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दादी-नानी की कहानी अब बच्चे नहीं सुन रहे

Posted on: 05 Mar 2019 07:55 by Pawan Yadav
दादी-नानी की कहानी अब बच्चे नहीं सुन रहे

मुकेश तिवारी

वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. मिथिलेश दीक्षित को इस बात का दुख है कि आज बच्चों के पास दादी और नानी की कहानी सुनने का वक्त ही नहीं है। नई पीढ़ी में तकनीकी ज्ञान तो खूब बढ़ गया है, मगर संवेदना और मूल्य कहीं ना कहीं बिखर रहे हैं। डॉ. दीक्षित ने खास बातचीत में कहा कि इसके लिए बच्चे और नई पीढ़ी नहीं अभिभावक जिम्मेदार हैं।

Akhil Bharaiy Mahila Sahity Samagam-min

अभिभावकों की जिम्मेदारी है बच्चों को अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कार से जोड़े रखने की। अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम में भाग लेने आईं डाॅ. दीक्षित ने हिंदी भाषा और लेखन में आ रही कमी पर भी चिंता प्रकट की। उनका मानना है कि हिंदी का स्तर गिरता जा रहा है। स्तरीय और गंभीर लेखन में भी कमी आई है। सोशल मीडिया की वजह से लिखने वालों को बड़ा मंच, तो मिला है, लिखने वालों की बाढ़ भी आई है, मगर इनके लेखन में भाषा के संस्कारों की कमी दिखाई देती है। युवा पीढ़ी में रचना शिल्प भी कम है। इस सबकी वजह है अध्ययन की कमी।

साहित्यकार का परिचय

शिक्षा: संस्कृति एवं हिन्दी में एमए और पीएचडी।
लेखन-प्रकाशन-योगदान: मूलतः कवयित्री। निबंध आदि अन्य विधाओं में भी लेखन। क्षणिका एवं हाइकु पर विशेष कार्य। पत्रकारिता में भी उल्लेखनीय कार्य। हाल ही में हाइकु पर आपकी एक साथ छह पुस्तकें- ‘सदी के प्रथम दशक का हिन्दी हाइकु-काव्य’, ‘परिसंवाद’, ‘एक पल के लिए’, ‘अमर बेल’, ‘लहरों पर धूप’ और ‘आशा के बीज’ आई हैं। उनकी हाइकु-रचनाधर्मिता को डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव जी द्वारा संपादित ग्रन्थ ‘डॉ. मिथिलेश दीक्षित की रचनाधर्मिता’ में रेखांकित किया गया है।

अब तक हाइकु की कुल दस, क्षणिका की छह, निबंध की दो, नवगीत की एक, साक्षात्कार की दो पुस्तकें सहित आपकी कुल 27 पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। आपकी रचनाओं को देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में स्थान मिला है। हाइकु संदर्भ ग्रंथ का आपने संपादन किया है। भारतीय हाइकु क्लब की सचिव एवं इसी क्लब की मुख पत्रिका ‘हाइक-लोक’ की सम्पादक हैं। ‘सरस्वती सुमन’ त्रैमासिकी के शीघ्र प्रकाश्य ‘हाइकु विशेषांक’ का संपादन भी आप कर रही हैं।
सम्मान: उप्र हिन्दी संस्थान, लखनऊ द्वारा पत्रकारिता के लिए दो बार- वर्ष 1995-96 व 1996-97 में सम्मानित। आॅल इंडिया पोइटेस काॅन्फ्रेन्स द्वारा वर्ष 2000 में विशिष्ट सम्मान, सहस्त्राब्दि विश्व सम्मेलन द्वारा वर्ष 2000 में, आई जी एस आई विशिष्ट सम्मान दिसम्बर 2010, विक्रमशिला विद्यापीठ द्वारा डी. लिट् की मानद उपाधि सहित कई स्तरों पर सम्मानित।

लेखक घमासान डाॅट काम के संपादक हैं।

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