नहीं रहे उर्दू के महान कथाकार अब्दुल सत्तार

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इसी के साथ एक युग का अंत हो गया। और, अलीगढ़ में एक महान योद्धा चला गया। कुअँरपाल सिंह की तरह क़ाज़ी साहब (अब्दुल सत्तार) भी हिंदू-मुस्लिम संप्रदायवाद से लोहा लेने वाले अविचल व्यक्तित्व थे। दोनों की मित्रता भी एक उदाहरण बनकर नगर की स्मृतियों में बसी हुई है। कुअँरपाल सिंह कुछ वर्ष पहले गये, क़ाज़ी साहब आज। इनके साथ एक अध्याय समाप्त हो गया।

डेढ़ महीने की बीमारी के बाद दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में उन्होंने संसार से विदा ली। वे ८७ वर्ष के थे। सन् १९३३ में सीतापुर (उ. प्र.) मे। उनका जन्म हुआ था। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अवकाशप्राप्ति के बाद क़ाज़ी साहब वहीं रहते थे। पूरे नगर में कुअँरपाल और क़ाज़ी साहब सबसे साहसी, निर्भीक और लोकप्रिय व्यक्तियों में थे।

मेरे लिए यह व्यक्तिगत क्षति है। परिचय के शुरूआती दिनों से ही मुझे उनका बहुत स्नेह मिला। दिल्ली, अलीगढ, आणंद, भोपाल, जहाँ भी हम साथ रहे, उन्होंने अपने बड़प्पन का हर जगह परिचय दिया। मेरे कमरे में आ जाते, घंटों बातचीत-बहस करते। जीवन के अनुभवो से लेकर साहित्य की समस्याओं तक कोई ऐसा विषय नहीं था, जिसपर बात न होती और मेरे जैसे साधारण पाठक की बात को वे ध्यान से न सुनते। दूसरों को बड़प्पन वही देता है, जिसका अपना व्यक्तित्व बड़ा हो।

जनवादी लेखक संघ की स्थापना के साथ मेरा उनसे संबंध हुआ। वे सामाजिक प्रश्नों पर भी अत्यंत जागरूक थे। निष्क्रियता उन्हें छू तक नहीं गयी थी। स्वयं एक अभिजात रुचि के धनी, किंतु उत्पीड़ितों-शोषितों से संबद्ध क़ाज़ी साहब में नकचढ़ापन (Snobbery) बिलकुल नहीं थी। गंभीर और मस्तमौला एक साथ। सृजनशील और विवेकवान एक जैसे। मिलने वाले को निष्कुंठ आत्मीयता से मोह लेते थे।

उन्होंने शिकस्त की आवाज, मज्जू भैया, गुबार ए शाब, सलाहुद्दीन अयूबी, दारा शिकोह, गालिब, हजरत जान पीतल का घंटा, बादल जैसे अनेक उपन्यास लिखे। इन उपन्यासों को बहुत सराहना मिली। उन्हें 1974 में पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया गया था। उनका अंतिम संस्कार भी उनके नगर अलीगढ़ में किया जाएगा।

क़ाज़ी साहब की मशाल जलती रहे और भारतीय समाज समता-सद्भावना का लक्ष्य प्राप्त करे, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी!
—अजय तिवारी

 

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