राजनीति में प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं होता, लेकिन प्रतिष्ठित होकर जिए गौर साहब

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गोविन्द मालू

जिन्हें गौर से सुनता था जमाना, वे बगैर बोले चले गए! लेकिन, जो राजनीति की गूढ़, पथरीली सचाई, रपट, लपट-झपट से वे हास्य-विनोद के जरिए ही अच्छी तरह जहन में पैठा देते थे। संगठन क्षमता, लोक संग्रह की कला, प्रशासनिक सूझ-बूझ जो गौर साहब में थी, वह बिरले ही राज नेताओं में मिलती है। बगैर तनाव का बोझ पाले उन्होंने हर समय जीवन को जिया। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे हमेशा सहज रहे। उनसे बात करना हमेशा आसान रहा। कभी मोबाइल बंद या के व्यस्त नहीं मिला। वे राजनेताओं के लिए हैरत अंग्रेज सबक दे गए। संवादी, बेबाकी, सहज, सरल सदैव बने रहे, यही उनके लोकप्रिय होने का फलसफा था।

वे हमेशा चर्चा में बने रहे, लेकिन रिश्तों की दो फाड़ उन्होंने न तो अपनी पार्टी में की, न अन्य विचारधारा के लोगों से।
प्रशासन में सख्त,सम्बन्धों में वे निर्मल बने रहे। जब वे मुख्यमंत्री बनें तो हमें लगा कि अब गौर साहब से फोन पर बात मुश्किल होगी, ऐसा ही संशय हमारे मित्रों को भी रहा। लेकिन, उनके मुख्यमंत्री बनते ही जब एक बार भोपाल जाना हुआ तो, सुबह सुबह हमारे साथी कहने लगे अब गौर साहब आपका फोन नहीं उठाएंगे, मिलना तो दूर। यह चुनौती तीर की तरह लगी और सुबह 9 बजे मैंने मोबाइल लगाया, तो उसी अंदाज में आवाज आई श्हलू अरे भाई कहाँ हो?श् मैंने कहा श्साहब भोपाल आए थे, अब आपसे मुलाकात होगी क्या? उनका जवाब था अभी आ जाओ तब 74 बंगले में ही थे। मैंने कहा भाई साहब अभी तैयार होना है, फिर आएंगे, तो उनका जवाब आया फिर 11 बजे आ जाओ।

तय समय पर मित्रों के साथ पहुंचा तो कॉफी, नाश्ता और चर्चा 35 मिनिट तक आराम से चलता रहा। हमारे मित्र कहने लगे कि उन्हें तो मुख्यमंत्री पद का कोई तनाव ही नहीं, वे तो आराम से मिल रहे है। वो भी पहले जैसे ही! तो ऐसे थे सहज गौर साहब! मानवीय, सदाशय भी उनके गुण होने से वे लोकप्रिय रहे! आडवाणीजी की स्वर्ण जयंती रथ यात्रा के एक क्षेत्र के मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी मुझे ठाकरेजी और श्री प्रभात झा ने दी थी। उसमें एक दुर्घटना में जालपा माता जी के पहले गाड़ी पलटकर खाई में गिर गई! सभी ने कुशल क्षेम पूछी, गौर साहेब का उसके बाद इंदौर आना हुआ तो घर आये और कहा एक बात बताओ, इलाज में कितना खर्च हुआ, ये सब पार्टी करेगी,ठाकरेजी भी चिंता कर रहे थे। मैंने आदर पूर्वक उनसे कहा ईश्वर ने इस लायक बनाया है, जरूरत नहीं, धन्यवाद!

गौर साहेब ने यह किस्सा कई जगह बताया और हर 4-5 दिन में हाल जानते रहे। गौर साहेब ने कभी किसी से मनभेद नहीं रखा ,हर दल में उनके चाहने वाले होते थे व्यक्तिगत सम्बन्ध निभाते उनके राजनीतिक बयान ऐसे चुटीले होते की वे चर्चा में स्वतः आ जाते।अखबार वालों के साथ खुलकर बात करते ,लेकिन कह देते भाई यह छापना नहीं, उसका पालन सम्बन्धों की वजह से होता था। उद्योग मंत्री रहते हुए पीथमपुर एक समारोह में जाना था, मैं मिलने गया तो बोले साथ चलो, तो जो नेता उनके साथ जा रहे थे, उनके साथ मैंने जाने से इंकार कर दिया तो उन्होंने मुझे समझाया कृष्ण नीति पर चलो मान-अपमान का कोई प्रश्न नहीं होता।प्रतिष्ठा का कोई प्रश्न नहीं होता राजनीति में ,इसे खूँटी पर टांग कर चला करो। ऎसे गौर साहेब थे जिनको समझने का ना कोई ओर था ना छोर। कब क्या करेंगे वे यह पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता था। पटवा जी के बाद गौर साहेब का जाना उस पीढ़ी का अवसान है,जिन्होंने कार्यकर्ताओं को तराशा, पहचान दी और पहचाना| खुले विचारों के लिए सदैव याद आएंगे गौर साहेब।श्रद्धा वनत।