OMG! खलनायक खुद ही हो गया बाहर

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paresh rawal

आमतौर पर फिल्मी खलनायक सीन से तब गायब होता है जब कोई नायक उसकी पिटाई करे या पुलिस ले जाए, लेकिन सियासत के अपने रस्मो रिवाज है। यहां नायक हो या खलनायक उसे बाहर करने के लिए किसी क्लाइमैक्स की जरूरत नहीं पड़ती। हिंदी फिल्मों के महानायक अमिताभ बच्चन तीन दशक पहले इसकी मिसाल बने थे तो अनेक फिल्मों के बेहद सफल खलनायक परेश रावल अब जाकर बने हैं।

सोलहवीं लोकसबा के चुनाव में अहमदाबाद पूर्व से तीन लाख से ज्यादा मतों के अंतर से चुनाव जीतने वाले रावल इस बार खुद ही चुनावी राजनीति से बाहर हो गए (या कर दिए गए)। वे 2012 में रिलीज हुई उनकी फिल्म ओ माय गॉड के कानजी की तरह भगवान को दोषी ठहराते हुए कोई मुकदमा भी किसी अदालत में दायर नहीं कर पाए। वैसे टिकट तय होते समय राजनीतिक स्तर पर उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी बताया जा रहा था। अब क्या हुआ? यह तो मोदी जानें या रावल खुद।

बहरहाल, इस बार अहमदाबाद पूर्व की लोकसभा सीट करोड़पति प्रत्याशियों के कारण चर्चा में रही। परेश रावल की जगह भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे सोमाभाई पटेल करीब साढ़े सात करोड़ के आसामी हैं। तो उसी सीट से कांग्रेस प्रत्याशी गीता पटेल के पास भी चार करोड़ की चल-अचल संपत्ति है। यहीं से बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी गणेश बाघेला के पास भी सात करोड़ से ज्यादा की संपत्ति है। इन करोड़पतियों की रेस में लोकसभा तक कौन पहुंचेगा इसका फैसला मतदाता तो कर चुके।

नतीजे आने की ही देरी है। जहां तक इस सीट के चरित्र का सवाल है 2008 में हुए परिसीमन के बाद 2009 में यहां पहला चुनाव हुआ। तब इस सीट को दो सीटों में बांट दिया गया था अहमदाबाद पूर्व और अहमदाबाद पश्चिम। मूल अहमदाबाद सीट पर कांग्रेस 1984 में ही चुनाव जीत पाई थी। उसके बाद से यहां भाजपा का बोलबाला रहा है। यहीं से हरेन पंड्या भी कई बार सांसद रहे। उनकी बाद में हत्या कर दी गई थी और उनके पिता विट्ठलभाई पंड्या और पत्नी जागृति ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र शाह पर हत्या का षड्यंत्र रचने के आरोप लगाए थे। गुजरात की राजनीति में पंड्या को मोदी-शाह का धुर विरोधी माना जाता था। हालांकि बाद में जागृति भाजपा में शामिल हो गई थी।