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सौ टंच

अरविंद तिवारी

राष्ट्रीय सेवक स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच तालमेल न जमने के कारण कई बार बात बिगड़ जाती है। लेकिन पिछले दो-तीन महीनों में जिस तरीके से संघ और भाजपा के बीच में तालमेल जमा उसने कोरोना के कठिन दौर में प्रशासन का काम बहुत आसान कर दिया। सांसद शंकर लालवानी और संघ के इंदौर विभाग के संपर्क प्रमुख डॉ निशांत खरे की जोड़ी ने जिस रणनीति के साथ काम किया उसका फायदा यह मिला के जैसा संघ और सरकार चाहती थी वैसा सब प्रशासन के माध्यम से हो गया।

रमेश मेंदोला की दाल बाटी पार्टी की इन दिनों राजनीतिक हलकों में बहुत चर्चा है। लोग कहने लगे हैं कि दादा की दाल बाटी और तुलसी सिलावट की मावाबाटी। अपनी परंपरागत शैली में उन्होंने गांव गांव भोजन भंडारे शुरू करवा दिए है। एक-एक दिन में 2-2,3-3 गांव में दावत हो रही है और गांव के लोग दाल बाटी का खूब आनंद ले रहे हैं और बोल रहे हैं कि ऐसे आयोजनों से ही सिलावट की जीत का रास्ता निकलेगा अर्थात सब मावाबाटी खायेंगे। यहां महेश जोशी का वह फार्मूला भी याद आ जाता है कि पंगत के साथ संगत का मजा ही कुछ और है। इस फार्मूले को और बेहतर महेश भाई के खासमखास अशोक धवन और अजय चौरडिया समझा सकते हैं।

बडी बैच होने के कारण अपने साथियों से 3 साल पिछड़ चुके एस पी ए जे के अरविंद तिवारी अगले एक-दो महीने में आईपीएस हो जाएंगे। सरकार ने डीपीसी के लिए प्रस्ताव संघ लोक सेवा आयोग को भेज दिया है और वहां से तारीख तय होते ही बैठक हो जाएगी। पदोन्नति के कगार पर खड़े लोगों की सूची में ए जे के उज्जैन के एसपी प्रमोद सिंहा का नाम भी है। सिन्हा इंदौर में लंबे समय तक खुफिया शाखा के मुखिया रहे हैं।
इंदौर में डीआईजी रही रुचि वर्धन मिश्रा अब पुलिस मुख्यालय की सबसे वजनदार अफसरों में से एक हो गई हैं। दरअसल पुलिस मुख्यालय में जिन दो तीन शाखाओं का वजन सबसे ज्यादा माना जाता है उनमें से प्रशासन शाखा भी एक है। इस शाखा के डीआईजी पद को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि डीएसपी और एडिशनल एसपी स्तर के अधिकारियों के तबादला प्रस्ताव यहीं से आगे बढ़ते हैं। यह भी एक संयोग ही है कि लंबे अंतराल के बाद रुचि वर्धन और उनके आय ए एस पति शशांक मिश्रा अब भोपाल में ही पदस्थ है। ‌

कमलनाथ सरकार के जाने के बाद इंदौर की कांग्रेस राजनीति में एक नया समीकरण उभरा है। विधायक द्वय संजय शुक्ला और विशाल पटेल के साथ ही शहर कांग्रेस अध्यक्ष विनय बाकलीवाल की तिकड़ी इन दिनों कांग्रेस राजनीति के सारे सूत्र अपने हाथ में रखे हुए है। इनकी राह आसान होने के तीन कारण है‌। सज्जन वर्मा इन दिनों भोपाल में कमलनाथ की छाया बने हुए हैं। तुलसी सिलावट भाजपा में चले गए और जीतू पटवारी को प्रदेश और देश की राजनीति से फुर्सत नहीं। ऐसे में इस तिकड़ी की इन दिनों पौ बारह है।‌ इनमें भी बाकलीवाल इसलिए फायदे में है कि उन्हें शुक्ला और पटेल के रूप में विधायक के साथ दो लक्ष्मी पुत्र भी मिल गए।

बदनावर और इंदौर का राजनैतिक तालमेल बनता बिगड़ता रहता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है।भंवर सिंह शेखावत एक बार बदनावर से विधायक रहने के बाद एक चुनाव हार भी चुके हैं। इस बार उपचुनाव में भी शेखावत के लिए कोई संभावना नहीं है क्योंकि टिकट तो कांग्रेस से भाजपा में आए राजवर्धन सिंह दत्ती गांव को ही मिलना है। शेखावत की नाराजगी बरकरार है पर यहां कैलाश विजयवर्गीय दत्तीगांव के लिए मददगार बन गए हैं। उनके प्रयासों के चलते राजेश अग्रवाल जैसे पालिटिकल हैवीवेट का फिर भाजपा के साथ आना एक अच्छा संकेत है। यह देखना है कि सबको साधने में माहिर कृष्णमुरारी मोघे का समन्वय दत्तीगांव को कितना फलता है।

बड़े अस्पताल यानी एम वाय मैं तो सिस्टम जमा जमाया है। इसलिए वहां का काम थोड़ी बहुत ऊंची नीच के साथ कोई भी संभाल लेता है।अभी असली परीक्षा तो एमटीएच अस्पताल में है। 4 महीने पहले तक मंत्री तुलसी सिलावट के निजी स्टाफ में रहे डॉ सुमित शुक्ला को यह समझ कर एमटीएच का प्रभारी बना दिया गया कि जब उन्होंने बडा अस्पताल चला लिया था तो यहां क्या दिक्कत आना है। लेकिन वहां के जो हालात हैं वह यह बता रहे हैं कि डॉक्टर शुक्ला के लिए एमटीएस गले के घंटी बन गया है। देखना यह है कि कहीं जमी जमाई साख यहां खराब ना हो जाए।‌

और अंत में

इंदौर से बहुत नजदीक का रिश्ता रखने वाले भाजपा के वरिष्ठ विधायक विजय शाह का बिजली कंपनियों में मेन पावर की आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर अचानक मुखर होना, प्रधानमंत्री तक दस्तक देना और फिर चुप्पी साध लेना
किसी को समझ में नहीं आ रहा है।