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इन आधुनिक भगीरथों को पानी भरा सलाम

Posted on: 24 Jun 2019 10:43 by Mohit Devkar
इन आधुनिक भगीरथों को पानी भरा सलाम

जब सारी निगाहें घुमड़ते बादलों की तरफ हों, चेन्नई जैसे महानगर भीषण जल संकट से तड़प रहे हों, तमाम राजनीतिक लफ्फाजी के बावजूद ऊपर से बरसने वाला 54 फीसदी पानी बेकार बह रहा हो, तब ऐसे बेकल कर देने वाले माहौल में देश में कुछ भगीरथ पुराणों से निकलकर हकीकत में गंगा की आत्मा को अपनी संकल्प और कर्म शक्ति से बचाने में खप रहे हैं। ये वो लोग हैं, जिन्होंने अपने जीवन का ध्येय ही दूसरों को जीवनदान बना लिया है। इस जनूनी ध्येाय पूर्ति में सारी बाधाएं, विषमताएं और धूर्तताएं मानो संकल्पशक्ति के गंगाजल में धुल गई हैं।

अफसोस कि जैसे-जैसे समय का पहिया आगे बढ़ रहा है, भारत जैसे देश में जीवनदायिनी जल धाराएं सिकुड़ती जा रही हैं। इसे लेकर राजनीति भी खूब हो ती है, लेकिन उन्हें संरक्षित करने के ठोस उपायों में किसी की दिलचस्प नहीं है, क्योंकि कलसी भर पानी से जीवन भले मिल जाता हो, कुर्सी नहीं मिलती। लेकिन भागीरथ मन इन बातों की परवाह नहीं किया करता। वर्तमान के ‘बहुचर्चित जल पुरूषों’ से हटकर कुछ ऐसे भागीरथ भी हैं, जो प्यासे लोगों, प्राणियों और धरती को तृप्त करने के एकल प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में एक प्रेरक उदाहरण है यूपी के बुंदेलखंड के महोबा का। बूंद-बूंद पानी के लिए भटकते लोगों को देखकर बन्नी गांव के किसान बलबीरसिंह ने जल संकल्प लिया और गांव के पास दो साल से सूखी पड़ी चंद्रावल नदी को करीब 2 किमी तक अपने ट्यूब वेल के पानी से भर दिया। जो खबरें सामने आई हैं, उसके मुताबिक अब इस नदी में 10 फुट की गहराई तक पानी भरा है।

बन्नी और आस पास के कई तटीय गांवों में सूखे पड़े कई हैंडपंप फिर से पानी देने लगे हैं। बेजान हो चुके कुओ में पानी रिसने लगा है। गांव के हैंडपंपों से फिर छलकते पानी की मधुर आवाजें आने लगी हैं। किसान तो बलबीर सिंह की जय-जय कार कर रहे हैं। भगीरथ बलबीर ने इस सूखी नदी की गोद भी अपने ट्यूब वेल के पानी से भरी। ट्यब वेल का बिजली बिल भी उन्होंने ही चुकाया। बलबीर ने तय किया है कि बारिश तक वे चंद्रावल नदी को इसी तरह पानी से सींचते रहेंगे। प्यासी चंद्रावल नदी की प्यास बुझाना भी आसान नहीं था। शुरू के 15 दिनों तक बलबीर जो पानी डालते, नदी उसे पूरी तरह पी जाती। 16 दिन से पानी नदी के पात्र में भी झलकने लगा। 2 माह बाद चंद्रावल सचमुच नदी की तरह इतराने लगी। अब इस इलाके में बलबीर संचयित जल अमृत की तरह लोग छक रहे हैं। बलबीर सिंह भी उम्र की आधी सदी पूरी कर चुके हैं।

