चिंता ये कि अब अपराध का ही राजनीतिकरण होने लगा है..

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अजय बोकिल
सर्वोच्च न्यायालय ने गुरूवार को सभी राजनीतिक दलों को अपने चुनावी उम्मीदवारों के आपराधिक रिकाॅर्ड की जानकारी वेबसाइट पर डालने और बेदाग को टिकट क्यों नहीं दिया, यह बताने का जो निर्देश दिया है, वह राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम तो हो सकता है, लेकिन इससे राजनीति का अपराधीकरण रूक जाएगा, यह मान लेना अति आशावाद होगा। क्योंकि इस मामले में सबसे अहम ‍िजम्मेदारी स्वयं राजनीतिक दलों की है, जब तक वो खुद को नहीं बदलेंगे तब कुछ ठोस हासिल होना असंभव है। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश देश में राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को लेकर दायर याचिकाअोंपर दिया। कोर्ट ने कहा कि पार्टियों को वेबसाइट, अखबार और सोशल मीडिया पर सम्बन्धित प्रत्याशी के आपराधिक रिकाॅर्ड की जानकारी देने के साथ यह भी बताना होगा कि वो ऐसे लोगों को टिकट क्यों दे रहे हैं और बेदाग को क्यों नहीं दे रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सियासी दलों को ऐसे (दागी) उम्मीदवार को चुनने के 72 घंटे के भीतर चुनाव आयोग को अनुपालन रिपोर्ट देनी होगी, जिसके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। जो पार्टी इस निर्देश का पालन नहीं करती, उनकी जानकारी चुनाव आयोग अदालत के संज्ञान में लाए। देश की सर्वोच्च अदालत ने यह आदेश एक अवमानना याचिका पर दिया। याचिका में राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा उठाते हुए दावा किया गया था कि सितंबर 2018 में शीर्ष अदालत द्वारा जारी गाइड लाइन का पालन नहीं किया जा रहा है। इस गाइडलाइन में कोर्ट ने सियासी दलों से अपने उम्मीदवारों का आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करने को कहा था।

न्यायमूर्ति रोहिन्टन फली नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सियासी दल अपने उम्मीदवारों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की विस्तृत जानकारी फेसबुक व ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, क्षेत्रीय भाषा के एक अखबार और एक राष्ट्रीय अखबार में प्रकाशित करवाएं। कोर्ट के मुताबिक प्रतीत होता है कि बीते चार आम चुनाव से राजनीति में अपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। अदालत की चिंता इस बात का प्रमाण है कि देश की राजनीति में अपराधिक तत्वों की घुसपैठ न केवल बढ़ती जा रही है बल्कि कुछ मामलों में यह निर्णायक भी होने लगी है। ऐसे तत्व चुनाव जीतकर विधान मंडलों में जा बैठे हैं और कुछ तो सत्ता का हिस्सा भी हैं।

अगर देश की वर्तमान सत्रहवीं संसद का रिकाॅर्ड ही देखें तो इस बार चुनकर आए सांसदों में से 43 फीसदी पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। एडीआर की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा चुनाव के दौरान नामांकन के समय इन लोगों ने जो हलफनामे दिए उनके मुताबिक 29 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या, बलात्कार और अपहरण जैसे गंभीर मामले लंबित है। इनमें भी सर्वाधिक यानी कुल 303 में से 116 निर्वाचित भाजपा सांसद दागी हैं। जबकि कांग्रेस के 52 में से 29 सांसद आपराधिक मामलों में घिरे हैं। इनमे भी केरल के कांग्रेस सांसद डीन कुरियाकोस पर 204 मुकदमे दर्ज हैं। वैसे आपराधिक छवि वाले सांसद सभी पार्टियों में हैं।

मसलन सत्तारूढ़ राजद के घटक दल लोजपा के तो सभी 6 सांसद, बसपा के 10 में से 5, जदयू के 16 में से 13, तृणमूल कांग्रेस के 22 में से 9 और माकपा के 3 में से 2 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं। अलबत्ता बीजेडी के केवल सांसद पर ही ऐसे मामले दर्ज हैं। यही आंकड़ा राज्यवार देखें तो आपरााधिक मामलों में फंसे सर्वाधिक सांसद केरल और बिहार से चुन कर आए हैं। केरल से 90 , बिहार से 82 , पश्चिम बंगाल से 55 , उत्तर प्रदेश से 56 और महाराष्ट्र से 58 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले लंबित हैं। पिछली 16 वीं लोकसभा में यह प्रतिशत 34 था, अब यह बढ़कर 43 फीसदी हो गया है।

यहां बुनियादी सवाल यह है कि राजनीतिक दल आपराधिक छवि वाले प्रत्याशियों को ‍िटकट देते ही क्यों हैं, दूसरे, ऐेसे लोगों को जनता जिताती क्यों है? ध्यान देने की बात है कि राजनीति में सत्ता ही सर्वोपरि है। उसी के हिसाब से नैतिकता की परिभाषाएं भी बदलती रहती हैं। सियासी पार्टियों का सारा जोर ‘किसी भी तरह से’ चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज होना होता है। चुनावी राजनीति की शब्दावली में जो शब्द सबसे ज्यादा सुनने में आता है, वह है ‘जिताऊ उम्मीदवार।‘ अर्थात ऐसा उम्मीदवार जो येन-केन- प्रकारेण चुनाव जीतने में सक्षम हो।

