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छोटी हार ही कांग्रेस की जीत होगी…!

कभी-कभी उम्मीदवार इसलिए मैदान में उतर जाता है कि हार कर भी नेता तो बन जाऊंगा। कुछ ऐसा ही हाल खंडवा लोकसभा उपचुनाव में है,

झिरनिया से राजेश राठौर(Rajesh Rathore)

कभी-कभी उम्मीदवार इसलिए मैदान में उतर जाता है कि हार कर भी नेता तो बन जाऊंगा। कुछ ऐसा ही हाल खंडवा लोकसभा उपचुनाव में है, जहां लोकसभा उम्मीदवार राजनारायणसिंह (Rajnarayansingh)  पुरनी सिर्फ इसलिए चुनाव लड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें पार्टी ने जबर्दस्ती खड़ा कर दिया और वह खुद मानते हैं कि हार गया तो क्या हुआ, नेता तो कहलाऊंगा। पहले कांग्रेस ने अरुण यादव के पैर में घुंघरू बांध दिए थे, लेकिन यादव को शायद पता नहीं था कि नाचना तो किसी और को है। यादव ने बूथ मैनेजमेंट चुनाव लडऩे के लिए बनाया था, वही अब कहने लगे हैं कि पुरनी दादा हारेगा… मगर कितने से।

मतलब साफ है कि कांग्रेस खंडवा में हार के लिए लड़ रही है। यादव जितने वोट से हारे थे, यदि उतने वोट से पुरनी हारे तो मान लेंगे कि उनकी हार के बाद ही जीत है। खंडवा लोकसभा क्षेत्र में घूमने पर साफ नजर आता है कि दस झंडे कांग्रेस के हैं तो भाजपा के सौ। कांग्रेस के दस कार्यकर्ता हैं तो भाजपा के सौ घर-घर जा रहे हैं। भाजपा जीतने का भरोसा रखने के बावजूद कुछ ऐसा करना चाहती है कि खंडवा में कांग्रेस का बंटाढार हो जाए। पुरनी दादा कितने से हारेंगे, यदि यह बात कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से ही पूछ लो तो साफ कह देते हैं कि कम से कम दो लाख से।

मान के चलिए कि दादा तीन लाख से ज्यादा हारने का रिकॉर्ड भी बना सकते हैं। मंत्री तुलसी सिलावट कहते हैं कि भाजपा पांच लाख वोट से चुनाव जीतेगी। शिवराज उपचुनाव में मेहनत करते हैं, ताकि कुर्सी में थोड़ा फेविकोल और लग जाए।
कमलनाथ झिरनिया पहुंचे थे। एक घंटे देरी से कमलनाथ पहुंचे तो गांव वाले हेलीपैड पर ही चार-पांच सौ इकट्ठे हो गए थे। गांव में अभी भी हेलीकाप्टर देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। सभा में भी ठीक-ठाक लोग थे, क्योंकि इलाका कांग्रेसी है। यहां से विधायक झूमा सोलंकी हैं, जो अट्ठाइस हजार वोटों से चुनाव जीती है।

इस इलाके में आज भी आदिवासी सिर्फ यह जानते हैं कि हाथ के पंजे को को वोट देना है। इसी झिरनिया के थोड़ी दूर आगे पाढलिया गांव में इंदिरा गांधी-मंदिर है, जहां पर आदिवासी पूजा करते हैं, मन्नत मांगते हैं। यही कारण है कि कांग्रेस लगातार चुनाव जीतती है। इसी एक विधानसभा के भरोसे कांग्रेस आठ विधानसभा वाली लोकसभा सीट नहीं जीत सकती। कारण साफ है भाजपा की मेहनत दिख रही है। जब अरुण यादव चुनाव नहीं जीत पाए तो पुरनी दादा की जीत संभव नहीं है। अरुण यादव इस चुनाव में मुंह-दिखाई कर रहे हैं। दिग्विजयसिंह के भरोसे टिकट चाहते थे, लेकिन ऐनवक्त पर चोट हो गई।

जो हालात खंडवा में दिख रहे हैं, साफ है कि कमलनाथ सिर्फ कांग्रेस का वजूद बचाने के लिए इलाके में घूम रहे हैं। फिर वह इस इलाके में आने वाले हैं। संत सिंगाजी को मानने वाले आदिवासियों को विधायक झूमा सोलंकी कहती हैं कि इस बार हमें फूल को हराना है। जब हेलीपेड से कमलनाथ के साथ झूमा सोलंकी कार में बैठी थीं, तब कमलनाथ ने कहा था कि आसपास की विधानसभा में कांग्रेस को जो गड्ढा मिलेगा उसकी भरपाई भी भीकनगांव और झिरनिया से करना है। शायद कांग्रेसी यह भूल गए कि इस विधानसभा से यदि कांग्रेस पचास हजार से भी जीत जाए तो भी लोकसभा में पुरनी नहीं बैठ पाएंगे।

आठ में से पांच विधानसभा पर भाजपा का कब्जा है। विधायक सचिन बिरला कांग्रेस से भाजपा में चले गए, वह भी गुर्जर हैं। ऐसे में कांग्रेस को चलते चुनाव में नुकसान हो रहा है। कमलनाथ अब लोगों से हाथ मिलाने लगे हैं और भीड़ के बीच भी जा रहे हैं। झिरनिया में कमलनाथ बैरिकेड्स खुलवा कर जनता से मिलने पहुंचे। झूमा सोलंकी की तारीफ में कह बैठे कि आपके लिए झूमा बहन मेरा कुरता भी फाड़ सकती है।

जिस तरीके से कमलनाथ माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे, उससे साफ था कि मरता क्या नहीं करता! सुना है दिग्विजयसिंह से अरुण यादव नाराज हैं। दिग्विजयसिंह जब इस इलाके में आए थे तो अरुण उनके साथ नहीं थे। पुरनी में कोई ऐसी शक्ति या कमाल की बात नहीं है कि भाजपा के लाखों वोट झोली में डाल सकें। जो कांग्रेस के वोट हैं, मिल जाएंगे, लेकिन यदि उसमें भी भाजपा ने सेंध लगा ली तो पुरनी दादा खंडवा लोकसभा से हारने का रिकार्ड बना सकते हैं।

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