निजी अस्पतालों को दर्द की कीमत पर समृद्ध होने की अनुमति किसने दी ?

निजी अस्पताल अब एक बड़े उद्योग में बदल गए हैं, जो लोगों के दुख-दर्द पर फल-फूल रहे हैं। वे पैसा बनाने की मशीन बन गए हैं।

सतीश जोशी

निजी अस्पताल अब एक बड़े उद्योग में बदल गए हैं, जो लोगों के दुख-दर्द पर फल-फूल रहे हैं। वे पैसा बनाने की मशीन बन गए हैं। इन्हें इंसानी दर्द की कीमत पर समृद्ध होने की अनुमति किसने और किस कानून के तहत दी है? ’ आम आदमी के लिए निजी अस्पताल कब जनोन्मुखी होंगे ?  सर्वोच्च अदालत केंद्र सरकार को निजी अस्पतालों की मनमानी वसूली के विरुद्ध एक समावेशी एवं साक्ष्य केंद्रित कानून बनाने के लिए आदेश दे तब उम्मीद कर सकते हैं, कि कुछ हो। वैसे भी देश में आम आदमी अपने स्वास्थ्य के लिए सरकारी से अधिक निजी अस्पतालों के रहमोकरम पर ही निर्भर है।

चूंकि स्वास्थ्य मुख्य रूप से राज्य का विषय है, इसलिए देश में ऐसा कोई केंद्रीकृत ढांचा ही नहीं है, जो निजी क्षेत्र के स्वास्थ्य संस्थानों को शुल्क और चिकित्सकीय सेवा न्यूनता के मामलों में अधिनियमित करता। कोविड संकट में निजी क्षेत्र के अस्पतालों में जिस तरह से जनता का अनाप-शनाप बिलों के माध्यम से शोषण किया, वह हमारी समूची व्यवस्था की विवशता को ही उजागर करता है। विडंबना यह है कि हर लोकप्रिय सरकार जनस्वास्थ्य को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में तो दर्शाती है, लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र का बुनियादी ढांचा इतना जर्जर और अपर्याप्त है कि हमारी अधिसंख्य आबादी निजी क्षेत्र में महंगी दरों पर अपना इलाज कराने के लिए विवश है।

केंद्र सरकार ने खुद संसद में स्वीकार किया है कि देश में कुल एलोपैथी चिकित्सकों का बमुश्किल 20 फीसद ही सरकारी सेवाओं में है। जाहिर है भारत में अधिकतर नागरिक अपने इलाज के लिए निजी डाक्टरों या अस्पतालों पर ही निर्भर हैं। केंद्र सरकार के अनुसार निजी अस्पतालों पर उसका कोई वैधानिक अंकुश इसलिए नहीं है, क्योंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है। वैसे केंद्र सरकार ने क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट बनाया है, लेकिन इसे केवल 11 राज्यों ने ही लागू किया है। जिन राज्यों ने इसे लागू किया है, वहां भी कोविड मरीजों से लाखों के बिल वसूले गए।

जिस रियल एस्टेट इंडस्ट्री से अस्पतालों की तुलना सुप्रीम कोर्ट ने की, वह सही ही है, लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि जनता के साथ जारी शोषण का विकल्प क्या है? क्या सरकारें इस इंडस्ट्री के आगे जानबूझकर हार मान रही हैं या फिर सरकारी ढांचा खड़ा करने में हम इतना पिछड़ चुके हैं कि इसे पटरी पर लाने में सालों लगने वाले हैं? सवाल नीतिगत भी है और नैतिक भी। इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में है कि देश की 17 फीसद आबादी अपनी कुल कमाई का 10 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करती है। चार फीसद आबादी का यह खर्च 25 फीसद से ज्यादा है।

कुल डाक्टरों का केवल 20 फीसद ही सरकारी सेवा में है इसलिए 74 फीसद लोग इस देश में प्राइवेट अस्पतालों की ओपीडी में और 65 फीसद भर्ती होकर इलाज कराने के लिए मजबूर हैं। हर पांच में से एक भारतीय इलाज के लिए कर्ज लेता है। एक और डरावना आंकड़ा आर्थिक सर्वेक्षण से मिलता है, वह यह कि हर साल स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण भारत में करीब साढ़े आठ लाख लोग मर जाते हैं। करीब 16 लाख लोग चिकित्सकीय लापरवाही के चलते मारे जाते हैं। 1990 से 2016 के मध्य गैर संक्रामक बीमारियों से मरने वाले भारतीयों का प्रतिशत 37 से बढ़कर 61 फीसद हो गया है।

अगर कोई व्यक्ति सिर्फ बुखार से पीड़ित होकर सरकारी अस्पताल में भर्ती होता है तो उसे 2,845 रुपये खर्च करने पड़ते है, वहीं प्राइवेट अस्पताल में यह खर्च 15,513 हो जाता है। अन्य बीमारियों के इलाज पर आने वाले खर्च का अंदाजा इससे सहज ही लगाया जा सकता है। वास्तविकता यह है कि सरकारी क्षेत्र में जानबूझकर ऐसे सेवा नियम बनाए जाते हैं कि अधिकांश चिकित्सक सरकार के साथ काम नहीं करना चाहते। दरअसल वेतन से लेकर सेवा संवर्ग में हर राज्य ने अलग-अलग नियम बना रखे हैं। जूनियर से लेकर विशेषज्ञ डाक्टरों तक के लिए वेतन इतने कम हैं कि वे सरकारी सेवाओं में आना नहीं चाहते।

एक परीक्षा पास कर आइएएस अफसर आल इंडिया कैडर में मोटी तनख्वाह और सुविधाएं पाते हैं, जबकि एकीकृत पाठ्यक्रम से विशेषज्ञ बनने वाले डाक्टरों के लिए न कोई एकीकृत संवर्ग है, न वेतन। हर जिले में मेडिकल कालेज खोलने की नीति से डाक्टरों की संख्या तो बढ़ेगी, लेकिन वे खराब नीतियों के चलते सरकारी सेवाओं में नहीं आएंगे और निजी अस्पतालों में जनता शोषण का शिकार होती रहेगी। बेहतर होगा नीतिगत स्तर पर सरकारी सेवाओं को आधारभूत तरीके से समुन्नत कर सार्वजनिक क्षेत्र को डाक्टरों के लिए आकर्षक बनाया जाए। सुप्रीम कोर्ट को भी चाहिए कि वह इस बात का संज्ञान ले कि देश में स्वास्थ्य क्षेत्र को कैसे एकीकृत माडल पर खड़ा करने के लिए सरकारों को बाध्य किया जाए?