साहित्य

लघु कथा: बेटी बचाओ

जैसे ही मालिनी जी ने मंच पर कदम रखा तभी तालियों की गूँज ने उनका स्वागत किया ओर होता भी क्यों न आखिर वो शहर कि सम्मानित समाज सेविका थी ओर आज का विषय भी संवेदनशील था (बेटी बताओ) उनके भाषण एवं उनके कार्य लोगों को जीवन की नई दिशा प्रदान करते थे। आज जब वह बेटी बचाओ पर बोली तो मानो एक साथ बेटियों के लिए एक लहर चल पड़ी हो ,तभी एक नवयुवक ने हाथ उठाकर कहा कि मैं इस विषय के पक्ष में नही हूँ। उसकी बात सुनकर मालिनी जी को गुस्सा आ गया कयोंकि आज तक उनके साथ ऐसा नहीं हुआ था कि किसी ने उनकी बात को काटा हो फिर भी समय कि नज़ाकत को समझते हुए उन्होंने नवयुवक से उसकी बात का तर्क जानना चाहा।

युवक ने कहा, हम क्यों बेटी बचाओ का नारा समाज को दें, हम क्यों नहीं अपने बेटों को बचाए उस सोच को अपनाने के लिए जिससे एक घृणित समाज बनता है, हम क्यों नहीं ऐसा आंदोलन करे जिसमें बेटों की सोच को एक नयी दिशा प्रदान की जा सके, ताकि समाज को बचाया जा सके ओर हम भी स्वंय से नज़र मिलाकर बात कर सके। इतना कहकर वह नवयुवक सभा छोड़ कर चला गया, लेकिन वहाँ बैठे हर शख्स के लिए ऐसे सवाल छोड़ गया, जहाँ जवाब तो थे पर उन्हीं जवाबों पर प्रश्नचिनह भी थे।

सवरचित एवं सर्वाधा अधिकार सुरक्षित।
अदिति सिंह भदौरिया।