दबी हुई आवाज़ों का मंच बन गया है #MeToo, प्रसिद्ध लेखिका अनुराधा अनन्य की कलम से

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मी टू के बारे में पिछले कई दिनों से अलग-अलग तरह की प्रतीक्रियाएं सुनने को मिल रही है. पुरुषों से भी और महिलाओं से भी. मीटू को लेकर गलत प्रचार भी किया जा रहा है. और जिन महिलाओं ने इस मुहीम के तहत सामने आकर अपने अनुभव रखने की हिम्मत की है, जितना जोखिम उठाया है उसको सस्ते मज़ाक बनाकर या चटखारे लेकर उतना ही हल्का करने की कोशिश की जा रही. इस तरह के अनुभवों के प्रति सवेंदना रखने वाले लोग कम ही है।बहुत सारे लोगों से ये सुनने को मिल जाता है कि अगर हम किसी की तारीफ़ में कहेंगें की आप खुबसुरत लग रही हैं तो मीटू में नाम तो नहीं डाल देंगी, “अरे ये फेमिन्ज्म वालों ने झंडे उठा रखे हैं.या देखो उसका भी हीटू हो गया फंस गया ना, कोई चुस्की लेने के मुझसे पूछ लेता है “ आप बड़ी फेमिन्सिट टाईप दिखती है आप से डर लगता है।

कंही आप मीटू या sextual hrashment का केस तो नहीं कर देंगी।” या “आपने नहीं लिखा मी टू में या आपके साथ कुछ हुआ नहीं इस तरह के सवाल जवाब बड़ी ही खिसियानी हंसी के साथ सामने आते है,” इस तरह से जवाब भी ये बेहद तकलीफ देने वाले है क्योंकि इस तरह की घटनाओं को चटखारे लेने वाली खबरों की तरह देखा जा रहा है. जबकि मीटू जैसे प्लेटफोर्म या किसी भी सार्वजनिक प्लेटफोर्म पर खुल कर अपनी बात कहना इतना आसां नहीं है इस निश्चय तक पहुंचने तक की यात्रा बहुत भयानक है। आदमी लगातार मानसिक तौर खुद से जूझता है। बार-बार परिस्थियां उसे कमजोर करती हैं।

मेरे ज़ेहन में ऐसी कल्पना नहीं आती कि कोई स्त्री ऐसी भी हो सकती है जो इस तरह की घटनाओं से आज़ाद है या इस तरह डर से बरी है. पीड़ितों की तादाद में महिलाएं ज्यादा हैं लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं इस तरह घटनाओं के पीड़ित पुरुष,बच्चे या एल.जी.बी.टी के लिए इस तरह प्लेटफार्म की ज़रूरत नहीं. मीटू जैसे मंचो पर फेमिनिस्ज्म की लेबलिंग करके उसे छोड़ देना या उसको स्टीरियोटाइप कर देना. सच्चाई से मुह मोड़ लेना है. क्योंकि इस तरह के व्याकरण और परीभाषाओं में फेमिनिज्म को देखा जा रहा है वहअपने आप में बहुत संकीर्ण है। क्योंकि फिल्मों के माध्यम से या फैशन ट्रेंड के तौर पर स्थापित किये गये फेमिनिज्म में सिर्फ शराब और सिगरेट पिने वाली सम्पन्न नायिकाओं को इसी तरह की आज़ादी के लिए लड़ते हुए दिखाया जाता हैं या सिर्फ अपनी यौन इच्छाओं और माहवारी जैसे विषयों पर बात करना ही फेमनिज़्म नहीं. ज़रूरी ये है किसी भी इंसान को किसी भी घटना या व्यवहार के लिए वर्ग,जाती और लैंगिकपूर्वाग्रह से मुक्त होकर देखा जाना चाहिए।

