ऐसे होती थी 30 साल पहले Para Commando की ट्रेनिंग

हर देश की ताकत उसकी सेना होती हैं। सीमा पर लगातार सेवा देने से आज हम अपने घरों में सुरक्षित बैठे हैं। आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे सबसे खतरनाक, शानदार और इंटेलिजेंट कमांडो के बारे में बताने जा रहे हैं। जिन्हें स्पेशल जगहों पर तैनात किया जाता है।

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हर देश की ताकत उसकी सेना होती हैं। सीमा पर लगातार सेवा देने से आज हम अपने घरों में सुरक्षित बैठे हैं। आज हम आपको भारत के कुछ ऐसे सबसे खतरनाक, शानदार और इंटेलिजेंट कमांडो के बारे में बताने जा रहे हैं। जिन्हें स्पेशल जगहों पर तैनात किया जाता है। ये बात शायद ही बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्हें बहुत ही कठिन प्रशिक्षण के दौर से गुजरना पड़ता है।

दरअसल, ध्येय वाक्य (बलिदान) को कंधे पर लेकर चलने वाले ये पैरा कमांडो बड़े से बड़े मिशन को अंजाम देते हैं। जो चीज़ नहीं हो सकती उसे भी ये कमांडो पूरा करने में हमेशा सफल रहते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे है किस तरह उनका चयन किया जाता है, तो चलिए जानते हैं।

(खतरनाक) पैरा स्पेशल फोर्स बनाने के लिए चुने हुए सेना की विभिन्न रेजिमेंट्स में से ही सिलेक्शन किया जाता है। जिसमें अधिकारी, जवान, जेसीओ, के आलावा विभिन्न रैंकों से सैनिक चुने जाते हैं। 10 हजार सैनिक में से एक सैनिक का इस फाॅर्स में चयन किया जाता है।

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बता दे, पैरा स्पेशल फोर्स बनने के लिए आवेदन ऐच्छिक होता है या कमान अधिकारी इसकी अनुशंसा करता है। इसके आलावा इनकी पहचान करना बहुत ही आसान है। इनके सर पर लगे गोल टोपी (मेहरून) और ध्येय वाक्य ‘बलिदान’ से होती है। इसके लिए बहुत मेहनत और मुश्किल प्रशिक्षण को पूरा करना होता है। इस कोर्स को करने के लिए औसत आयु 22 वर्ष है।

इसकी ट्रेनिंग 90 दिन तक चलती है। इस ट्रेनिंग को दुनिया के सबसे मुश्किल ट्रेनिंग में से माना जाता है। बता दे, इस ट्रेनिंग में मानसिक, शारीरिक क्षमता और इच्छाशक्ति का जबरदस्त इम्तिहान लिया जाता है। इस ट्रेनिंग के दौरान दिनभर में पीठ पर 30 किलो सामान जिसमें हथियार व अन्य जरूरी साजो-सामान लाद कर 30 से 40 किमी की दौड़, तरह-तरह के हथियारों को चलाना और बमों-बारूदी सुरंगों का प्रयोग आदि सिखाया जाता है।

इस ट्रेनिंग में सबसे मुश्किल होते हैं 36 घंटे। इस 36 घंटे में बिना सोए, खाए-पीए एक मिशन को अंजाम देना होता है। इस मिशन में सैनिक की हर तरह से परीक्षा ली जाती है। असली गोलियों और बमों के धमाकों के बीच उन्हें दिए गए मिशन को अंजाम देना होता है।

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दरअसल, अगर कोई सैनिक सोता या खाता-पीता पकड़ा जाता है तो उसे या तो तत्काल निकाल दिया जाता है या पूरा कोर्स फिर से करवाया जाता है। इस ट्रेनिंग के दौरान जवानों को मामूली घटनाओं का भी बारीकी से ध्यान रखना पड़ता है। जैसे- फलां बंधक ने किस रंग के कपड़े पहने थे या जिस रास्ते से वे आए हैं, वहां कितने दरवाजे-खिड़की थे।

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इसका सबसे खतरनाक इम्तिहान होता है जब सैनिकों को डुबोया जाता है। इसलिए क्योंकि उनके दिमाग से मौत का डर निकालने के लिए किया जाता है। जब सैनिक थककर चूर हो जाते हैं तो उन्हें एक कुंड में ले जाकर सांस टूटने तक बार-बार पानी में डुबोकर यह देखा जाता है कौन कितना सहन कर सकता है। जो भी इस परीक्षा में खरा नहीं उतर पाता, उसे प्रशिक्षण से निकाल दिया जाता है। इसमें से आधे जवान तो 36 घण्टे की ट्रेनिंग में ही बाहर निकाल दिया जाता है।