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पेट्रोल डीज़ल के भाव पर ,एन के त्रिपाठी की कलम से

Posted on: 29 May 2018 11:26 by Munmun Verma
पेट्रोल डीज़ल के भाव पर ,एन के त्रिपाठी की कलम से

पेट्रोल व डीज़ल के भाव लगातार बढ़ रहे हैं और इन्हें कम करने की माँग सभी वर्गों से ज़ोरदार तरीक़े से आ रही है। मैं इस माँग तथा कृत्रिम तरीक़े से मूल्य कम करने के पक्ष में नहीं हूँ।

भाव कम करने के पक्ष मे अनेक तर्क है । इससे मध्यम वर्ग को बहुत राहत मिलेगी । सार्वजनिक परिवहन के दाम बढ़ने से लगभग सभी उपभोक्ता वस्तुओं के भाव भी बढ़ जाते हैं जिससे ग़रीब वर्ग के लोगों को भी बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। अत: उन्हें राहत देने के लिये पेट्रोलियम पदार्थों के भाव कम होने चाहिये ।

क्रूड के भाव पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं है। पेट्रोल के भाव कम करने के २ ही तरीक़े बचते है। पहला तरीक़ा है सरकारी तेल कम्पनियों का मुनाफ़ा कम कर दिया जाय या उन्हें घाटे मे डाल दिया जाय। ऐसा करना उन्हें अनेक सार्वजनिक कम्पनियों की तरह रोगी बनाकर करदाताओं के गले मे मढ़ना होगा वरना बजट का पेट काट कर उनका घाटा पूरा करना होगा । यह खेल दशकों से ( समाजवाद के नाम पर ) चल रहा है और अर्थव्यवस्था के लिये बहुत घातक सिद्ध हुआ है। दूसरा भाव कम करने का तरीक़ा है कि राज्य सरकारें तथा केन्द्र सरकार अपना एक्साइज़ टैक्स कम करें।

अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के व्यय मे कटौती करनी पड़ेगी क्योंकि अन्य व्यय कम करना सरकारों के लिये संभव नहीं है। ये जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकांशतया ग़रीबों के लिये एवं कुछ मध्यमवर्ग के लिये हैं । टैक्स मे एक रूपये की कमी से १३ हज़ार करोड़ रू की आय मे कमी होगी। यदि फिर भी सरकारें इन योजनाओं पर यथावत व्यय करती हैं तो राजकोषीय घाटा बढ़ जायेगा जिसकी पूर्ति सरकारें बाज़ार से ऋण लेकर करेगी और भविष्य में उस धनराशि और उसके ब्याज की भरपाई जनता ही करेगी। यदि सरकारें ऋण नहीं लेती है तो बढ़ा हुआ राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति ( महँगाई) बढ़ायेगा। इससे पेट्रोल तो बच जायेगा परन्तु बाक़ी सब वस्तुएँ काफ़ी मंहगी हो जायेंगी।

मोदी इन तथ्यों से भलीभाँति परिचित हैं। मेरे आंकलन से वे दृढ़ रहते हुए केवल सस्ती लोकप्रियता के लिये टैक्स घटाने का निर्णय नहीं लेंगें । यह उदाहरण भविष्य की पक्ष-विपक्ष, राज्य-केन्द्र की सरकारों का मार्गदर्शन करेगा।

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