अब नेहरू-गांधी नहीं, वाड्रा-गांधी परिवार कहिए जनाब | Seventh Lok Sabha Election 2019 was Historical for Congress

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priyanka gandhi

सत्रहवीं लोकसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहे। खासतौर पर कांग्रेस के लिए। कांग्रेस ने ये चुनाव राहुल गांधी की अध्यक्षता में पहली बार लड़े और उन्होंने चौकीदार चोर है जैसे नारों के साथ चुनाव अभियान की गरिमा को कई गुना बढ़ाया। इसके साथ ही राफेल जैसे मुद्दे उठाकर और जीएसटी को गब्बरसिंह टैक्स बताकर काफी हद तक गंभीर रहने का प्रयास किया। किसानों की कर्जमाफी और बेरोजगारों को हर साल 72 हजार रुपए देने की न्याय योजना की मुनादी कर उन्होंने दीर्घकालिक राजनीति की झलक भी पेश की।

एक औऱ गुणात्मक परिवर्तन इस बार के चुनाव में आया कि राहुल की छोटी बहन प्रियंका वाड्रा, जिनके राजनीति में प्रवेश की चर्चाएं लंबे समय से चल रही थी, वे भी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के ओहदे के साथ राजनीति में आ ही गई। जिम्मेदारी मिली पूर्वी उत्तरप्रदेश की २८ सीटों को जीताने की। अब वे इस नई भूमिका में कितनी सफल होती है, बुढ़ी कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में कितनी मददगार साबित हो पाती हैं और अपने भैया को प्रधानमंत्री के ओहदे तक पहुंचाने में कितनी कामयाब होती हैं इसका पता तो सत्रहवीं लोकसभा के चुनावी परिणामों का इंतजार करना ही होगा। इस चुनाव में इतना जरूर हुआ कि राहुल पर से पप्पू की तोहमत जरूर साफ हो गई।

उधर, वंशवाद की राजनीति का आरोप जरूर एक सीढ़ी और चढ़ गया। इस बार अप्रैल के दूसरे सप्ताह में जब राहुल अपना नामांकन जमा करने के लिए अमेठी गए तो उनके जुलूस में सज्जित रथ में माता सोनिया, बहन प्रियंका, बहनोई राबर्ट के साथ प्रियंका के पुत्र रेहान भी थे। उन्नीस साल के रेहान इसी साल मतदाता बने हैं और गांधी-नेहरू खानदान की छठी पीढ़ी से आते हैं। चूंकि मामा राहुल जीवन में कोई मामी ला नहीं सके, लिहाजा अब नेहरू खानदान तो आगे बढ़ने से रहा। यदि कोई चिराग बजरिए वरुण (संजय) गांधी आया भी तो वह भाजपा का कमल खिलाएगा, कांग्रेसी पंजा तो मजबूत करने से रहा।

लिहाजा राहुल को रेहान में संभावना दिखी और उन्होंने नामांकन रैली या रोड शो के दौरान ही सार्वजनिक तौर पर अपने गले से रुद्राक्ष की माला उतारकर रेहान के गले में डाल दी। हालांकि चुनाव अभियान के चलते इस घटनाक्रम ने सुर्खियों में जगह नहीं पाई, लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी तरह कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में मोतीलाल नेहरू ने अपने पुत्र जवाहरलाल का राज्याभिषेक महात्मा गांधी के हाथों कराया था।

इस बार भी एक गांधी ने आने वाली पीढ़ी का राज्याभिषेक कर भविष्य के संकेत दे ही दिए। यदि इसे महज संयोग माना जाए तो बात अलग है, अन्यथा आने वाले दिनों में देश को नेहरू-गांधी परिवार की जगह वाड्रा-गांधी परिवार की दुहाई देना होगी। अब सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस का हश्र जो भी हो, यह सच्चाई कदाचित बदलने वाली नहीं।

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