ये तमाम तत्व भी एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन सिर्फ यही लड़ाई हो यह मानना ग़लत है यह लड़ाई दलित महिलाओं और मजदूर महिलाओं की नजर से भी देखने की ज़रूरत भी है. आधी-अधुरी परिभाषाओं के लेंस में इन घटनाओं को देखना उन तमाम संघर्षों को खत्म कर देता है जो इस तरह प्लेटफर्म में आने में तमाम पीड़ितों ने किये हैं. एक लडकी के जन्म लेने में कितना संकट छिपा है इस सच्चाई से सभी वाकिफ़ है। जहां हम अभी भी लड़कियों से जुड़ी इस तरह की कमजोर मानसिकता को जकड़े हुए हैं. वहाँ किसी भी तरह की लेबलिंग कर देना और उसको उसी सीमित लैंस में देखना आधी सच्चाई को देखना है. कई बार इस तरह की लेबलिंग की वजह से एक अनदेखापन या isolation मुझे भी झेलना पड़ा है. मेरी कविताओं को पढ़ कर लोगों को लगता है कि मैं फेमिनिस्ट हूँ इसलिए मुझसे बच कर रहना चाहिए. कई बार खुसफुसाहट में मेरे सहकर्मी ये कहते हुए भी सुने हैं कि ये थोड़ी अजीब सी इनके सामने सम्हल के रहना, इनसे डर लगता है. मेरे साथ कोई हंसी मजाक नहीं हो सकता है लेकिन उनको ये समझ नहीं आता कि उनकी तारीफों जिनमे वो औरतों की खुबसूरती को सेक्सी कह कर सम्बोधित करते हैं या compliment के नाम से justify करते हैं या फिर उनकी गालियाँ जो सिर्फ माँ-बहनों के यौनांगों पर आधारित हैं बहुत संकीर्ण हैं।

गालियों और तारीफों ही तरह उनके मजाक भी कितने सिमित और सस्ते हैं ये भी छिपा नहीं है। मैं कभी कभी सोचती हूँ अगर उनपर यह रोक लगा दी जाए कि फलाँ –फलाँ शब्दों और विषयों को छोड़ कर आपको तारीफ़,गालियाँ या मज़ाक करने हैं बेचारों की अभिव्यक्ति बहुत दरिद्र हो जाएगी। अब इस तरह की चीज़ों को सामूहिक रूप में लगातार अभ्यास करते हुए इतना स्वाभाविक बना दिया गया है कि इस तरह की स्वाभाविक चीज़ों का असर उनके स्वभाव में दिखता है और इस कदर दिखता है कि आदमी का दिमाग आदतन मोबलीचिंग, छेड़खानी और बलात्कार जैसे संगीन घटनाओं को भी को स्वाभाविक तौर पर ही देखने लगा है. उनके अंदर किसी भी तरह की बेचैनी नहीं पैदा होती।

ख़ैर मेरे जैसे अजीब से दिखने वाले स्त्री पुरुष आसान शिकार भी होते है एक टाइप या टाइटल निर्धारित कर दिया जाए तो बस उसके बाद कोई बात ही नहीं हो सकती. ये तमाम लड़ाइयाँ इंसान को इंसान की तरह से ही देखने की है. इसलिए इस तरह की आवाजों का सामने आना भी ज़रूरी हैं ताकि अभी तक जो लोग बात कहने की हिम्मत नहीं कर पाए उनके लिए अपनी बात रखने का माहौल बन सके. और इस तरह की घटनाएं बंद हो सके. जिस तरह हर चीज़ एक फैशन और ब्रांड का रूप ले रही बात का मर्म बहुत ही casual हो जाता है. उसी तरह मीटू जैसी मुहीम में सामने आने वाली औरतों के अनुभवों को का सिर्फ़ घटनाओं/कहानियों में तब्दील हो रह जाने का भी खतरा हैं. इसलिए जरूरी हैं उनके यहाँ तक आने के संघर्ष से एक स्वेंदनशिलता का सम्बन्ध बनाना।

उस घटना या शब्दों के पीछे छिपी पीड़ा को समझना। पीड़ित आदमी को भी अपनी बात कहने के लिए load उठाना पड़ता है तमाम तरह के विचारों से गुजरना पड़ता है जैसे बहुत सी बच्चियों के अनुभवों में आया कि उस वक्त पर उनको समझ ही नहीं आरहा था कि ये यौन शोषण है, या इस के बारे में बात करने में वो confident नहीं थी. बाद में पता चला, अगर सबको बताया तो क्या रिएक्ट करेंगे, सब कुछ ठीक चल रहा है इस वजह से सब डिस्टर्ब हो जाएगा, पढाई भी रुक सकती है, इस तरह में तमाम डर और शोषण करने वाले के बारे में टूटती हुई धारणाओं का दर्द भयानक है। शोषण करने वालों में परीचित या परिवार के लोग भी हो सकते हैं इस बात के बारे में शायद ही किसी ने सचेत किया हो।

क्योंकि सम्बन्धों को हमेशा इतना महिमंडित किया गया है. सम्मान और पवित्रता से देखना सिखाया गया है कि जब उन लोगो का इस तरह का आचरण सामने आता है तो वो वक्त जिस वक्त पर ये सब घट रहा होता है. वो blank या शून्य की तरह होता है जैसे शरीर दिमाग पत्थर होगये हैं न चीख निकल रही है ना दिमाग रिस्पोंड कर रहा है. अलग अलग तरह की भावनाएं एक साथ नस्तर की तरह चुभती है और दिमाग को सुन्न कर देते हैं. उस वक्त दिमाग पर बने दबाव के जाल को तोडना वैसा होता है जैसे फिल्मों में दिखाए गए दृश्य जिसमे coma में पड़ा हुआ आदमी अपनी चेतना खोजता है और जिन्दा रहने के लिए झटपटाता. मैं और मेरे जैसे ही कई लडकियाँ इस तरह के अनुभवों से गुजरी होंगी. ये अनुभव और ये पीड़ा इतनी आसानी से पीछा नहीं छोडती है.

