केदारनाथ के इन अनजाने रहस्यों से चौंक जाएंगे आप | Unknown and Mysterious Secrets of Kedarnath

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भगवान भोलेनाथ के ज्योतिर्लिंगों के बारे में तो आप सभी जानते ही होगे। 12 ज्योतिर्लिंगों में से केदारनाथ को पांचवां ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। केदारनाथ को शिव का दूसरा घर भी कहा जाता है। वे सदैव वहां वास करते है और ज्योतिर्लिंग के रुप में अपने भक्तों को साक्षात दर्शन देते है और अपने सभी भक्तों के संकटों को दूर करते है। इस मंदिर के इतिहास में कुछ ऐसे रहस्य छिपे हैं जिन्हें बहुत कम लोग जानते हैं और इस स्थान के एक नहीं कई ऐसे रहस्य है जो आपको चौंका देंगे। पुराणों में तो इस तीर्थस्थान के लुप्त होने का भी जिक्र किया गया है। आज हम आपको ऐसे ही कुछ रहस्यों के बारे में बताने जा रहे है जो कि केदारनाथ मंदिर से जुड़े हुए है।

शिव ने दिया था यहां सदा वास करने का वरदान

आस्था का प्रतिक केदारनाथ धाम अपने आप में ही चमत्कार है। जून 2013 की आपदा में सबकुछ नष्ट हो गया था लेकिन मंदिर को नुकसान तक नहीं पहुंचा। यह इस बात का प्रमाण ही है कि भगवान शिव वहां आज भी मौजूद है। इस पवित्र ज्योतिर्लिंग की स्थापना के बारे में कहा जाता है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से ही प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया था। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर स्थित हैं।

पांडवों से नाराज होकर शिव आ गए थे केदार

केदारनाथ की स्थापना को लेकर एक और कथा प्रचलित है कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने के बाद पांडव हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन उस समय भगवान शिव पांडवों से नाराज थे। भगवान शंकर के आशीर्वाद के लिए पांडव काशी पंहुच गए, लेकिन शिव उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतर्ध्यान हो कर केदार में जा बसे।

वहीं पांडव भी शिव को मनाने के लिए केदार पहुंच गए लेकिन शिव ने भी बैल का रुप धारण कर लिया और अन्य पशुओं में जाकर मिल गए। तब पांडवों ने शिव को खोजने के लिए नई तरकीब लगाई। भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। उस समय अन्य सब गाय-बैल तो डर से निकल गए, लेकिन बैल के रुप में शंकर जी भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंर्तध्यान होने लगा। तब भीम ने बैल के पीठ का भाग पकड़ लिया।

इस कारण त्रिकोणी आकर में है ज्योतिर्लिंग

भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। यही वजह है कि केदारनाथ में शिव के ज्योतिर्लिंग का आकार त्रिकोणी है।

पशुपतिनाथ मंदिर से भी है संबंध केदारनाथ का

केदारनाथ की इस कथा में वर्तमान नेपाल में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर से भी संबंध है। कहा जाता है कि जब शिव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए थे।

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