किसी एडवेंचर से कम नहीं अमरनाथ यात्रा के यह रास्ते, जहां से गुजरते है यात्री

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हिमालय की गोद में स्थित अमरनाथ गुफा हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। अमरनाथ की खासियत यह है कि यहां पवित्र गुफा में बर्फ से स्वतः शिवलिंग बनता है। प्राकृतिक हिम से बनने के कारण ही इसे स्वयंभू ‘हिमानी शिवलिंग’ या ‘बर्फानी बाबा’ भी कहा जाता है। अमरनाथ की मान्यताओं को हर कोई भली भांती जानता है। इस वर्ष 1 जुलाई से यात्रा आरंभ होने जा रही है। यात्रा में लगने वाली हर सुरक्षा के इंतेजाम लगभग हो गए है।

चंद्रमा के साथ बदलता है शिवलिंग का आकार

आषाढ़ पूर्णिमा से रक्षाबंधन तक होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर जाते हैं। अमरनाथ की इस गुफा में ऊपर से बर्फ के पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। यहीं पर ऐसी जगह है, जहां टपकने वाली हिम बूंदों से करीब दस फिट ऊंचा शिवलिंग बनता है। शिवलिंग का आकार चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ-साथ घटता-बढ़ता रहता है। यह अपना पूर्ण आकार सावन की पूर्णिमा पर ले लेता है। इसके बाद अमावस्या तक धीरे-धीरे छोटा हो जाता है। यहां आश्चर्य की बात यह है कि शिवलिंग ठोस बर्फ का होता है, जबकि आसपास आमतौर पर कच्ची और भुरभुरी बर्फ ही होती है।

यह पवित्र गुफा श्रीनगर के उत्तर-पूर्व में 135 किलोमीटर दूर समुद्र तल से 13 हजार फीट ऊंचाई पर है। पवित्र गुफा के अंदर की लंबाई 19 मीटर, चैड़ाई 16 मीटर और ऊंचाई 11 मीटर है।

इन रास्तों से होकर गुजरती है अमरनाथ यात्रा

अमरनाथ यात्रा के लिए दो मार्ग हैं। पहला मार्ग पहलगाम से जाता है और दूसरा सोनमर्ग बालटाल से। हालांकि जम्मू और श्रीनगर से पहलगाम या बालटाल तक का सफर बस और छोटे वहन से किया जा सकता है। उसके बाद आगे पैदल ही जाना पड़ता है। यहां कमजोर और वृद्धों के लिए खच्चर और घोड़े की व्यवस्था रहती है।

पहलगाम से जाने वाला रास्ता

पहलगाम से जाने वाला रास्ता सरल और सुविधाजनक है। ज्यादातर यात्री इसी रास्तें से यात्रा करते है। श्रीनगर से पहलगाम 96 किलोमीटर दूर है। पहलगाम से आने वाले यात्रियों का बेस केंप स्टाप से 6 किलोमीटर दूर नुनवन में बनता है। इसके बाद यात्री यहां से 10 किलोमीटर दूर चंदनबाड़ी पहुंचते हैं। चंदनबाड़ी से आगे नदी पर बर्फ का पुल है। जहां से पिस्सू घाटी की चढ़ाई शुरू होती है। यात्रा में पिस्सू घाटी सबसे जोखीम भरा स्थल है। यह समुद्रतल से 11 हजार 120 फीट ऊंचाई पर है। खड़ी चड़ाई के कारण पहले चरण की यात्रा लिद्दर नदी के किनारे बहुत कठिन होती है।

पिस्सू घाटी के बाद 14 किलोमीटर दूर शेषनाग आता है। शेषनाग पहुंचने के बाद यहां भयानक ठंड का सामना करना पड़ता है। यहां प्रकृति की सबसे सुंदर झील है। इसमें झांकने से ऐसा लगता है कि मानो आसमान झील में उतर आया है। यह झील करीब डेढ़ किलोमीटर व्यास में फैली है। यहां की मान्यता है कि शेषनाग झील में शेषनाग का वास है और 24 घंटे में शेषनाग एक बार झील के बाहर निकलते हैं, लेकिन इसके दर्शन हर किसी को नहीं होते।

शेषनाग से पंचतरणी 12 किलोमीटर दूर है। बीच में बैववैल टॉप और महागुणास दर्रे पार करने पड़ते हैं, जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई 13 हजार 500 फीट व 14 हजार 500 फीट है। महागुणास चोटी से पंचतरणी का सारा रास्ता उतराई का है। ऊंचाई ज्यादा होने से यहां ऑक्सीजन की कमी भी होती है। जिसके लिए तीर्थयात्रियों को यहां सुरक्षा के इंतजाम करने पड़ते हैं। पंचतरणी से पवित्र अमरनाथ की गुफा केवल 8 किलोमीटर दूर है। अमरनाथ की इस पवित्र गुफा पहंुच कर यात्री पूजा अर्चना कर सकते है।

दूसरा रास्ता बालटाल, किसी एडवेंचर से कम नहीं

अमरनाथ यात्रा का दूसरा रास्ता बालटाल से होकर जाता है। बालटाल से पवित्र गुफा की दूरी केवल 14 किलोमीटर है, परंतु यह पूरा रास्ता सीधी चढ़ाई वाला है, और यह खतरों से भरा रास्ता है। इसलिए सुरक्षा की नजरिए से यह ठीक नहीं है। इस रास्ते को किसी भी नजरिए से सेफ नहीं माना जाता है। हालांकि रोमांच और खतरे से खेलने के शौकीन इस मार्ग से जाना पसंद करते हैं। इस रास्ते से जाने वाले लोग अपने रिस्क पर यात्रा करते हैं। यहां किसी अनहोनी की जिम्मेदारी सरकार नहीं लेती है।

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