बैठे ठाले कौआ और समाचार

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एन के त्रिपाठी

जाड़े की एक सुबह चार पाँच हिंदी अंग्रेज़ी के अख़बार पढ़ने से मेरा मस्तिष्क प्रदूषित हो चुका था। धूप थोड़ा तेज़ होने पर मैं घर से निकलकर चलते चलते एक ऐसे स्थान पर पहुँचा जहाँ केवल घने वृक्ष थे। मैं घने वृक्षों के बीच में जाकर बैठ गया। यहाँ वृक्षों के अतिरिक्त केवल छन कर आती हुई धूप दिखाई पड़ रही थी। मानव सभ्यता के कोई भी अवशेष दृष्टिगोचर नहीं हो रहे थे।जाड़े की उस सुनहरी धूप में अचानक दूर से एक कौए की आवाज़ सुनाई दी।उस शान्त वातावरण मे उसकी आवाज़ बहुत ही रहस्यमयी और सन्नाटे को और भी गहरा करने वाली प्रतीत हुई।आंखें बंद करने पर मानस पटल कुछ दार्शनिक सा हो चला। कौए को सामान्य तौर पर एक अत्यंत निकृष्ट पक्षी माना जाता है परन्तु उस सन्नाटे में मुझे उसकी यदाकदा आती हुई आवाज़ बहुत प्रिय प्रतीत हुई।

एक ज़माना था जब गाँव में कौए की आवाज़ सुनकर लोग किसी अच्छे समाचार की प्रतीक्षा करते थे। इस अर्थ में उसे एक संदेश वाहक के रूप में देखा जाता था। उसकी आवाज़ उस घंटी की तरह होती थी जो घर में अख़बार बांटने वाला अख़बार डाल कर बजा दिया करता है।
भोपाल और इंदौर में जहाँ मैं रहता हूँ वहाँ मुझे कौआ दिखाई नहीं पड़ता है। श्राद्ध के समय पूड़ी खिलाने के लिए दूर दूर तक भटकना पड़ता है और थक हार कर उस पूड़ी को कहीं फेंकना पड़ता है। मन को संतोष देने के लिए ये मान लेना पड़ता है कि इस पूड़ी को कौआ आकर खा लेगा जैसे TV चैनलों के फ़र्ज़ी चुनाव सर्वेक्षणों को ही सही मान लिया जाता है।

कुछ लोग कौए को काफ़ी चतुर पक्षी भी मानते हैं। उसकी जैसी चतुराई आज कल अनेक सफल लोगों में दिखाई पड़ती है। लेकिन चतुराई की भी अपनी एक सीमा है और ज्ञातव्य है कि कोयल किस तरह इस चतुर पक्षी को भी मात दे देती है। लेकिन कुछ लोगों ने कौए को चतुर के साथ साथ विवेकशील भी माना है। इसीलिये मध्यप्रदेशके प्रसिद्ध गीतकार विट्ठल भाई पटेल ने लिखा है ‘ झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो….’

लगभग तन्द्रा की स्थिति में पहुँच कर विचार श्रंखला पौराणिक कथाओं की ओर जाने लगी। इन्द्र के पुत्र जयंत ने श्री रामचंद्र जी को परेशान करने के लिए कौए का रूप धारण किया और चोंच से चरणों पर प्रहार करने का प्रयास किया। कौआ बनते ही उसकी चतुराई तो बढ़ गई लेकिन उसका साहस जाता रहा। श्रीरामचंद्र जी के द्वारा फेंकी गई गई एक छोटी सी सींक के डर से वह अनेक लोकों में भागता फिरा और अंत में भगवान के आशीर्वाद से ही बच सका।

महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण से पृथक मानस मे एक अनूठे उत्तरकांड की रचना की है जिसके प्रमुख पात्र महान ज्ञानी काकभुशुन्डि एक कौए के रूप मे है। सदा भगवान विष्णु के निकट रहने वाले गरूड़ जी का स्वभाव दरबारी हो गया था और यहाँ तक कि एक बार उन्हें रामरूप मे विष्णु की शक्ति पर भी संदेह हो गया। उनकी शंका और घमंड के निवारण के लिए भगवान ने उन्हें काकभुशुन्डि के पास ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेज दिया। शक्तिशाली पक्षीराज गरूड़ को एक निकृष्ट पक्षी के समक्ष जाकर वैसे ही शाष्टांग करना पड़ा जैसे सत्ता में मदमस्त नेताओं को चुनाव के समय मतदाता के सामने जाकर करना पड़ता है।

काकभुशुन्डि के प्रवचन के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने वेदों और पुराणों का पूरा सार अपने महान ग्रन्थ रामचरित मानस में कह दिया है। कौए का ध्यान करते करते अचानक वो दृश्य भी सामने आ गया जब वह बाल कृष्ण से उनके आंगन में जाकर उनके हाथ से माखन लगी रोटी छीन कर ले गया। भावुक मुसलमान भक्त रसखान के मुख से बरबस ये शब्द निकल पड़े —
“काग के भाग कहा कहिये हरि हाथ सो लै गयो माखन रोटी”

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