Breaking News

पढ़ाई के लिए ख़ास स्कूल की जिद क्यों? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

Posted on: 19 Jun 2018 11:26 by Surbhi Bhawsar
पढ़ाई के लिए ख़ास स्कूल की जिद क्यों? ‘प्रैक्टिकल फंडा’ वरिष्ठ पत्रकार राजेश राठौर की कलम से

गांव से लेकर शाहर तक ऐसे कोई माता-पिता नहीं होंगे, जो ये नहीं चाहते होंगे कि उनका बच्चा अच्छे स्कूल में नहीं पढ़े। सरकारी स्कूलों की बदतर हालत ने निजी स्कूलों को इतना ताकतवर बना दिया कि हर कोई निजी स्कूल में पढ़ना चाहता है। अब तो गांवों में भी शहरों की तर्ज पर करोड़ो रूपये के तीन सितारा होटल की तरह स्कूल बना दिए है। 50 हजार रूपये साल से कम फीस किसी स्कूल में नहीं है।

शहरों में तो ऐसे स्कूलों की फीस सालाना एक लाख रूपये से ज्यादा है। अब ये सब कुछ होने के बाद भी पेरेंट्स मानते नहीं है कि उनका बच्चा किसी सरकारी या ट्रस्ट के स्कूल में पढ़े। सब चाहते है कि बड़े नाम वाले, बड़ी सुविधा वाले स्कूल में ही जाए। शहरों में तो इस समस्या ने तूफ़ान मचा दिया है। किसी भी महानगर की आप बात कर ले, वहां पर एडमिशन के लिए लाखों रूपये का डोनेशन भी पेरेंट्स देने को तैयार रहते है।

हर साल तीन महीने नेता, अफसर और वीआईपी इस बात को लेकर परेशान रहते है कि उनके पास अलग-अलग स्कूलों में एडमिशन दिलाने के लिए कितने ज्यादा मानसिक दबाव होते है।  ऐसा नहीं है कि स्कूल संचालक भी दबाव और तनाव में नहीं रहते हो। वे भी कई बार एडमिशन देना चाहते है लेकिन क्लास में बच्चों को बैठाने की जगह तो हो।

कुछ बच्चों के एडमिशन को लेकर इस कारिंदे को भी परेशान होना पड़ता है। पत्रकार को पता नहीं क्यों लोग इतना बड़ा मानते है कि उनके रिश्तेदार और दोस्त ये कहकर अपने बच्चो के एडमिशन का बोलते है “अरे आपको फोन ही तो लगाना है, आपकी कौन नहीं सुनता है।” जब उनसे कहो तो कहते है कि “अरे तो कलेक्टर को बोल दो, मंत्री से बोल दो, नहीं तो मुख्यमंत्री को तो कह ही सकते हो।” क्या हमारे लिए इतना भी नहीं कर सकते? आप कुछ भी करो बस एडमिशन होना चाहिए।”

अब उनको कौन समझाए कि ये कारिंदा आपका काम नहीं कर सकता। कई बार तो जो लोग साथ में काम करते है उनके बच्चों के एडमिशन नहीं कराओ तो कह देते है आप कराना नहीं चाहते। इस बात को लेकर बात इतनी बिगड़ जाती है कि रिश्ते ख़राब हो जाते है। सवाल ये है कि क्यों पेरेंट्स कुछ ही स्कूलों में अपने बच्चो के एडमिशन कराना चाहते है। क्या भारत के राष्ट्रपति रहे ज्ञानी जेल सिंह के पास कोई डिग्री थी? तो फिर वह राष्ट्रपति कैसे बन गये?

दूसरे महान राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आजाद सरकारी स्कूल में पढ़कर दुनिया में महान कहलाए। क्या योग्यता, हुनर और बुद्धि करोड़ो के निजी स्कूल में ही मिलती है? सरकारी स्कूल या थोड़ा बेहतर सुविधा वाले स्कूल में बच्चे पढ़कर योग्य नहीं बन सकते? कुछ पेरेंट्स दिखावे के लिए भी ये गलती करते है। क्या मेरिट में आने वाले बच्चे सरकारी स्कूलों के नहीं होते? दिखावे की दुनिया ने हमें हर मामले में भौतिकता की तरफ मोड़ दिया। अब क्या इसकी शुरुआत नहीं हो सकती कि जो सरकारी स्कूल है उनको या तो सरकार बेहतर बना दे या सक्षम लोग उन स्कूलों में पैसा लगालार ठीक करा दे।

ऐसा भी हो सकता है कि निजी स्कूल वाले कुछ सरकारी स्कूल गोद ले ले और उनको बेहतर बना दे। क्या निजी स्कूलों की तरह सरकारी स्कूलों के मास्टरों को ट्रेनिंग देकर और बेहतर नहीं किया जा सकता? निजी स्कूलों में एडमिशन की भेड़ चाल आखिर कब तक चलती रहेगी? एडमिशन के कारण कई बार पेरेंट्स और बच्चे तक डिस्टर्ब हो जाते है, लेकिन कोई भी इसके स्थाई समाधान के लिए आगे नहीं आता।

यदि कुछ लोग चाह ले कि हम अपने बच्चे को जहां एडमिशन मिलेगा वहा पढ़ाकर काबिल बना देंगे, तो कुछ बर्फ पिघल सकती है। अनावश्यक रूप से निजी स्कूलों में हो रहे एडमिशन को ऐसे ही रोका जा सकता है। हम सब मिलकर ये कोशिश करे कि अपने रिश्तेदारों या मित्रों को समझाए कि उनके बच्चो के जहां भी एडमिशन हो सकते है वहां करा ले। उसके बाद बच्चो पर पेरेंट्स भी ध्यान रखे और कागज़ के टुकड़े की डिग्री की बजाय हुनरमंद इंसान बच्चो को बना सके। आपको ये फंडा कैसा लगा प्रतिक्रया दीजिए। मेरा Email id- [email protected] और मोबाइल नंबर 9425055566 पर संदेश भेज सकते है।

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com