कितनी ही बार इस तरह की कोशिश भी की गई है कभी -कभी मैं सोचती छह जैसे सब कुछ एक पन्ने पर बने बदसूरत पेन्सिल मार्क की तरह होता। उसे रबड़ से मिटा दिए जाए. या ये घटनाएं याद ही ना आएं. जब भी अपने अनुभवों की गठड़ी खोली जाती है तो सुख दुख और प्यार-मुहब्बत की कीमती यादों की तरह ऐसे घटनाएं भी सामने आती है. जैसे ही इस तरह की याद का सामना होता उस वक्त की तरह ही हर बार उसी तरह का तनाव झेलना पड़ता हैं. हालांकि मैंने अपने जीवन मे बहुत बार इस तरह की घटनाओं को अपनी तरह फिक्स किया कितनी ही बार विरोध भी दर्ज कराया मार -पिट भी की है लेकिन इसके बावजूद भी इस तरह के कदम भी उस रबड़ eraser की तरह से काम नहीं करते जो बदनुमा पेंसिल मार्क को मिटा दे ते है. कई बार दोस्त लोग कहते भी हैं कि “अब छोड़ दो तुमने उसको मज़ा चखा दिया या तुमको इतना स्पेस नहीं देना चाहिए था”. कितनी ही बार मैंने अपने सहेलियों को इस तरह का हौसला दिया कि विरोध करों सामने वाले को बेइज्जत करों. और ये ज़रूरी भी है लेकिन इस तरह के एक्शन रिएक्शन से काम नहीं चलता।

प्रोग्रेसिव खेमे में काम करते हुए बहुत सी घटनाएं याद आती है. जिसमे कोई कॉमरेड अंकल का इस तरह का केस सामने आता था और सज़ा के तौर पर उन्हें कुछ महीनों के लिए उस पद से बर्ख़ास्त कर दिया जाता था. और थोड़े दिनों बाद किसी फ़िल्मी हीरो की तरह अंकल कमबैक करते थे. उसी तेज और भरोसे के साथ फिर से अवतार की तरह अवतरित होते थे. महफिल में चौड़ाई से अपने भाषणों में इन्हीं विषयों पर खूब जुगाली करते थे. यंहा मैं इस तरह की संस्थाओं के न्याय के पक्ष में लडी लड़ाइयों को अनदेखा नहीं कर रही न ही उनको असंवेदनशील कह रही. इस बात को इसी तरह के अलग-अलग उदाहरण से भी समझ सकते हैं. कहने का मतलब शोषण करने वाले हजरात जिसमें रिश्तेदार भी हो सकते हैं मित्र भी होसकते हैं. उनकी पूरी यात्रा को देखा जाएं तो कितनी ही बार वो अपनी बच्चियों को लेकर सवेंदनशील दिखाई देते है अलग-अलग समय में बच्चों पर प्यार लुटाते हैं.

आशीष देते हैं उनकी सुकोमल भावना देखकर हैरत होती है कि सारी तथाकथित ज़रूरी मानवीय भावनाओं से लैश आदमी शोषण करते हुए क्या सोचता है. क्या ये सारी भावनाएं नैतिक मूल्य दिखावा है जो सजावटी लिबास की तरह धारण किये गए है और इसको उतार कर अपनी आत्मा तक को नग्न करता है और घटिया काम करता है. और फिर से धारण कर लेता है. और बनजात है इज़्ज़तदार शरीफ़ इंसान, इस तरह के चरित्र बड़े आत्मविश्वास से घूमते नज़र आते हैं। और इसके विपरीत जो पीड़ित है उस पर शोषण करने वाले कि मौजूदगी का अहसास भी एक दबाव बनाता है. ये भी एक तरह का मानसिक शोषण ही और ना जाने कितनी ही बार पीड़ित को उसी मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है जबकि उसमे उसकी कोई गलती भी नहीं है।

