पीसीसी विवाद: मप्र में संगठन नही, सत्ता है झगड़े की असली जड़

मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी पीसीसी के अध्यक्ष को लेकर शुरू हुआ झगड़ा फिलहाल अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से अशोभनीय ट्रेक पर आगे बढ़ने से थम सा गया है लेकिन यह अध्याय बन्द नही हुआ है और आगे तब तक मप्र कांग्रेस में चलता रहेगा जब तक प्रदेश में पार्टी की सत्ता बरकरार रहती है।

0
138
scindhiya-kamalnath-digvijay

भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी यानी पीसीसी के अध्यक्ष को लेकर शुरू हुआ झगड़ा फिलहाल अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के हस्तक्षेप से अशोभनीय ट्रेक पर आगे बढ़ने से थम सा गया है लेकिन यह अध्याय बन्द नही हुआ है और आगे तब तक मप्र कांग्रेस में चलता रहेगा जब तक प्रदेश में पार्टी की सत्ता बरकरार रहती है।

वस्तुतः मप्र में कांग्रेस संगठन किसी वैचारिक धरातल पर 60 के दशक से रहा ही नही है यह व्यक्ति केंद्रीत एक ऐसी चुनावी मशीन भर है जिसे जनता ने देश भर की तरह मप्र में भी इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महानतम लोगों की उस विरासत को देखकर सामाजिक राजनीतिक अधिमान्यता दे रखी थी जिसने आजादी की लड़ाई में खुद को साबित किया था। जिसके कौमी गुलदस्ते में हर तबके के फूल सजे थे। और विकल्प के अभाव में समाज शासन के लिये सिर्फ इसी दल की ओर आशा भरी नजरों से देखता था।

इसके अखिल भारतीय नेतृत्व का अपना अखिल भारतीय चरित्र भी था और स्थानीय स्तर पर पंडित रविशंकर शुक्ला, शंकर दयाल शर्मा, कृष्णायनी जैसी रचना के रचयिता द्वारिका प्रसाद मिश्रा, तखतमल जैन जैसे विधिवेत्ता जिन्होंने अपनी प्रैक्टिस खोने के डर से सीएम बनने से इंकार कर दिया था। जैसे सामाजिक चरित्र के लोग जनता के विश्वास को प्रगाढ़ बनाते थे। लेकिन लगता है डीपी मिश्रा के राजनीतिक अवसान के बाद से ही मप्र में कांग्रेस की वैचारिकी नर्मदा जी के पानी के साथ खंबात की खाड़ी में जा मिली है।

आज जिस हालत में इस दल का संगठन खड़ा है उसे आप संगठन कैसे कह सकते है? संगठन का अपना एक शास्त्र होता है जिसके दार्शनिक धरातल पर संगठन शिल्पी विचारवान सैनिकों की फौज खड़ी करते है। नेहरू से लेकर इंदिरा इज इंडिया के एक छत्र और घनीभूत व्यक्तिवाद के दौर में भी इसी प्रदेश में जनसंघ और बीजेपी के कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल जैसे नेताओं ने गांव गांव जाकर अपनी विचारधारा से सुशिक्षित कार्यकर्ताओं की ऐसी फौज खड़ी कर दी जिसने मप्र को बीजेपी के सबसे आदर्श और सशक्त संगठन का तमगा दिला दिया।

क्या कांग्रेस मप्र में आज संगठन की दृष्टि से कहीं खड़ी है?

क्या कांग्रेस मप्र में आज संगठन की दृष्टि से कहीं खड़ी है? एक पूर्व मुख्यमंत्री जो दस साल सीएम और दस साल ही प्रदेश संगठन का मुखिया रहा हो उसके लिये जिस अशोभनीय शब्दावली का प्रयोग कैबिनेट मंत्री उमंग सिंघार ने किया वह संगठन से निकले किसी कार्यकर्ता के बोल नही हो सकते है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों ने जिस हल्केपन का प्रदर्शन किया है उससे यह साबित हो गया कि मप्र में कांग्रेस विचार नाम की कोई जगह बची नही है।

खास बात जो गौर करने वाली है वह यह कि श्री सिंधिया पार्टी के आल इंडिया जनरल सेक्रेटरी है यानी उनका पद पार्टी संगठन के पदसोपान में अध्यक्ष के बाद का है। वे यूपी महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य के प्रभारी है इसके बाबजूद उनके समर्थक और वे स्वयं इस पद की गरिमा को तिरोहित कर रहे है। क्या एक महासचिव का दायित्व पार्टी के अनुशासन और गरिमा को अक्षुण्ण रखना नही होना चाहिये? क्या सिंधिया समर्थक सिर्फ मप्र के अध्यक्ष के तौर पर ही उनके संगठन कौशल को मान्य करने पर आमादा है? जो नेता पार्टी का अखिल भारतीय महासचिव और यूपी ,महाराष्ट्र का प्रभारी है उसे गृह प्रदेश में ही संगठन की कमान सौंपना क्यों अनिवार्य है?

ऐसा इसलिये की सिर्फ सत्ता से कांग्रेस के सरोकार शेष रह गया है। उसके कार्यकर्ताओं ने कभी विचार के लिये काम किया ही नही है और नेताओं ने भी सदैव खुद के लिये लोगों को जोड़कर रखा इसीलिए जब भी नेताओं के रुतबे में कमी आती है वे क्रुद्ध हो उठते है या फिर अपने नेताओं के इशारों पर दूसरे के चरित्रहनन में भिड़ जाते है। कांग्रेस का संकट यह है कि मप्र ही नही देश भर में आज उसके पास कोई विचारधारा नही बची है न नेतृत्व के पास चमत्कारिक आकर्षण जो कार्यकर्ताओं को जोड़े रखे।

झगड़े का बीजमंत्र क्या है ?

