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विश्व का सबसे रद्दी खेल क्रिकेट बना सबसे बड़ा तमाशा | World’s biggest junk sports made cricket the biggest spectacle

Posted on: 04 Apr 2019 09:29 by Pawan Yadav
विश्व का सबसे रद्दी खेल क्रिकेट बना सबसे बड़ा तमाशा | World’s biggest junk sports made cricket the biggest spectacle

वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया

इन दिनों वीवो आईपीएल की धूम है। लोकसभा चुनाव के समानांतर आठ क्रिकेट टीमों का टूर्नामेंट चल रहा है और इससे रोजाना करोड़ों टीवी स्क्रीन शाम को चौकों-छक्कों की गूंज से कंपायमान हो जाते हैं। कई युवकों में इसको लेकर दीवानगी देखी जा सकती है। इसमें तमाम स्टार क्रिकेट खिलाड़ी विभिन्न टीमों में खेल रहे हैं। ये एक ही देश के भीतर बनी अलग-अलग आठ टीमें हैं, इसलिए इस टूर्नामेंट में देशभक्ति का अंश लेशमात्र भी नहीं है। इसमें खेलने के लिए क्रिकेटर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आयात किए जाते हैं। कुछ टीमें राज्यों के नाम से बनी हैं, कुछ टीमें शहरों के नाम से बनी है। यह एक अद्भुत सर्कस है, जो करीब दसेक साल से चल रहा है और साल दर साल बुरी तरह फलफूल रहा है।

आईपीएल में बीस-बीस ओवर के मैच होते हैं। तमाम शहरों के स्टेडियमों पर आईपीएल के आयोजक कब्जा कर लेते हैं। राज्य सरकारें भी आसानी से आईपीएल के आयोजकों को स्टेडियमों पर कब्जा कर लेने देती हैं। पुलिस की सुरक्षा अलग उपलब्ध करवाती है। दुनिया के सबसे बोर और सबसे ज्यादा समय लेने वाले खेल क्रिकेट में जबरन आनंद को घुसाने के अच्छे खासे प्रयास कुछ सालों में हुए हैं। क्रिकेट के नाम से एक समानांतर आर्थिक तंत्र विकसित होने से यह अब खेल कम, कारोबार ज्यादा हो गया है। आईपीएल के मैदानों में कई कंपनियों की मौजूदगी देखी जा सकती है। एक-एक खिलाड़ी की पोशाक पर तमाम कंपनियों के स्टीकर देखने को मिलते हैं। मैदान के चारों तरफ विज्ञापन होते हैं। पिच पर विज्ञापन होते हैं। मैच से पहले स्टेडियम के आसपास टोपियां और टीशर्ट भी खूब बिकते हैं, जिनका कारोबार अलग है। क्रिकेट देखने के लिए आने वाली भीड़ की जेब से पैसे निकालने के लिए पानी बेचा जाता है, शीतल पेय बेचे जाते हैं और वाहनों की पार्किंग के तहत जमकर वसूली होती है।

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क्रिकेट विश्व का सबसे रद्दी खेल है। एक मैदान होता है, उसके बीच में कुछ मीटर लंबी एक पिच होती है, जिसके दोनों तरफ तीन डंडे गाड़ दिए जाते हैं। उसे और उसके सामने वाली कुछ जगह को विकेट कहते हैं। विकेट पर एक खिलाड़ी बल्ला लेकर खड़ा रहता है। एक पिच पर दो विकेट आमने-सामने होते हैं और उन पर दो बल्लेबाज तैनात रहते हैं। एक टीम के खिलाड़ी बारी-बारी से बल्लेबाज की भूमिका निभाते हैं। एक आउट होता है तो दूसरा आ जाता है। टीम में ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। दूसरी टीम मैदान में बल्लेबाजों को घेर कर खड़ी होती है। एक गेंदबाज एक तरफ से बल्लेबाज की तरफ गेंद फेंकता है। बल्लेबाज उस गेंद को मारता है या मारने से चूक जाता है। आउट होता है या नहीं होता है। फिर दूसरी गेंद फेंकी जाती है। छह गेंदों का एक ओवर होता है। यह सिलसिला चलता रहता है। दोनों टीमें बारी-बारी से बल्लेबाजी और फील्डिंग करती हैं। मैदान के चारों तरफ बड़ी संख्या में लोग इस मैच को देखते हैं। बल्लेबाज जब गेंद को मैदान के पार पहुंचाने में सफल हो जाता है तो उसे चौका कहते हैं। अगर गेंद बगैर टप्पा खाए मैदान के पार हो जाए तो उसको छक्का कहते हैं। चौके-छक्के लगने पर स्टेडियम में खूब शोर होता है।

