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हाल ए ऑफिस

Posted on: 12 Mar 2019 13:09 by Surbhi Bhawsar
हाल ए ऑफिस

मुकेश नेमा

साहब कब तक ऑफिस मे बना रहे ! कब तक अपने दो टन के एसी की हवा बर्दाश्त करे ! इंसान है वो भी ! ऑफिस की वही एक जैसे स्वाद की चाय और तरह तरह की बिस्कुटों से ऊब जाता है वह ! फाईलो के ढेर ,बाबुओं की जानी पहचानी शक्लें ,मिलने वालो की मनुहारे ,सुबह शाम का एक टाईप का रूटीन उसे बोर कर देता हैं ! ऐसे मे दौरा करना पड़ता है उसे !

वह फ़ैसला करता है कि बस बहुत हुआ ! और इसी फैसले के तहत वह दौरे पर जाने का कार्यक्रम बना लेता है ! साहब की इस मंशा की फ़ील्ड ऑफ़ीसर्स को खबर की जाती है और फिर दौरे की तैयारियाँ शुरू होती हैं !

जितना बडा साहब ,उतनी बड़ी उसकी फ़ील्ड ! और उतना ही बडा उसका दौरा ! साहब अकेला नही जाता दौरे पर ! पूरी बारात संग होती है ! साथ जाने के लिये चुने गये छोटे .मँझोले अफ़सर बरातियों से उमगते है ! चारों दिशाये जान जाती है कि साहब दौरे पर निकले हैं !

और फिर साहब निकल भी पड़ता है ! पूरे लाव लश्कर के साथ ! रास्ते के रेस्ट हाउसों को कृतार्थ करता ,खेतों की शोभा निहारता ,मूँग को मसूर कहता साहब अपने गंतव्य तक पहुँचता है ! मन ही कुडकुडाते ,थोड़ा घबराये से फ़ील्ड अफ़सर अपनी पूरी फ़ौज के साथ मुस्कुराते हुये उसका स्वागत करते हैं !

सर्किट हाऊस या किसी बडे होटल मे ठहराया गया बडा साहब अपने मातहत से कैसे हो ,क्या चल रहा है ,यहाँ क्या है देखने लायक़ ! टाईप के सवाल पूछता है ! बहुत से भले क़िस्म के साहब ,काजू बादाम से मुख़ातिब होते होते ,मातहत से उसके बीबी बच्चों की ख़ैरियत भी पूछ लेते है ! ऐसे में छोटे साहब का फर्ज होता है कि वो बड़े साहब के इस बडप्पन पर गदगद होकर दिखाये !

नाश्ते के बाद और लंच के पहले तक साहब आराम करता है ! साहब के आराम करने के दौरान फ़ील्ड अफ़सर ,साहब के साथ आये छोटे अफसरो ,उसके ड्राईवर से कायदे से भाईचारा निभाता है ! उसके सामने बडे साहब की उदारता ,मिलनसारिता ,भलमनसाहत के पुल बाँध देता है ,और निभाये गये भाईचारे के एवज़ में यह उम्मीद करता है कि साहब तक उनके बारे मे उसकी राय ज़रूर पहुँचेगी !

अपनी मर्ज़ी मुताबिक़ आराम फ़रमाने के बाद साहब तैयार होता है ! साहब का बैग वैसे तो उसकी ज़रूरतों के हिसाब से लैस रहता है ! पर फ़ील्ड के अफसर चाहते है कि बैग उन्हे मौक़ा दे सेवा का ! बैग मन रखता है उनका ! फ़ील्ड मे पहुँचते ही बैग में बहुत सी चीज़ों की कमी हो जाती है ! टूथपेस्ट और हवाई चप्पलें घर ही छूट गयी होती है बहुत बार साहब के पेंट शर्ट और अंडरवियर दौरे पर साथ आना भूल जाते हैं ! अच्छा मातहत ,साहब के बैग की इस भुलक्कडी को मौक़ा मानता है अपने लिये ! वो फटाफट इन सब का इंतज़ाम करता है ! और उसके उत्साह को देख बडा साहब कई बार खुशी भी जाहिर करता है !