सवाल यह है कि मप्र में पीसीसी चीफ के झगड़े का बीजमन्त्र क्या है? सच्चाई यह है दिग्विजयसिंह मप्र में कांग्रेस विचार के अंतिम प्रतिनिधि नेता है क्योंकि वे दस साल सीएम और दो बार पीसीसी के चीफ रहे है उनके पास प्रदेश भर में अपने समर्थकों की मजबूत फौज है और वे सार्वजनिक रूप से खुद की बनाईं गई एंटी हिन्दू लाइन पर हर परिस्थितियों में डटे रहते है आप इसे कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष लाइन की व्याख्या भी निरूपित कर सकते है। दिग्विजयसिंह अपनी इस लाइन पर पिछले 16 साल से डटे है इसे कांग्रेस की सेकुलर लॉबी का पूरा समर्थन भी मिलता है। आज मप्र में उनके समर्थक विधायकों की संख्या सर्वाधिक है और अपने 40 साल के राजनीतिक कद के चलते उनका मप्र के संगठन और सरकार दोनो में हस्तक्षेप स्वाभाविक ही है और यही मप्र में झगड़े की बुनियादी जड़ है।

दिग्विजयसिंह साहसिक नेता भी है वे चुनौती स्वीकार करना जानते है और अपने विरोधियों को ठिकाने लगाना भी। वे खुद अपने गुरु अर्जुन सिंह की पहले कृपा दृष्टि और फिर खतरनाक कोप से निकलकर मप्र की राजनीति में स्थापित हुए है। इसलिये उन्हें दरकिनार कर पाना न कमलनाथ के वश की बात है न दिल्ली दरबार के। कमलनाथ कभी मप्र के वैसे नेता नही रहे जैसे दिग्विजयसिंह है। सिंधिया ने पहली बार अपनी रियासत के बाहर अपनी पहुँच का अहसास कराया इसलिए मप्र में दिग्गिराजा फैक्टर को कोई भी रिजेक्ट नही कर सकता है।

पूरी पार्टी यहां इलाकाई क्षत्रपों में बंटी है

संगठन के जरिये कांग्रेस को खड़े करने के प्रयास तो मप्र में पिछले 40 सालों से किसी ने भी नही किया है। पूरी पार्टी यहां इलाकाई क्षत्रपों में बंटी है। ग्वालियर चंबल, मालवा, महाकौशल, निमाड़ के अपने अपने नेता है। ये नेता ही अपने समर्थकों को टिकट दिलाते है इसलिये जमीन पर कहीं भी कांग्रेस नही नजर आती है हाँ उसके क्षत्रप और उनके लश्कर जरूर आपको दिखाई देंगे।

आज मप्र में सिंधिया समर्थक चाहते है कि उनके नेता को पीसीसी की कमान सौंपी जाए। क्योंकि इसके जरिये मप्र की सत्ता में उनका दखल बनाया जा सके। यह दखल राष्ट्रीय महासचिव रहते हुए खतों खिताबत तक ही सीमित रहता है। समर्थक दावा करते है कि मप्र की सरकार सिंधिया के फेस पर जनता ने बनाई थी अंचल में अबकी बार सिंधिया सरकार का नारा बुलंद किया गया था। यह सच भी है कि मप्र की सरकारी बनाने में ग्वालियर चंबल की 34 सीटों का निर्णयाक महत्व है यहां 25 सीट कांग्रेस को मिली है लेकिन यह भी तथ्य है कि इनमें से 12 विधायक दिग्विजयसिंह से जुड़े है। इस बीच सिंधिया का अपने गढ़ से लोकसभा का चुनाव हार जाना एक राजनीतिक पराभव से कम नही है। समझा जा सकता है कि मप्र में पीसीसी चीफ का पद संगठन नही सत्ता का पुल है।

प्रदेश में भाजपा का जानारूजनता और कैडर में उपजे असन्तोष का नतीजा

यह भी तथ्य है कि मप्र में मौजूदा कांग्रेस सरकार किसी संगठन कौशल का नतीजा नही है बल्कि बीजेपी सरकार की खुद की नाकामियों और अफसरशाही पर अतिशय अबलंबन से जनता और कैडर में उपजे असन्तोष का नतीजा ज्यादा थी। बीजेपी बहुमत से 7 सीट पीछे रही जबकि उसके 13 मंत्री चुनाव हारे है। जाहिर है टिकट वितरण जमीनी हकीकत को आगे रखकर किया गया होता तो मप्र में तस्वीर बदली हुई भी संभव थी, वैसे भी बीजेपी को कुल वोट कांग्रेस से अधिक प्राप्त हुए थे।

मप्र कांग्रेस में पीसीसी चीफ के योगदान का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मौजूदा अध्यक्ष कमलनाथ और पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव कभी प्रदेश के पूरे जिलों के दौरे पर भी नही गए। 15 साल में कोई बड़ा जनआंदोलन कांग्रेस संगठन ने किया हो किसी को याद नही। जबकि मप्र में मुद्दों की भरमार रही। इस दौरान संगठन में हजारों की संख्या में पदाधिकारी बनाए गए है। ये क्या काम करते है किसी को खबर नही है। जिला, ब्लाक, लेवल पर संगठन की मजबूती के लिये कोई कार्यक्रम सत्ता में आने के बाद भी आज तक सामने नही आया है। बाबजूद इस संगठन के लिये मप्र में शीर्ष पर यह उन्मादी झगड़ा आगे क्या गुल खिलायेगा यह आसानी से समझा जा सकता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here