राष्ट्रकवि सत्यनारायण सत्तन ने रंगपंचमी विश्व प्रसिद्ध गेर के सुनाए किस्से

आज की तरह तब सामाजिक भेदभाव नहीं था। पश्चिम क्षेत्र में रंगारंग गेर तो 1955-56 से निकलना शुरु हुई लेकिन इससे पहले मल्हारगंज क्षेत्र में बसे उत्तर प्रदेश के लोग खड़े हनुमान के मंदिर में फगुआ गाते और रंग-गुलाल खेलते थे।

कीर्ति राणा

आज की तरह तब सामाजिक भेदभाव नहीं था। पश्चिम क्षेत्र में रंगारंग गेर तो 1955-56 से निकलना शुरु हुई लेकिन इससे पहले मल्हारगंज क्षेत्र में बसे उत्तर प्रदेश के लोग खड़े हनुमान के मंदिर में फगुआ गाते और रंग-गुलाल खेलते थे।1955 के दौर में इसी क्षेत्र में रहने वाले रंगनाथ कर्णिक उर्फ रंगू पहलवान (सुभाष कर्णिक के पिता और पत्रकार जयदीप कर्णिक के दादा) की नेमीनाथ मंदिर के बाहर दुकान थी। रंगू पहलवान बटलोई (बड़े लोटे) में केशरिया रंग घोलकर आने-जाने वाले लोगों पर रंग के छींटें मारते थे।ये इस क्षेत्र में सार्वजनिक होली का शुरुआती दौर था।

बाबूलाल गिरी की होटल वाले ओटले पर तब शाम को क्षेत्र के प्रमुख लोगों की बैठक रहती थी।एक दिन गिरी ने इस होली को सार्वजनिक और भव्य पैमाने पर कैसे मनाएं चर्चा छेड़ दी। तब वसंत पंड्या, रामचंद्र भिंडी पहलवान, सूरजमल, गोकुल (भूतड़ा)दादा इन सब की सहमति बन गई तो तय किया कि टोरी कार्नर वाले चौराहे पर रंग घोलकर कड़ाव रखेंगे और जो भी यार-दोस्त उधर से निकलते उन्हें टांगाटोली कर इस कड़ाव में डालने लगे। तब इस ओटले पर मिश्रीलाल जैन, विधायक रहे बाबूलाल पाटोदी, लाभचंद छजलानी, मनोहर प्रसाद, अजित प्रसाद जैन, एनके तिवारी, गंगा प्रसाद तिवारी दद्दू की नियमित बैठक थी।

बाबूलाल गिरी को दद्दू टोरी सम्राट कहा करते थे।इन सब प्रमुख लोगों की गेर निकालने पर सहमति बन गई तो अगले साल (1955-56) में पहली गेर निकली इसमें 200 लोग इकट्ठा हुए थे।इस गेर में ढोल की थाप पर गुलाल उड़ाते लोग चल रहे थे। इस गेर को लेकर लोगों ने उत्साह दिखाया तो अगली बार इसे और भव्य रूप से निकालने की सहमति बन गई।प्लानिंग शुरु हुई, हाथी, ऊंट, घोड़े, बैंडबाजे वाले लवाजमे के साथ गेर निकली, बोरिंग का काम करने वाले रमेश शर्मा जी ने ऊंचे मकानों तक रंग फेंक सके ऐसी मिसाइलें तैयार की।इन मिसाइलों से जब ऊंचाई तक रंग उड़ता तो ऐसा लगता था इंद्रधनुषी बादल छा गए हों।

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इस गेर की धूम मच गई, लोगों ने फूल और रंग बरसा कर पूरे रास्ते उत्साह से स्वागत किया। अगले साल फिर कुछ नया करने की प्लानिंग हुई तो गेर में आदिवासी नृत्य करती भीलों की टोली शामिल की गई। मस्ती में नाचती भीलों की इस टोली के लिए तब कुछ लोगों से कच्ची दारु का सहयोग भी लेते थे।घी वाले डिब्बों में दारु लाते, भील टोली कमें बांटते पूरे रास्ते इनका जोश बना रहता था।विदाई में इन्हें मेहनताने के साथ ही बची मदिरा भी सौंप देते थे। तब इंदौर समाचार खूब चलता था आठ कॉलम में हेडिंग के साथ कवरेज रहता था। जागरण के संपादक और पहले महापौर रहे ईश्वरचंद जैन भी शामिल रहते थे, तब दो पैसे कीमत थी जागरण की।

