उत्तम स्वामी: एक बालयोगी का महात्मा बनना

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जब पहली बार उत्तम स्वामी से उनके प्रवचन मे मिले थे और उनसे काफी प्रभावित हुए थे उनके प्रवचन की आकर्षक शैली, सरल शब्द रचना और सहज प्रस्तुति उन्हें आकर्षित कर गई श्रीधर पराड़कर जी ने उनपे किताब लिखी है जिसका नाम ‘सिध्द्योगी-श्री उत्तम स्वामी’ है.हम उसीके कुछ अंश रोज आपके साथ साझा करेंगे।

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पुराण कथाओं में कठोर तपस्या के विषय में पढ़ने को मिलता है। ध्रुव के विषय में पढ़ने को मिलता है कि वह बाल्यावस्था में ही राज महल के सुख छोड़ वन में जाकर तपस्या में लीन हुआ था। वह सारी बातें वर्तमान युग में कपोल कथाएं लगती है। मगर 20 वर्षीय उत्तम ने किशोरावस्था में निर्देशन में बिना किसी साधन अथवा सहायता के कठोर तपस्या कर पुराणों के वर्णन को सत्यता प्रदान की।

घनघोर जंगल दूर-दूर तक मनुष्य का नामोनिशान नहीं। किसी प्रकार की साधन सुविधा नहीं। प्राथमिक आवश्यकता ओंके बिना अध्यात्म मार्ग का क्रमण किया। अरण्य में एक विशाल वटवृक्ष को अपना ठिकाना बना ध्यान धारणा जब का अहोरात्र अखंड क्रम प्रारंभ किया। शरीर पर के कपड़े नाम पर एक लंगोटी मात्र थी। मौसम सर्दी का हो गर्मी का हो अथवा वर्षा का सहारा था, तो लंगोटी, वृक्ष और धुनी का। आते समय कुप्पी पानी भरकर साथ में रख लेती चार-पांच दिन में लाया हुआ पानी खत्म हो चुका गया। आसपास पानी का स्त्रोत नहीं था। एक बार खाए बिना चल सकता है। परंतु पानी की आवश्यकता तो रहती ही है। पानी के निमित्त एक लकड़ी को नुकीला कर भूमि को खोदना प्रारंभ किया। आश्चर्य 5 फुट पर पानी की झील मिल गई। खाद्यान्न का प्रश्न ही नहीं था। बनाने के लिए समय भी नहीं था। फिर भी शरीर धर्म निभाना पड़ता है। सामान्यतः खाए जाने वाले फलों के वृक्ष पहाड़ पर मिलना संभव नहीं था। बेल व नीम के वृक्ष बहुतायत है। जब भूख लगती तब बेलनवा नीम की पत्ती भोजन के रूप में ग्रहण करता और स्वयं खनिज झील का पानी पीकर शरीर की आवश्यकता की पूर्ति कर लेता। तिथि वार नक्षत्र की गणना का अर्थ नहीं था श्रेष्ठ केवल दिन और रात सब कुछ भूल साधना का अनवरत क्रम लगभग 3 वर्ष तक चला।

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एक दिन स्वप्न में गुरु जी ने दर्शन दिए और कहा तुम्हारी साधना पूर्ण हो चुकी है। लेकिन शिष्य का मन तो ब्रह्मानंद में जमा हुआ था। लोगों के बीच जाने प्रवचन कर नाम कमाने की आकांक्षा विलुप्त हो चुकी थी। स्वप्न दर्शन के दूसरे दिन की बात है। शाम का समय था आंख बंद कर जॉब कर रहा था। एक श्रंखला पूर्णा कर खोली तो देखा कि सामने कोई बैठा हुआ है। 3 वर्ष से मनुष्य का चेहरा तक नहीं देखा था। किसी के आने की संभावना भी नहीं थी। पहले तो स्वयं कि आप पर विश्वास नहीं हुआ अनुमान किया कि कोई देवता होगा क्योंकि साधना काल में इस प्रकार के दर्शन होते रहते थे।

उपस्थित व्यक्ति श्रद्धा भक्ति युक्त अंतरण के साथ हाथ जोड़े मौन बैठा था। उसके समीप एक झोला रखा हुआ था वह बाल योगी के ध्यान पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा था। बाल योगी के आंख खोलने और सहज होने पर उसने बताया कि वह रेहटी निवासी किशोर पटेल है। कल टाटम्बरी बाबा के दर्शन करने अम्रज़िरी गया था। जब वह चलने लगा तब बाबा ने कहा पटेल बालक महात्मा के दर्शन करोगे मना करने का प्रश्न ही नहीं था हा करने पर बाबा ने बताया कि वह पहाड़ पर साधना रत है उससे मिलो।

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किशोर पटेल बताते हैं कि दूसरे दिन सुबह ही बाल महात्मा की खोज में घर से निकला। महात्मा के ठिकाने का पक्का पता नहीं था आप पहाड़ पर इधर-उधर ढूंढता रहा। पहाड़ी जलशून्य थी। बाल महात्मा के विषय में किसी से पूछता खोजते खोजते दिन ढल गया। शाम होने को थी अंततः एक पेड़ के नीचे ध्यान अस्त बालयोगी के दर्शन हुए अद्भुत दृश्य था। एक बड़ के पेड़ के नीचे धुनी चल रही थी। उसके सन्मुख किशोरावस्था का एक युवक ध्यानस्थ था शरीर पर एक लंगोटी थी सिर मूंछ और दाढ़ी के बाल बड़े हुए थे। पता नहीं कब से बालों को कैसे के दर्शन नहीं हुए थे उस अद्भुत दृश्य को देखकर मैं स्तब्ध रह गया था।

बाबा के कथना अनुसार बाल महात्मा मिल तो गए थे पर भी ध्यान मग्न थे। बिना मिले वापस लौटना उचित नहीं था। दिन भर का परिश्रम निरर्थक हो जाता। प्रतीक्षा में उसके सन्मुख बैठ गया और एक चमत्कारिक मूर्ती को देखता रहा। कुछ ही समय बीता होगा कि बाल महात्मा ने आंखें खोली अचंभित दृष्टि से मुझे देखने लगे उनके चेहरे का आश्चर्य भाव दूर होने पर प्रणाम कर मैंने अपना परिचय दिया तब जाकर वह सहज हुए।

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