7 लाख निष्क्रिय इंदौरियों पर कोई चर्चा नहीं

व्यवस्थाओं को कोसने के, जनता अपने गिरेबान में झांके और समझे कि वह खुद कितनी जागरूक है। क्या उसे नहीं पता कि मतदान कैसे करना है, क्या शादी के निमंत्रण पत्र की तरह उसे भी पर्ची का इंतजार था कि वो आयेगी तब ही वोट डालने जाएंगे।

राजेश ज्वेल। निगम चुनाव में 7 लाख इंदौरी मतदाता ऐसे रहे जिन्होंने वोट नहीं दिया। लेकिन इन निष्क्रिय इंदौरियों पर कहीं कोई चर्चा नहीं है, सिर्फ हल्ला चंद छूटे लोगों को लेकर मचाया जा रहा है, जिनकी संख्या 50-60 हजार बताई जा रही है। हालांकि हकीकत में इतने छूटे मतदाता होंगे नहीं, वैसे ये हर चुनाव का रोना है, जब लोग मुंह उठाए वोट डालने पहुंच जाते हैं और अपना दु:खड़ा सुनाते हैं कि उनका नाम सूची में नहीं है या किसी दूर के मतदान केन्द्र में शामिल हो गया। जबकि आयोग हर चुनाव से पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण करवाता है। बकायदा हर तरह के मीडिया के जरिए प्रचार -प्रसार होता है, हर मतदान केन्द्र पर बीएलओ सहित स्टाफ बैठता है, जिसका काम ही यही है कि नए नाम जुड़वाने से लेकर त्रुटिपूर्ण नाम-पते ठीक करें। यहां तक कि घर-घर अभियान भी चलता है लेकिन तब लोग सोए पड़े रहते हैं। किसी को मतदान केन्द्र जाकर नाम – पता चेक करने की फुर्सत नहीं मिलती। यहां तक कि ऑनलाइन भी आयोग ने सुविधा दे रखी है और घर आए कर्मचारी को भी बिना कोई जानकारी दिए टरका दिया जाता है। जिस तरह आयकर से लेकर अन्य टैक्स जमा करने के लिए ऐन वक्त पर नींद खुलती है, उसी तरह वोट डालने जाते वक्त पता लगाया जाता है। फिर उसके बाद शासन-प्रशासन और आयोग को कसूरवार ठहराया जाता है।

इस बार तो चूंकि सुप्रीम कोर्ट आदेश के चलते ताबड़तोड़ भरी बरसात में चुनाव करवाना पड़े। नतीजतन मतदाता सूची संशोधन का भी समय नहीं रहा और पुरानी सूची के आधार पर ही चुनाव करवाए गए। जनता की तरह राजनीतिक दल भी सुस्ती का शिकार रहते हैं। कांग्रेस के पास तो इस तरह की कोई व्यवस्था कभी रही नहीं,अलबत्ता भाजपा के लोग ही थोड़े-बहुत सक्रिय रहकर मतदाता सूची की चिंता पालते हैं। मगर इस बार पंचायत और निगम चुनाव में किसी के पास समय था ही नहीं क्योंकि चुनाव अचानक टपके.. लिहाजा पुरानी सूची से ही चुनाव कराए और मतदाता पर्चियां भी आधी अधूरी ही बंट सकी। मगर यहां लाख टके का सवाल यह है कि कुछ छुटे हुए चंद हजार नाम को लेकर तो हल्ला मचाया जा रहा है, मगर उन 7 लाख मतदाताओं की कोई चर्चा ही नहीं कर रहा, जिनके नाम बकायदा मतदाता सूची में दर्ज हैं और उनमें से अधिकांश के पास मतदाता पर्चियां भी पहुंच गई, बावजूद इसके वे वोट डालने घर से नहीं निकले। कुछ हजार छूटे हुए नामों की बजाय ये 7 लाख का आंकड़ा कई गुना अधिक बड़ा है,अगर इन्होंने जागरूकता दिखाई होती तो मतदान का प्रतिशत वैसे ही बढ़ जाता।

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लेकिन देश का आम चुनाव हो या गली-मोहल्ले का 60-70 फीसदी से अधिक मतदान होता ही नहीं है। इसलिए बजाय व्यवस्थाओं को कोसने के, जनता अपने गिरेबान में झांके और समझे कि वह खुद कितनी जागरूक है। क्या उसे नहीं पता कि मतदान कैसे करना है, क्या शादी के निमंत्रण पत्र की तरह उसे भी पर्ची का इंतजार था कि वो आयेगी तब ही वोट डालने जाएंगे। मतदान की छुट्टी का कैसे कई किलोमीटर दूर जाकर पिकनिक मनाने में उपयोग करना है ,उसकी प्लानिंग तो कर ली जाती है, मगर घर से एक -दो किमी दूर के केंद्र तक जाने में जमाने भर के कष्ट हो जाते है…! जरा उन मतदान कर्मियों की सोचो जो बेचारे 48 घण्टे तक बिना खाए -पिये या ठीक से सोए अपनी ड्यूटी निभाते है, लेकिन जनता ने खुद अपनी ड्यूटी कितनी निभाई ..?