तक किसी गौशाला को आवंटित नही की। गाय को लेकर शिवराज सरकार की इस कथनी और करनी के अंतर ने आरएसएस से जुड़े गोसेवा विभाग को भी गुस्से में भर दिया है। विभाग के बैनर तले इंदौर में प्रदेश के 28 जिलों की गोशालाओं के प्रतिनिधि इंदौर में जुटे ओर शिवराज सिंह चौहान को चेतावनी दी कि आप गोसेवकों के धैर्य की परीक्षा न ले। अन्यथा एक बड़े जनआंदोलन का सामना करना होगा। गाय के साथ सरकार की ये हरकत उन लोगो की आंखे खोलने के लिए पर्याप्त है जिन्हें लगता है कि भाजपा के राज में गोवंश सुरक्षित-संवर्धित है।

इंदौर में जुटे गोसेवकों का कहना है कि इससे तो बेहतर कमलनाथ थे। गोसेवा के मामले में उनकी नीति और नियत में कोई फर्क नही था। महज 13 महीने में उन्होंने प्रदेश में 150 नई गोशालाओं का निर्माण भी कर दिया था। 300 निर्माणाधीन थी जो उनके जाने के बाद ऐसी ही पड़ी है। उलटे भाजपा की शिवराज सरकार ने 20 रुपये तक का अनुदान रोके हुए बैठी है। गोशाला वाले 22 महीने से इसकी मांग कर रहे है। कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम कई बार ज्ञापन दे चुके है। अब जनआंदोलन की तैयारी है।

गोशालाओं वालो को 2019-20 में 8 माह का बकाया अनुदान था। खूब मांग पर दिया भी तो महज 3 माह का। ऐसे ही 2020-21 में 12 महीने के बकाया अनुदान पर फिर संघर्ष किया तो मिला मात्र 5 महीने का। 2021-22 में फिर सालभर का बकाया हो गया। डिमांड की तो मिला मात्र 4 महीने का। इस साल 2022-23 में अगस्त तक केवल 2 माह का अनुदान आवंटित हुआ। यानी हर साल बकाया के हिसाब से सरकार गोशालाओं का 22 महीने का अनुदान रोककर बैठी है। वो सरकार जो चीतों को लेकर भोपाल से लेकर श्योपुर तक बिछ बिछ गई। जिसके मुखिया का चीतों के आगमन पर ये कहना कि पूरा प्रदेश आज झूम रहा है। वे मुखिया गायों की दुर्दशा को लेकर बेफिक्र है।

एक गाय पर 100 रुपये खर्च, सरकार दे रही 20, वो भी 22 महीने से नही

गोशालाओं वालो का कहना है कि एक गाय पर प्रतिदिन कम से कम 100 रुपये खर्च होता है। जबकि सरकार इसके लिए 20 रुपये का पैमाना बना रखा है। 20 रुपये में क्या होता है? चारे की 2 पिंडी भी नही आती। ऐसे में कैसे गोशालाएं चलेगी ओर कैसे गौमाता जीवित रहेगी। मनरेगा के तहत चल रही गोशालाओं को तो फंड मिल रहा है। सबसे ज्यादा मुसीबत अनुदान प्राप्त गोशालाओं के सामने है। सरकार दो साल से अनुदान के नाम पर ऐसा व्यवहार कर रही है मानो हम भीख मांग रहे हो।

पशु आहार का बहाना बनाकर दूध 60 रुपये

गोसेवकों का कहना है जिनके पास एक भी गाय भैंस नही, वो दूध बेचने वाले दूध विक्रेता दूध का दाम 40 रूपये से 60 रुपये तक ले आये। हर बार तर्क पशु आहार के भाव बढ़ने का दिया। तो क्या सरकार को पता नही की गाय 20 रुपये में कैसे दिनभर का पेट भरेगी? जब दूध विक्रेता पशु आहार के नाम पर 4 साल में 20 रुपये लीटर तक के भाव बढ़ाकर बैठ गए तो गोशालाएं कैसे 20 रुपये से चलेगी?

गौमाता के श्राप से तो डरे सरकार, अन्यथा आंदोलन होगा

सरकार कम से कम गौमाता के श्राप से तो डरे। गोमाताओ के नाम पर आप राजनीति कर सकते हो पर उसी गोवंश को लेकर आपकी ये नीति हेरतभरी है। अभी 28 जिलों के गोशाला प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे। शेष जिलों का सम्मेलन भी जल्द होगा। सरकार अनुदान की राशि 20 रुपये से बढ़ाकर कम से कम प्रति गाय 100 रुपये करें। 22 महीने का अनुदान बकाया है। हमने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चोहान के नाम कलेक्टर को ज्ञापन दिया है। अगर मांगे नही मानी गई तो प्रदेशभर में एक बड़ा जन आंदोलन किया जाएगा।