युवाओं को अच्छी तरह से उलझाकर रखने के लिए अंग्रेजों ने क्रिकेट की रचना की है। इंग्लैंड में पहले आलसी लोग समय गुजारने के लिए क्रिकेट खेला करते थे। धीरे-धीरे समय बदला। अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुए कुछ देशों ने इसे बड़े पैमाने पर अपना लिया, जिनमें अपना भारत भी शामिल है। इस बौडम खेल की बोरियत को दूर करने के लिए कई नवाचार हुए। पांच दिन के टेस्ट को एक दिवसीय मैच में तब्दील किया गया। पहले साठ-साठ ओवरों के एक दिवसीय मैच शुरू हुए। उसके बाद पचास-पचास ओवरों के मैच होने लगे। इस खेल को बहुत कम देश खेलते हैं। इंग्लैंड, भारत, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड, वेस्ट इंडीज, आस्ट्रेलिया, श्रीलंका और बांग्लादेश में ही क्रिकेट का जोर है। बाकी देशों में लोग क्रिकेट नहीं खेलते हैं। वहां के लोग क्रिकेट देखने में समय बर्बाद करने की बजाए उसे देश की तरक्की में लगाना ज्यादा पसंद करते हैं।

अब पचास-पचास ओवर के एक दिवसीय मैचों का छोटा संस्करण ट्वंटी-ट्वंटी के रूप में ईजाद कर लिया गया है, जिसमें ढाई-तीन घंटे में एक मैच निबट जाता है। यह ज्यादा से ज्यादा लोगों को क्रिकेट की तरफ आकर्षित करने के लिए रचा गया षड्यंत्र है। इस तमाशे का प्रमुख सूत्रधार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया है। लोग टीवी पर क्रिकेट मैच देखते हैं। इसमें व्यापारिक प्रचार की अपरंपार संभावनाएं हैं। हर ओवर के बाद टीवी पर तीन चार विज्ञापन दिखाने का मौका मिलता है। हर विकेट गिरने पर कम से कम पांच विज्ञापनों की गुंजाइश बनती है। टीवी पर क्रिकेट देखकर समय नष्ट करने वालों को बोनस में ये विज्ञापन जबरन देखने पड़ते हैं।

इस तरह आईपीएल बेवजह रचा गया एक ऐसा तमाशा है, जिसमें विभिन्न कंपनियां अपने अनुपयोगी उत्पादों का जमकर प्रचार करने का अवसर खोजती हैं। जैसे कोकाकोला, पेप्सी या कोई अन्य कोल्ड्रिंक। लोगों के लिए इस तरह के शीतल पेय का सेवन जरूरी नहीं होता, लेकिन क्रिकेट टूर्नामेंटों के जरिए इन्हें जरूरी बना दिया जाता है। लोग जब हर ओवर के बाद खुलती हुई बोतल देखते हैं तो उनकी इच्छा भी पीने की हो ही जाती है। फिलहाल इस तमाशे का कोई तोड़ नहीं है। यह करोड़ों लोगो के समय की साफ-साफ बर्बादी है, लेकिन इससे इस खेल के रचयिताओं का क्या लेना-देना? उन्हें माल कूटना है और वे तमाशा दिखाकर माल कूट रहे हैं। किसकी हिम्मत है जो इस तमाशे को रोक सके।

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