गेर की भव्यता में कमी ना आए तब लोग आर्थिक सहयोग भी करते थे। गेर को ब्राह्मण, कसेरा, बनियों, मुस्लिमों, जैन, माहेश्वरी आदि समाजों का सहयोग इसलिए भी मिलता था कि यह किसी समाज और दल की न होकर इंदौर की सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाने वाली गेर रहती थी। लोकप्रियता का आलम यह होने लगा था कि लोग हर साल गेर की प्रतीक्षा करते थें। गेर में शामिल होने वालों की संख्या हजारों में होने लगी तो रंग रंगीले लोग असभ्यता का प्रदर्शन भी करने लगे। इन तत्वों को रोकने के लिए तब पूरे गेर मार्ग पर वॉलिंटियरों की ड्यूटी लगाई जाती थी।

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गेर के आगे-आगे दो-तीन वरिष्ठ लोग कंधे पर लटके झोले से मुट्ठी भर के गुलाल उड़ाते चलते थे। इनके साथ चलने वाले तांगे में बैठे लोग लाउड स्पीकर पर गेर के आगमन की सूचना देते रहते थे। मकानों के ओटले, छज्जों और छतों से गेर देखने वाले परिवार रंग भरी बाल्टियां रंगरसिया टोलियों पर फेंकते रहते। तब गुलाल और गुलाबी रंग ही गेर की पहचान थी। यह गुलाबी रंग भी इतना पक्का रहता था कि बाद में खजूरी बाजार, सराफा, यशवंतगंज, आदि के लोग शिकायत करने लगे कि घर और दुकानों के दरवाजे खराब हो जाते हैं।

इस शिकायत के बाद भी गेर के स्वागत में कमी नहीं आई।लोगों ने मकानों-दुकानों पर मोम पप्पड़/तिरपाल ढांकना शुरु कर दिया।बाबूलाल गिरी और छोटेलाल गिरी ने इस परंपरा को जारी रखा तो यह गेर सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक बनती गई।इसी परंपरा को बाद में उनके पुत्र शेखर और कोमल गिरी आगे बढ़ाने लगे। इसी गेर में लंबे समय से जुड़े रहने वाले प्रेम खंडेलवाल उस्ताद ने संगम कार्नर से गेर की शुरुआत की। इस गेर में मोती बना, दौलत भाई, बद्री दादा आदि साथ रहते थे। उस्ताद के बाद उनका लड़का कमलेश इसे जारी रखे हुए है। इन दो गेर का ही असर रहा कि पश्चिम क्षेत्र से और तीन साइड गेर निकलना शुरु हो गईं।

टोरी कार्नर वाली गेर के सारे सूत्र कांग्रेसी विचारधारा वाले गिरी परिवार के हाथ में थे इस कारण एक साल तो गोविंद वल्लभ पंत के निधन के कारण गेर स्थगित कर दी, कभी चुनाव तो कभी इमर्जेंसी की वजह से भी यह गेर नहीं निकली।
तब टोरी कार्नर सत्संग समिति के माध्यम से बाबूलाल गिरी राम दरबार कार्यक्रम भी हर साल करते थे। आज जैसी नफरत तब नहीं थी दिल-दिमाग में, इसी क्षेत्र के मुस्लिम भाई राम दरबार के लिए झाड़ू लगाने, दरी बिछाने से लेकर मंच बनाने के लिए कोठियां तक उपलब्ध कराते थे।

मेरी गिनती तो तब युवाओं में होती थी।इस दौरान इंदौर से बाहर कहीं कवि सम्मेलन का निमंत्रण मिलता भी तो मैं हाथ जोड़ लेता था, अपने इलाके की गेर छोड़ कर क्यों जाऊं। रंग वाली कोठियों, हाथी-ऊंट की सवारी की अपेक्षा मुझे पैदल चलना पसंद था। कंधे पर गुलाल का झोला लटका रहता था, मेरे साथ गोपाल पहलवान, नारायण सेठ, रामचंद्र भिंडी पहलवान, नारायण सिंह पहलवान रहते थे।हम सब गुलाल उड़ाते चलते थे। हाथी पर बैठने का भी रोचक किस्सा ये है कि पहली बार जब टोरी कार्नर की गेर में हाथी को शामिल किया तो उस पर बैठने के लिए होड़ लग गई।सब ने तय किया कि क्षेत्र के एक पहलवान को बैठाया जाए।