बहुत बार मैडम भी संग चली आती है साहब के ! बीबी के साथ आया साहब कुछ ज्यादा मारक होता है ! मातहत के लिये मैडम को राज़ी रखना साहब के राजी रहने से ज्यादा ज़रूरी होता है ! मैडम होती है तो शॉपिंग भी होती है ! मंदिर ,गुरुद्वारे ,क़िले वग़ैरा मे भी पैर पड़ते है साहब और मैडम के ! इस सारे सिलसिले से फ़ील्ड अफ़सर को खुश होना ही पड़ता है ! वो होता है खुश और इस उम्मीद के साथ खुश होता है कि इससे बडा साहब भी खुश होगा !

साहब के साथ आये छोटे अफ़सर भी इस बीच अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करते है ! वे बडे साहब की तरफ से फ़ील्ड का मौका मुआयना ,छोटे साहब के दफ्तर के काग़ज़ पत्तर देखने जैसे छोटे मोटे दस्तूर निभाते है ! अफ़सर भी जानता है कि ये औपचारिकता ही है इसलिये वो भी इसे अपने से छोटे अफसरो के ज़िम्मे छोड बडे साहब के साथ मुस्तैद बना रहता है !

शाम होते होते साहब थक जाता है ! लौटता है वो सर्किट हाऊस ! उसके साथ आये अवसरों की टीम ,मौक़ा मुआयना रिपोर्ट के साथ उसका इंतज़ार कर रही होती है ! साहब देखता है उसे ,और दिन भर फील्ड अफ़सर द्वारा की गई लल्लो चप्पो और बीबी की बनाई राय के आधार पर खुशी या नाख़ुशी जाहिर करता है ! मैडम की असंतुष्टि मातहत पर फटकार बन कर बरसती है ! बडे साहब की नाख़ुशी फील्ड अफ़सर के लिये साफ साफ इशारा होती है ! चतुर फ़ील्ड अफ़सर समझ जाता है और अगले दिन और बेहतर ,तमीजदार कारसेवक होकर दिखाता है !

शाम होते होते थक जाता है बडा अफ़सर ! यदि बडा साहब पीने पिलाने का शौक़ीन हुआ तो नहाये धोये साहब की इच्छानुसार ,डिनर के पहले उसकी थकान उतारने के इंतज़ाम करना एक बार फिर फील्ड अफ़सर की ज़िम्मेदारी होता है ! इसके बाद होता है डिनर ! डिनर को भी मातहत का इम्तिहान ही समझिये ! डिनर यदि बडे साहब की पसंद का हुआ तो वो फील्ड अफ़सर से फिर कुछ निजी चर्चा कर लेता है ! पूछ लेता है उसके बच्चों की पढ़ाई के बारे मे ! इनके भर से फील्ड अफसर ,एक बार फिर उसका आभारी हो जाता है !

फिर रात होती है ! सर्किट हाऊस के हरे भरे बग़ीचे मे कुर्ता पायजामा पहनकर कुछ देर टहलता है बडा अफसर ! फील्ड अफसर पूरी विनम्रता से साथ ,उस विनम्रता के साथ जो उसने स्पेशली बडे साहब के लिये ही बाँध कर रखी होती है ,पीछे पीछे बना रहता है ! इंतज़ार करता है कि साहब उसे घर जाने को कह दे !

ऐसा कह भी देता है बडा साहब ! छोटे साहबों की गुडनाईटे मंज़ूर करता है और सोने चला जाता है ! अगले दिन की सुबह फिर मातहतो की गुडमार्निग ,ब्रेड बटर और आमलेट के साथ शुरू होती है ! पराँठों और ताज़े फलो की सेवा भी स्वीकार करता है बडा साहब ! फील्ड अफसरो की मनुहार होती है लोकल की कोई मिठाई चख लेने की ! यदि दौरा एक दिन और खिंचा तो एक बार फिर पहले दिन को दोहराया जाता है वरना साहब ,फील्ड अफसर की नमस्ते मंज़ूर करने के बाद ,मिली नमस्ते को मन ही मन तौलता अपने हेडक्वॉटर की तरफ रवानगी डाल लेता है !

जाते साहब को देख फील्ड अफसर राहत की साँस लेते है और भगवान से प्रार्थना करते है कि साहब का उनके इलाक़े मे अगला फेरा जल्दी ना हो ! साहब जब भी अपने बडे से आफिस से ,फाईलो से बोर होता है ! फील्ड के दौरे करता है ! फ़्रेश होता है ! लौटता है अपने आफिस और पूरे उत्साह से एक बार फिर अपने काम मे जुट जाता है !

mukesh

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