अब समझ आया मी टू का मतलब

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उम्मीद कर सकते हैं कि लंबे समय मी टू के खिलाफ जहर उगल रहे लोगों को एमजे अकबर के इस्तीफे के साथ ही इन दो शब्दों का मतलब और ताकत समझ आ गई होगी. सुखद संयोग है कि नवरात्रि में स्त्रियों से दुव्र्यवहार करने वाले चेहरे बेनकाब हुए। औरतों की हुंकार से सरकार हिल गई, महानता साबित करने के सारे रास्ते बंद हो गए। वकीलों की फौज खड़ी करके डराने की कोशिश करने वाले अंतत: मुंह छुपाने को विवश हो गए।

आधी आबादी की यह जीत लंबे समय तक याद रखी जाएगी, क्योंकि मामला सिर्फ विदेश राज्य मंत्री के इस्तीफे का नहीं है। मसला स्त्रियों के सम्मान का है। यह जीत बताती है कि अंधेर से देर भली होती है। यदि सहते रहेंगे, संकोच करेंगे, तो जीवनभर अपमान का घूंट पीना पड़ेगा। अपराध की काली छाया किसी दिन फेफड़े जाम कर देगी। सांस लेना दूभर हो जाएगा। इसलिए बेहतर है कि आवाज उठाएं। उस वक्त न बोल सकें तो बाद में हिम्मत दिखाएं, लेकिन चुप न रहें। चुप रहकर सिर्फ अपराधी के हौंसले बुलंद किए जा सकते हैं। उसके शिकारगाह को और आबाद किया जा सकता है।

रही बात लोगों कि तो लोग तो इस देश में अब परवाह करने लायक रहे ही कहां है। मी टू की बात सामने आते ही कैसे जहर उगलने लगे। पीडि़त स्त्रियों को निशाना बनाने लगे। क्या-क्या नहीं कहा गया। जब पद-प्रतिष्ठा चाहिए थी तो चुप रहीं, सहती रहीं या इस तरह की परिस्थितियों को आमंत्रित किया, उनका आनंद लिया। जब काम निकल गया तो मी टू करने लगीं। क्योंकि एक नहीं समाज ढेर सारे एमजे अकबरों से भरा पड़ा है। वे बर्दाश्त ही नहीं कर पा रहे थे कि कोई स्त्री 10-15 साल बाद भी आवाज उठाने की हिम्मत कैसे दिखा पा रही है।

क्या तर्क नहीं आए। जैसे तमाम अकबर कहना चाहते हों, हम रसूखदार पद पर थे, उसका फेवर किया। दूसरों को धक्का देकर उसे प्रमोशन दिया, सुविधाओं से उसकी झोली भरी। क्या सब फिजूल था। इसके एवज में अगर कुछ क्षण इधर-उधर हो भी गए तो कौन सा आसमान टूट पड़ा। जब नेमत बरस रही थीं, तब तो आपत्ति नहीं ली। मतलब यहां भी खोट उसकी ही नजर में। इंटर्नशिप के लिए आई वह बच्ची तो यही समझ रही होगी ना कि पिता के दोस्त होने के नाते अकबर उसके प्रति इतने उदार है। जबकि अकबर की हकीकत तो उस हरकत के पिता के ईमेल के जवाब में लिखी चंद लाइनों से आईने की तरह साफ हो जाती है।

माफ कीजिएगा, चूंकि आपके लिए इज्जत के मायने स्त्रियों से पूरी तरह अलग हैं। खासकर यौन शुचिता के मामले में स्त्रियों से समाज की अपेक्षाओं का सहस्रांश भी पुरुषों पर लागू नहीं होता। यहां तक कि पुरुषों की चरित्रहीनता को उसके पौरुष से जोडऩे से भी लोग बाज नहीं आते। कहते मिल जाएंगे कि जेब और अंग में दम है इसलिए इतनी स्त्रियों को घूमा रहा है। इसके विपरीत जब सवाल स्त्री का हो कुलटा, कुलक्षिणी कहकर उससे जीने का हक छीनने से भी गुरेज नहीं किया जाता।

अकबर के इस मामले में दो महिला मंत्रियों की भूमिका भी सराहनीय रही। हालांकि सुषमा स्वराज चुप्पी साधे रही, लेकिन स्मृति इरानी ने मामले में महिलाओं का साथ देने की बात कही थी तो मेनका गांधी ने जांच के लिए जजों की कमेटी बनाने का प्रस्ताव तक दे दिया था, जबकि आका हुजूर तो यही फरमा रहे थे कि सिर्फ आरोप लगने से कोई दोषी थोड़ी हो जाता है। आरोपों की बढ़ती संख्या, सरकारी की हो रही किरकिरी और पांच राज्यों के चुनाव के आगे किसी की चल नहीं पाई। हालांकि आखिर में भी सियासी दाव खेला गया और अजित डावोल को मध्यस्थ बनाया गया। ताकि यह कहा जा सके कि अंतत: साहब बहादुर ने ही यह न्याय किया है।

खैर, अच्छा है मी टू के बहाने समाज के कई अकबरों के चेहरों से नकाब उतर गया। हौंसला निश्चित तौर पर बढ़ेगा और जैसा इस बार सवाल उठाया गया कि तब क्यों नहीं थप्पड़ मारा। बहुत मुमकिन है कि इस जीत के बाद स्त्री वक्त का इंतजार न करे और उसी समय हिसाब चुकता कर दे। एक उधर, अकबर के इस्तीफे ने कई अकबरों को अपनी मर्दानगी घर की खूंटी पर टांगकर ही बाहर निकलने पर विवश कर सकती है।
#अमितमंडलोई

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