पहलवान बैठ तो गए लेकिन गोराकुंड चौराहे तक आते आते पहलवान के दांत बजने लगे कारण यह कि छज्जों-छतों से थोड़ी थोड़ी देर में ठंडा पानी फेंका जा रहा था। पहलवान ने हाथी पर बैठे-बैठे ही अपने अंदाज में स्वस्तिवाचन शुरु कर दिया। उन्हें उतार कर दूसरे को बैठाया तो थोड़ी देर बाद उसने भी हाथ जोड़ लिए।फिर तो हालत यह हो गई कि कोई ऊंट-हाथी पर बैठने के लिए तैयार ही नहीं होता था। पश्चिम क्षेत्र से गेर निकले और भांगठंडाई नहीं छने ऐसा हो सकता है क्या। गेर जब सराफा वाले रास्ते से गुजरती तब व्यापारी लोग भांग ठंडाई के साथ स्वागत करते थे।जब गेर वापस टोरी कार्नर पहुंचती तब आयोजक और टोरी कार्नर वाली मंडली के लिए व्यवस्था रहती थी।

*रास्ता भी खराब और तबीयत भी ठीक नहीं
इस बार नहीं निकलेगी टोरी कार्नर की गेर*

पश्चिम क्षेत्र में गेर की शुरुआत टोरी कार्नर की गेर से हुई है और इससे ही विश्व में इंदौर की रंगपंचमी को पहचान भी मिली। इस बार अन्य गेर तो निकलेंगी किंतु ना तो यह गेर निकलेगी और न ही रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर होने वाला बजरबट्टू यात्रा-सम्मेलन ही होगा। टोरी कार्नर की गेर स्थगित किए जाने काएक कारण तो यही बताया जा रहा है कि जिला प्रशासन ने टोरी कार्नर से गोराकुंड तक मार्ग दुरुस्त करने की अपेक्षा और खुदाई कर दी।प्रशासन गोराकुंड से राजवाड़ा तक की अनुमति देना चाहता है, आयोजक शेखर गिरी चाहते हैं कि टोरी कार्नर से ही पारंपरिक मार्ग की अनुमति मिले।वो इस सब के पीछे भाजपा का दबाव भी बताते हैं।

हकीकत यह भी है कि कार्डियक अरेस्ट के बाद गत 7 मार्च को ही शेखर गिरी की मेदांता अस्पताल में डॉ जैन ने एंजियोग्राफी कर स्टेंट डाला है।उन्हें बेड रेस्ट की सलाह भी दी गई है।ऐसे में गेर के लिए संसाधन जुटाने की दौड़धूप करना न तो संभव है और न ही उनकी गैर मौजूदगी में किसी अन्य को गेर निकालने की जिम्मेदारी देना उचित मानते हैं। इस कारण से भी उन्होंने गेर नहीं निकालने का निर्णय लिया है। दो साल पहले तत्कालीन कलेक्टर लोकेश जाटव की पहल पर गेर को यूनेस्को द्वारा जारी की जाने वाली विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की पहल शुरु हुई थी लेकिन धुलेंडी के बाद ही कोरोना गाइड लाइन का सख्ती से पालन कराने की दिशा में कलेक्टर मनीष सिंह ने अन्य सभी समारोह के साथ गेर की अनुमति भी निरस्त कर दी थी।

इस साल गड्डे में गया बजरबट्टू सम्मेलन

पश्चिम क्षेत्र की इस गेर की तरह पिछले 23 साल से रंगपंचमी की पूर्व संध्या पर मल्हारगंज थाने के सामने आयोजित किया जाने वाला बजरबट्टू सम्मेलन इस बार भी नहीं होगा। पिछले दो साल तो कोरोना के चलते नहीं हुआ और इस बार बजरबट्टू यात्रा का मार्ग भी खुदा पड़ा है।इसके आयोजक-भाजपा नेता अशोक चौहान चांदी का कहना है हर साल खजूरी बाजार स्थित धर्मशाला में भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय सहित मीडिया से जुड़े सदस्य विभिन्न रूपों में तैयार और वाहनों में सवार होकर समारोह स्थल तक रोचक यात्रा के रूप में जाते रहे हैं।

यह पूरा मार्ग स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट कार्य के तहत खुदा पड़ा है। इस सम्मेलन को लेकर लोगों के रोज फोन आ रहे हैं। प्रशासन गोराकुंड से राजवाड़ा तक की अनुमति देना चाहता है, हमें इससे बेहतर स्थगित करना ही लगा।चौहान ने बताया बजरबट्टू सम्मेलन के पहले मालवा क्लब की गेर निकालते और रात में कवि सम्मेलन कराते थे।अब यह तीसरा साल होगा जब यह सम्मेलन नहीं होगा।