लेकिन इसके विपरीत मैंने कभी कोई ऐसा पुरुष या शोषण करने वाला नहीं देखा जो कभी कहता हो कि वो किसी पश्चाताप की आग में जल रहा है या खुद के अपराधबोध से जूझ रहा है क्योंकि इस तरह का आत्मसंघर्ष कभी उनके व्यवहार में नहीं दिखाई दिया. जबकि इस तरह की घटनाओं के बाद बातचीत कर के सुलझाने, माफ़ी मांगने, दुरस्तीकरण या अपने चरित्र प्रमाणपत्र को सामने रखने के ढकोसले ज़रुर देखे हैं. मगर सच में उन्हें कोई फ़र्क भी पड़ा ऐसा कभी नहीं दिखाई दिया. खैर मी टू ने कई लोगो का चेहरा सामने लाया और कुछ लोग अपने किये हुए कुकर्मो पर पर्दा डालने के लिए अतिरिक्त रूप से साफ़-सुथरी छवि निर्माण की कोशिश कर रहे है कोई-कोई प्रोढ़ तो अपने बुढापे को ठीक से कट जाने तक की दुहाई दे रहे हैं.और कुछ अपराधी ये सोच कर चौड़े हो रहे हैं कि अब वो इस रेस में छीछालेदर करवाने वाले अकेले नहीं.उनके पास भी कई लोगो के काले चिठ्ठे हैं वो इस बात को अपनी तरह से स्वाभाविक या जस्टिफाई कर रहे हैं।

जिस तरह मेरी कल्पना में ऐसे कोई स्त्री नहीं आती जिसका शोषण किसी लैंगिक पूर्वाग्रह के चलते न हुआ उसी तरह मेरी कल्पना में कोई पुरुष भी नहीं आता जिससे जाने-अनजाने में कोई स्त्री असहज नहीं हुई हो.जब मैं ये बात कह रही हूँ तो ये स्पष्ट कर देना चाहती हूँ की मैं किसी जेंडरस्टीरियोटाइप को स्थापित नहीं करती. मेरे लिए बहुत ही बेहतरीन अनुभव होगा जब मुझे इस तरह के इंसान मिले जो असल में लैंगिकपूर्वाग्रह से मुक्त हों।

जो लोग ये सोचते है कि इस तरह के मंच पर इस तरह की घटना एक पब्लिसिटी स्टंट है तो मैं उनको इस मंच पर आमंत्रित करती हूँ कि वो आये और अपने किस्से बतलाए. कि उन्होंने किस-किस लडकी का शोषण किया या उनसे कोई लड़की किस तरह से uncomfrtable हुई. कोई आदमी खुले तौर पर confess कर रहा या अपराधबोध से गुजर रहा है. किस तरह के हरकते एक इंसान को परेशान करदेती है अपनी या अपनी आने वाली पीढ़ी को संस्कार दे. हिम्मत दे, आत्मग्लानि क्या होती है अपने अनुभव में बताए. विशेष अंगों को छूना यानी good touch या bad touch के अलावा किसी के देखने भर से भी कोई असहज हो सकता हाथ मिलाने से भी असहज हो सकता इस तरह के नज़र और स्पर्श का फर्क कभी बातचीत के दायरे में शामिल करें।

कम से कम खुद को फेमिनिस्ट कहने वाले या प्रगतिशील लोगो ये कदम जरुर उठाना चाहिए. क्योंकि हर लड़की को संस्कार स्वरूप इस तरह की घटनाओं से बचने या टालने के संस्कार तो दिए जाते हैं लेकिन संस्कार देने वालो ने कभी इस तरह की जिम्मेदारी लड़को के मामले में नहीं ली. नहीं तो शायद हमारा वैल्यू -सिस्टम या ऑनर सिर्फ लड़कियों से न जुड़ा हो बल्कि उसमे न्याय की अधिक सम्भावनाएं निकल कर आती. मैं इस तरह की पहलकदमियों का इंतजार कर रही हूँ और स्वागत करती हूँ.

उम्मीद करती हूँ. ये पहलकदमियां किसी सस्ते फैशन ट्रेंड की तरह तब्दील नहीं होंगी बल्कि इस तरह प्रयासों के चलते एक ऐसा बनेगा जिसमें समस्या को समस्यारूप में देखा जाएगा उन्हें गम्भीरता से लिया जाएगा और न्याय की बात होगी
इस लिए इस तरह के मंच बहुत ज़रूरी हैं जिसमे किसी एक की आपबीती नही बल्कि पूरे- पूरे समुदाय अपनी दबी हुई आवाज़ दर्ज़ करा सके । मैं मी टू जैसे मंच को सपोर्ट करती हूँ।

अनुराधा अनन्या

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