नदी को पानी से भरना एक भगीरथी एंगल है तो उपलब्ध पानी को अमृत की तरह बचाना दूसरा और महत्वपूर्ण कोण है। समुंदर के किनारे बसे महानगर मुंबई में पानी की बर्बादी रोकने और इसके लिए लोगों को समझाने का बीड़ा अपने जमाने के जाने माने कार्टूनिस्ट, लेखक, पत्रकार आबिद सुरती ने उठाया है। कभी प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग के आखिरी पन्नों पर कार्टून कोना ‘ढब्बूजी’ को चितेरकर तीखा कटाक्ष करने वाले सुरतीजी ने जीवन के उत्तरार्द्ध में पानी बचाने को अपनी ‘अंतिम इच्छा’ मान लिया है। 84 वर्षीय आबिद हर रविवार की सुबह मुंबई के उपनगर मीरा रोड की सड़कों पर निकलते हैं। किसी सोसायटी में घुसकर हर फ्लैट की घंटी बजाते हैं। उनके साथ एक प्लंबर और एक वॉलंटियर होता है। वह हर फ्लैट के नल चेक करके उनकी मरम्मत कराते हैं। इस तरह बूंद बूंद टपकते पानी को बचाकर सुरतीजी ने पिछले 12 साल में करीब 3 करोड़ लीटर पानी बर्बाद होने से बचाया है। पानी बचाने का यह विचार भी उन्हें अपने दोस्त के घर टपककर व्यर्थ जाते पानी को देखकर आया। खास बात यह है ‍कि आबिद नल सुधार का यह काम मुफ्तअ में करते हैं। उनकी एक एनजीओ है ‘ड्राॅप डेड फाउंडेशन, जो पर्यावरण प्रेमियों की आर्थिक मदद से चलती है। चूं‍कि आबिद स्वयं नल सुधार का कोई पैसा नहीं लेते, इसलिए उनके साथ काम करने वाले प्लंबर भी जन सेवा मानकर अपनी सेवाएं मुफ्त में देते हैं। आबिद के इन काम की गूंज पूरी दुनिया में है।

पानी निकालने, उसे बचाने जितना ही महत्वपूर्ण है, उसे साफ रखना। मोक्ष दायिनी काशी में गंगा को निर्मल रखने का सार्थक प्रयास वाराणसी के ही राजेश शुक्ला कर रहे हैं। उनके दिन की शुरूआत काशी के गंगा घाटों के किनारे तलहटी में जमा कचरा निकालने से होती है। राजेश यह काम पांच सालों से कर रहे हैं। पहले अकेले थे, अब गंगा सफाई करने वालों का कारवां उनके साथ है। विशेष बात यह है ‍कि अधेड़ उम्र के राजेश एक कंपनी में मैनेजर हैं अौर नौकरी करते हुए गंगा सफाई का काम भी नियमित करते हैं। वक्त और स्वार्थ उनके कभी आड़े नहीं आया। राजेश रोज गंगा घाट पहुंच कर पहले गंगा आरती करते हैं। फिर घाट पर मौजूद लोगों को आस्था के नाम पर गंगा में फूल-माला, भगवान की तस्वीरें, कपड़े, पोथी-पत्रा आदि सामग्रियों न डालने और साबुन-शैंपू लगाकर न नहाने की सलाह देते हैं। आधे घंटे बाद वे अपनी टीम के साथ गंगा नदी से कचरा निकालने का काम शुरू कर देते हैं।

गंगा में डाला गया कूड़ा वे अपने हाथों से निकालते हैं। इसी तरह चेन्नई में ‘रेन मैन’ के नाम से मशहूर डाॅक्टर शेखर राघवन पूरे शहर में रेन वाॅटर हार्वेस्टिंग का अभियान छेड़े हुए हैं। वो मानते हैं बारिश की बूंद-बूंद बचाने गंगा को बचाने से कम नही है।

राजा भगीरथ ने तो भयंकर तप कर गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाकर अपने 60 हजार पूर्वजों को भूत योनि से मुक्ति दिलाई। लेकिन आधुनिक भगीरथ तो इस जिंदा धरती को भूत योनि में जाने से बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं और वो भी किसी राजनीतिक अथवा सामाजिक पुरस्कार अथवा प्रतिफल की अपेक्षा के बिना। आबिद सुरती कहते हैं कि ‘मैं गंगा को बचा नहीं सकता, लेकिन पानी की बर्बादी तो रोक ही सकता हूं। बलबीर, सुरती और राजेश के जल सरंक्षण के इस भगीरथी प्रयास को पानी भरा सलाम !
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