रक्षाबंधन की सच्ची ऐतिहासिक कथा, ऐसे हुई शुरुआत

रक्षाबंधन को लेकर कुछ ऐतिहासिक कहानियां भी है।

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रक्षाबंधन भाई बहन का पवित्र पर्व माना जाता है, रक्षाबंधन को लेकर कुछ ऐतिहासिक कहानियां भी है। रक्षाबंधन से जुड़ा एक प्रसंग महाभारत में भी आता है। महाभारत में भगवान शिशुपाल का वध करते हुए श्री कृष्ण की उंगली कट गई थी। भगवान श्री कृष्ण की उंगली से रक्त को बहते देखकर द्रौपदी ने तुरंत अपनी साडी का किनारा फाड़कर भगवान श्री कृष्ण की उंगली में बांध दिया था, जिसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को उनकी रक्षा करने का वचन दिया था। इसी ऋण को चुकाने के लिए द्रोपदी के चीरहरण के समय श्री कृष्ण ने उनकी लाज रखी थी। तब से भाई बहन का यह पर्व रक्षाबंधन का पर्व मनाने का चलन चला आ रहा है।

मध्यकालीन युग में भी हैं एक किस्सा

इसके साथ ही रक्षाबंधन से जुडी एक और कहानी महारानी कर्णावती की है। मध्यकालीन युग में राजपूत व मुस्लिमों के बीच संघर्ष के दौरान जब बहादुर शाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्व-सूचना से कर्णावती घबरा गई तब उन्होने मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजी और हुमायूं ने राखी की लाज रखते हुए मेवाड़ पहुंच कर बहादुर शाह के विरुद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्णावती और उसके राज्य की रक्षा की थी।

मां लक्ष्मी से भी हैं रक्षाबंधन का नाता

पौराणिक कथा के मुताबिक रक्षा बंधन का यह पवित्र पर्व माता लक्ष्मी जी द्वारा बली को राखी बांधने से जुडा हुआ है। दानवों के राजा बलि को अपने सौ यज्ञ पुरे कर लेने के बाद उसे स्वर्ग प्राप्ति की इच्छा हुई। जिससे इंद्र को अपना राज पाठ खोने का भय था जिसके लिए उन्होने भगवान विष्णु की मदद ली।

भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि के यहां भिक्षा मांगी जिसमें उन्होने तीन पग भूमि मांग ली। राजा बलि ने उन्हें इच्छानुसार तीन पग भूमि दान में देने का वचन दे दिया। जिसमे भगवान विष्णु ने एक पैर में स्वर्ग, दुसरे पैर में पृथ्वी को नाप ली, जिसके बाद तीसरे पैर के लिए बलि ने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया। ब्राह्मण बने श्री विष्णु के बलि पर पैर रखते ही वह पाताल ने लोक पहुंच गए।

बलि के इस वचन पालन को करता देख विष्णु प्रसन्न हो गए और उन्होंने बलि को वरदान मांगने को कहा। इसके बदले में बलि ने रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया, श्री विष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, राजा बलि का द्वारपाल बनना पडा। तब मां लक्ष्मी ने विष्णु जी को दोबारा वैकुंठ धाम लाने के लिए राजा बलि को राखी बांधी और अपने पति विष्णु को उपहार में मांग लिया।

जिस दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को राखी बांधी उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी। और इस पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि उस दिन से ही राखी का यह पवित्र त्यौहार मनाया जाने लगा।

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