हमें वर्गीय स्वार्थ से ऊपर उठकर एक-दूसरे की सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़नी होगी

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Kashmiri Pandits

नीरज राठौर

जो लोग कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के निकाले जाने पर दुखी है, उन्हें दुःख नहीं हो रहा है 20 लाख आदिवासियों के बेघर होने पर, जिन्हें गर्व है हिन्दू होने पर, जिन्हें गर्व है मुसलमान होने पर, उन्हें धर्म में कोई रूचि नहीं, वो अधर्म के साथ खड़े हैं।

भारत के संकुचित मानसिकता के लोगो की धर्म में कोई रूचि नहीं है। उनकी रूचि है तो केवल साम्प्रदायिकता में, रूचि है तो केवल हिन्दू-मुस्लिम खेलने में, रूचि है तो केवल अपने अपने नेताओं और राजनैतिक पार्टियों की चाटुकारिता में भले उन नेताओं को कोई रूचि नहीं आम नागरिकों की समस्याओं में भले उन नेताओं और पार्टियों को केवल अपनी अपनी जान और दौलत बचाने में रूचि हो, भले उन नेताओं को केवल जनता को लूटने, जनता की सम्पत्ति छीनकर भूमाफियाओं, खनन माफियाओं, बड़े उद्योगपतियों और व्यपारियो को सौंपने में हो…..चाटुकार उनकी जयकार में ही लगे रहेंगे और आज लगभग हर नागरिक इसी मानसिकता में जी रहा है। क्योंकि धार्मिक और सभ्य होने की परिभाषा बदल दी गयी और अब जो अधर्म को देखते हुए भी मौन रहे, अपनी आँखें बंद रखे वही धार्मिक व सभ्य कहलाता है।

कई लोग हैं जो मुझसे पूछते है कि आपने कौन सा पहाड़ उखाड़ लिया, आपने कौन सा बड़ा काम कर लिया…फेसबुक पर लिखने भर से खुद को बड़ा क्रांतिकारी समझने लगे ? आदिवासी मुद्दे पर प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर आपने कोई तीर थोड़ी ही मार लिया कई लोग है जो कहते हैं कि जमीन पर काम करो, जमीन पर उतरो…..

में उन सभी से पूछना चाहता हूँ कि जो लोग जमीन पर काम कर रहे हैं क्या उनके साथ आप खड़े हुए ? जो लोग जमीन पर ही रेंग रहे हैं, क्या आप उनके साथ खड़े हुए ? जो लोग पहले बड़े बड़े काम करके चले गये क्या आपने उनका अनुसरण किया ? जिसने अकेले ही पहाड़ खोद कर रास्ता बना दिया, क्या उस मांझी के साथ आप लोग खड़े थे ? क्या आपने उसका अनुसरण करके कोई पहाड़ काटकर रास्ता बनाया अकेले ?

यदि नहीं तो मुझे क्यों सलाह देते फिर रहे हैं आप लोग ?

चार वर्णों की बात फिर आ जाती है, इन चार वर्णों में सबसे बड़ी संख्या है शूद्र वर्ण की इस वर्ग को सदियों से सताया गया है, आज भी सताया जा रहा है, लेकिन कुछ लोग दुनिया में ऐसे भी होते हैं जो सही और गलत का अंतर जानते हैं, जो धर्म और अधर्म का अंतर जानते हैं, जो अधर्म, असत्य व अन्याय का विरोध करते हैं…..जैसे कि हरीश मेहरा जिन्होंने एक ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी वंचितों को उनका संवेधानिक हक़ दिलाने की लड़ाई विगत 40 सालो से इंग्लैंड एवं इंडिया में लड़ रहे है। वास्तविक क्षत्रिय थे चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक, राजा राम मोहन राय जो अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध निर्भीकता से लड़े।

रही वैश्यों की बात, तो उनका कोई बैरी नहीं होता, उन्हें किसी से कोई बैर नहीं होता। उन्हें तो जो भी ताकतवर दिखाई देगा, उनके साथ खड़े हो जायेंगे। उन्हें अपने व्यापार से मलतब होता है।
लेकिन इन सबसे अलग एक वर्ण और भी होता है और वह है साधू संतो का साधू वह जो किसी भी दड़बे में कैद न हो, जिसे किसी भी कीमत पर खरीदा न जा सके, जिसे कोई भी भयभीत न कर सके, जो कभी भी किसी निर्दोष का अहित न सोचे, जो हर अत्याचारी के विरुद्ध आवाज उठाये। वास्तव में संन्यासी चारों वर्णों के श्रेष्ठ गुणों के मिश्रण से तैयार होता है। लेकिन अब ऐसे संन्यासी नहीं पाए जाते।

सदैव स्मरण रखें:

पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, रोजा-नमाज, व्रत-उपवास करने वाले, धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने या रटने वाले धार्मिक नहीं होते। पंडित-पुरोहित, पादरी-मौलवी, हाफ़िज़-आलिम, साधू-संत, महन्त-मंडलेश्वर भी धार्मिक नहीं होते धार्मिक वही होते हैं, जो अधर्म (अत्याचार, अन्याय, शोषण, लूट-पाट…आदि) के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखते हैं जो अपराधियों, अत्याचारीयों, अन्यायियों का बहिष्कार करने या उन्हें सुधारने का साहस रखते हों कहने का मतलब है कि हमें धर्म, मजहब एवं वर्ण से ऊपर उठकर एक दुसरे की सामजिक न्याय की लड़ाई लड़ना होगी, तभी मानवता का कल्याण हो पायेगा।

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