यह काम बाहुबल और धनबल से हो तो भी कोई दिक्कत नहीं, पर सत्ता मिलनी चाहिए। इसके लिए इस बात को आसानी से नजर अंदाज कर‍ दिया जाता है कि प्रत्याशी ने चुनाव किस तिकड़म से जीता। चुनाव में बहाया पैसा किस तरीके से, किस रास्ते से कमाया। ‘जिताऊ’की इस कसौटी में सीधे सरल मार्गी व्यक्ति कहीं नहीं टिकते। अगर टिक भी गए तो उन्हें ‘संत राजनीतिज्ञ’ की प्री- रिटायरमेंट पदवी दे दी जाती है। वो पार्टी में अमूमन शोभा की सुपारी ही होते हैं। जबकि बड़बोले, उद्दंड, धूर्त और बहुरूपिए’ किस्म के लोगों को ‘सीट निकालने वाला मान लिया जाता है।

दूसरा अहम मुद्दा यह कि मतदाता ऐसे लोगों को चुनते क्यों हैं ? इसकी एक बड़ी वजह यह है ‍कि आज देश में राज कर रही अधिकांश सरकारों के कुशासन और सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता के चलते लोगो का सामान्य व्यवस्था पर से भरोसा लगभग उठ चुका है। लिहाजा उन्हें ऐसे प्रतिनिधि चाहिए, जो पब्लिक की आंकाक्षाअोंको किसी भी तरह पूरा कर सकें। तिकड़म से या डंडे से, कानूनी तरीके से या गैर कानूनी तरीके से, पर काम होना चाहिए। पब्लिक की निगाह में यह बात दीगर हो जाती है कि सम्बन्धित प्रत्याशी पर कितने मामले दायर हैं और पुलिस उसे क्यों ढूंढ रही है? हालांकि यह भी सही है कि कई बार नेताअों के खिलाफ राजनीतिक द्वेष वश मुकदमे कायम कर दिए जाते हैं, लेकिन अनेक जनप्रतिनिधि ऐसे हैं, जिन पर हत्या, बलात्कार जैसे अत्यंत गंभीर प्रकरण दर्ज हैं।

ये वास्तव में माफिया हैं और समांतर व्यवस्था का संचालन बेखौफ करते हैं। चुनाव जीतने के बाद यही लोग देश को सच्चरित्रता का प्रवचन देने में संकोच नहीं करते। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है, उसका अक्षरश: पालन हुआ तो भी इस बात की गारंटी नहीं है कि राजनीतिक दल अपराधी और विवादित छवि वाले लोगों को टिकट देने से परहेज करेंगे। अलबत्ता दागी प्रत्याशियों की आपराधिक रिकाॅर्ड को उजागर करने से लोगों को पता चल जाएगा कि जो लोग चुनाव लड़कर लोकतंत्र के कर्णधार बनना चाहते हैं, उनकी असली औकात क्या है। लेकिन इतने ‘दुर्गुणों’ के बाद भी जनता ने उन्हें चुन दिया तो अदालत भी इसमें कुछ नहीं कर सकती, क्यों‍‍कि आपराधिक छवि वाला जनादेश की गंगा नहा चुका होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद पार्टियां अपने प्रत्याशियों का आपराधिक रिकाॅर्ड को सार्वजनिक कर देंगी तो भी हालात और तकाजों का बदलाव कैसे होगा? क्योंकि दलो को करोड़ों खर्च कर चुनाव जीतकर सत्ता भी चाहिए ताकि राजनीति में रहकर राजनेताअों ने जो ‘निवेश’ ‍िकया है, उसकी भरपूर वसूली की जा सके।

अब चुनावों का नैतिक मूल्य यही है कि किसी भी तरह चुनाव जीतकर राजदंड अपने हाथ में लो। यह सोच जब तक नहीं बदलेगी, राजनीति का अपराधीकरण रूकना तो दूर उल्टे बढ़ता ही जाएगा। अगर सियासी पार्टी यह बता भी देंगी कि उन्हें अपराधी को टिकट क्यों दिया तो उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। क्योंकि अब तो वो स्थिति आ गई है कि अपराध का ही राजनीतिकरण होने लगा है। बहरहाल कोर्ट की मंशा लोगों को जागरूक करने और आंखों देखे मक्खी न‍ निगलने देने की सलाह देने की है। भाजपा ने न्यायालय के इस आदेश का स्वागत किया है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि खुद संसद ही कानून बनाकर ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से सख्तीि से रोके, जिन पर आपराधिक मामले कायम हैं और आम बोलचाल में जिन्हें असामाजिक माना जाता है। लेकिन क्या सियासी पार्टियां ऐसा करके अपने ही हाथ कटवाना चाहेंगी?

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